मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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यह वह दौर है जिसमें खतरे अपनी अदृश्यता के कारण कुछ अधिक जटिल हो गए हैं , और भास ‍अभास में भेद करना कठिन सा हो गया है। जो खतरे भासित होते हैं, उनमें प्रमुख हैं, एक के बाद एक संस्कृतियों का नाश, बेहिसाब युद्ध, असंतोष, भूख और पर्यावरण।
लेकिन जो खतरे दिखाई नहीं देते उनमें सबसे बड़ा है वर्चुअल दुनिया का मायाजाल, जो हमें अनायास असहज स्थितियों में झौंक रहा है, जो हमारे व्यक्तिगत जीवन में अनजानी घुसपैठ करने के बावजूद , एक कृत्रिम समाज रचने पर भी अजीब से अकेलेपन की रचना कर देता है। यही हमारे आस पास असन्तोष उत्पन्न करते हुए एक मायावी दुनिया रचता है, हमे नकली खुशी की ओर ढ़केलता हुआ तमाम भौतिक सुखों के बावजूद अवसाद की सृष्टि करने को उतारू हो रहा है।

ऐसी नकली दुनिया में कविता की क्या स्थिति हो सकती है, यह समझना कुछ कठिन है, क्यों कि कला और कविता प्राकृतिक सद्भाव चाहती हैं, वे संघटना चाहती हैं, वे प्रकृति के नियमों की दरकरार रखती हैं।

अकेलापन कला और कविता के उद्भासन में प्रेरक तत्व जरूर बन सकता है, लेकिन संरचना का मूल कारण नहीं, और उद्देश्य तो कदापि नहीं। यानी कि कला और साहित्य को जिस जुड़ाव की जरूरत है,

रति सक्सेना

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किसी अदृश्य में तुम.

एक अदृश्य में तुम्हारी
प्रतिछाया मिली
एक अदृश्य के साथ
शहर के हर रेस्तरां में गया
हर अनबैठे कुर्सियों पर बैठने
हर अनकही बात बताने के लिए
हर अनखाया व्यंजन खाने के लिए।

आदित्य शुक्ल
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सुनो!

मैं घग्घर लिखूंगा
तुम प्यास पढ़ लेना

मैं आग लिखूंगा
तुम उम्मीद पढ़ लेना

मैं मृत्यु लिखूंगा
तुम प्रेम पढ़ लेना

मैं भूख लिखूंगा
तुम स्वप्न पढ़ लेना
दुष्यंत
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मैं बिस्तर पर बाइबिल पढ़ रही हूं-
शुरू में शब्द उसके बाद युद्ध
और युद्ध
शतरंज का शाश्र्वत खेल
सिपाही
गिरने का इंतजार
या
गिर चुके
इतिहास चुप है
भगवान की तरह
जैसे वक्त या कुछ और भी
जो आत्मचेतना विहीन है
सोना वान

*

आओ!

बोलना है ज़रूरी
वे डराकर, धमकाकर
खामोश करने में माहिर हैं
लेकिन हम भी तो हैं जिद्दी कम नहीं
हम जो चुप रहकर
सहते रहने के फायदे जानते हैं
और जुबान खोलने की हिमाक़त की
सजाओं से भी हैं बाजाप्ता वाकिफ
अनवर सुहैल
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अय्यप्पा पणिक्कर की कुरुक्षेत्र, जहाँ अपने और परायों के बीच, सच्चाई और झूठ के बीच, जिन्दगी और मौत के बीच परिणाम की प्रतीक्षा किए बिना एक अनवरत संघर्ष दहकता रहा। इतिहास के पन्नों के बीच से निकल यह कब और कैसे हमारी जिन्दगी में आ धमकता है, उसे महसूस करते हुए हम किस तरह उसे जीते हैं, यह सब कुछ समझने बूझने के लिए हमे जरूरत है एक दर्पण की जो हमे अपने- अपने अपने कुरुक्षेत्रों से रूबरू कराने के साथ साथ उससे बाहर निकलने का रास्ता भी दिखा दे। कवि, चिन्तक, दार्शनिक अय्यप्प पणिक्कर की कविता " कुरुक्षेत्र" एक ऐसे ही रूप में हमारे समक्ष आई है।
एक सरल युवक न जाने कितने सपने, आशाओं और आदर्शों के साथ कर्मक्षेत्र में प्रवेश करता है तो वह अपने को जिन्दगी के कुरुक्षेत्र में पाता है। एक असमंजस की स्थिति है, उसके सपनों और यथार्थ के बीच। वह हर क्षण अपने आदर्शों से बिछुड़ने का डर लिए, लड़ना चाहता है, जीतना चाहता है, और वह भी अपने ही हथियार से। महाभारत के कुरुक्षेत्र में किसी की भी जीत नही हो पाई, कारण जो मर गए, उनका समूल नाश हो गया, जो जी गए, वे भी बच कहाँ पाए, अन्ततः अपने ही अतीत में गल कर मर गए। लेकिन कवि के इस कुरुक्षेत्र में अन्ततः एक मार्ग दिखाई देता है। अय्यप्पा पणिक्कर की यह कविता कवि की जिन्दगी के सीमित दायरे से निकल कर इस तरह सार्वभौमिक और सार्वकालिक बन गई है कि अपने रचना काल के 50 वर्ष उपरान्त भी समकालिक सी प्रतीत होती है।

