मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 (ISSN 0976-5158)   


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आग बरस्क कविता

मैं कविता के बारे में बात कर रही हूँ
और उधर
अमेजन के जंगलों में आग लगी है

कविता को किनारे पर
रख कर यदि हम
आग के बारे में सोचे तो
इसे हमारे पुर्वजों ने
बड़ी मेहनत से पाया था

आग को देवता बना, अपनी
शीत गुफा को तपाया था

अपने भोजन को सुपाच्य बनाया


आग बनी उसका संदेश वाहक,
देवताओं से बतियाने के लिए
उसके पूर्वजों को ऊपरी लोक में
जगह दिलवाने के लिए

आग प्रिया थी, तभी रसोई में समा गई
भगिनी थी , इसलिए दरवाजे के सामने
बरौठी पर सुलग गई

आग देव थी, आस्था में समा गई

लेकिन आज यह क्रोधित है
भूखी है, या व्याकुल है
पता नहीं क्यों राख कर रही है,
दरख्तों को, जो उसे अपनी देह में
स्थान देते हैं
चुग रही है पक्षियों के घौंसले
उनके अण्डे बच्चे
वन पशुओं को, कीड़ों और जीवों को



रति सक्सेना
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गांव के बाकी लड़कों की तरह
मेरे पास भी एक खाली मन था
जिसमें अटाय सटाय सब कुछ
डालते रहने पर भी बना रहता था
खाली खुक्क भांय भांय करता
घूमता रहता था ..
नरेन्द्र पुण्डरीक
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कुछ अदालतें ऐसी भी होती है
जहाँ आप पकड़े जाते हो चोरी के जुर्म में
और सज़ा सुनाई जाती है खून के जुर्म में
असल मजा तो तब होता है
जब आपका वकील
आपके ही खिलाफ
सारे गवाह सारे सबूत
पेश करता है ...
सुनीता कटोच
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कुछ नही बदला
इस जनतंत्र में
महज ठाकुर बदले है।
जिस जमीन को
मेरे पुरखों ने रखा
घर की औरतों के गहने
गिरवी रखकर
आज
गाँव का पटवारी कह गया
तीस दिन में
तहसील में आकर
जमीन सरकार को सौंपनी है...
दिनेश चरण
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वो पश्मीना कुर्ती में
लिपट कर
कई ख्वाब बुन देती है
लाल ख्वाब
गुलाब के फूलों के
नारंगी ख्वाब
गुलमोहर की खुश्बू के
पीले ख्वाब
अमलतास सा खूबसूरत
नन्दिता कृष्णा
...क़िरदार बखूबी निभाया तुमने,
हम उसको जीवन समझ बैठे
एक आरजू अब भी है
बस देखता रहूँ, देखता रहूँ
कभी न ख़त्म होने वाला अहसास
निभाओगे ना, फिऱ से वहीं क़िरदार
शुभम

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कवि-नरेन्द्र पुण्डरीक

आज हमारा समाज बहुत तेजी से बदल रहा है। इस बदलते समाज में रोज नई परिस्थियाँ उत्पन्न हो रही है। बदलती परिस्थियाँ लेखक को भी प्रभावित करती हैं। इन परिस्थितियों के दबाव से नरेंद्र पुण्डरीक की कविताएं उत्पन्न होती हैं। आज के साहित्य की परिस्थियों का पर्दाफाश करते हुए नरेन्द्र 'एक न एक दिन' शीर्षक कविता में लिखते हैं--
" बिना मारे ही मर जाएंगे वे
उनकी कला, उनके विचार, उनके चिंतन
कविता मर जाएगी
बचे रहेंगे सिर्फ उत्