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प्रारंभ में एक खरगोश था
उसके बाद तो तुम जानते ही हो
एक भेड़िया पीछे आएगा
हम जानते हैं कि
हर थियेटर में एक निकास द्वार होता है
अभी सोचना जल्दबाजी होगी
नजर बनाए रखो
थोड़ा और इंतजार करो,तुम जरूर अचंभित हो रहे होंगे
एक टैंक अभी मंच के बीचों बीच आएगा
मैं तब तक इंतजार करूंगा जब तक कि वह धूसर भेड़िया नहीं आता
अब प्रारंभ चला जाएगा और खरगोश भी
एक ही निकास द्वार है
जो भेड़िये से होकर गुजरता है

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गोधूलि की बेला में वह सेब छिल रही है
उसने एक टुकड़ा काट कर मेरे हाथ में रखा
मैंने लिया
उसके रस से भींगे हाथों से
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उस दिन मैं निर्माण स्थल के पास से गुजर रहा था
एक "यी" जनजाति का मजदूर गीत गा रहा था
बारिश के फुहारों के बाद वह जून का एक गर्म दिन था
मैँने एक प्रवासी मजदूर को देखा था
यू जिआन-
चीन के प्रमुख कवियों में से एक हैं, जिन्हे दूसरे नम्बर का बेस्ट सेलर कवि माना जाता है। आप यूनान प्रोविन्स में कुनमिंग में रहते हैं, और साउथ वेस्ट नार्मल यूनीवर्सिटी यून्नान में चीनी भाषा विभाग के डीन हैं।

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आओ, अर्द्ध शेष ले लो
जीवन का , किन्तु
मेरे शेष के हर क्षण को
अपनी आसक्ति से भर दो
क्या मोल तोल अनुचित है?
तो केवल एक क्षण छोड़
जीवन का शेष सब कुछ ले जाओ,
लेकिन नभ की तरह,
व्याप्त कर दो
उस क्षण से ऊपर सबकुछ को।

नहीं,नभ की तरह नहीं
करीब आकर बादल बन
मेरे भूत, वर्तमान और अतीत के ऊपर,
जिससे मैं स्वयं के स्पर्श के साथ
स्पर्श कर सकूंगा तेरे देह के मानसून को
तुम्हारी आह सांस ले सकें
दूर समुद्र की आहों से
उत्पन्न आंधियों के वेग को
जब मैं मुस्कुरा कर खुद को स्पर्श करता हूं
तो आंधी रूक जाएंगी,

मेरा जीवनकाल,
नजदीक आयी मृत्यु से बेखबर,
तुम्हारी युवावस्था के प्रारंभिक वर्षों की तीर्थयात्रा को हर दिन
नवीकृत करता हुआ।
तुम मेरे निर्देशों से तराशी गयी नीला द्रव्यमान हो
या
पूर्ण,अर्द्ध और अ ज्ञान का मेरा संपूर्ण नीला।
क्योंकि मैं हमेशा नीला पहनता हूं,
तुम भी नीली होगी,
तुम्हारा दूसरा रंग कैसे हो सकता है?
मेरा दिल दरक सकता है
अगर तुम्हारा रंग नील नहीं हुआ तो?

क्या ये मोल तोल अनुचित था?
फिर आओ ले जाओ,उस एक क्षण को भी।
लेकिन झुको नहीं,सीधे मेरी आंखों में देखो।
वहीं उस गुस्ताख यात्री से मिलो
जो एक के बाद एक
नरकों से होकर गुजरा है
रमाकांत रथ
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VOL - XI/ ISSUE-IV

जनवरी-फरवरी 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 सम्पादक: अनामिका अनु
 

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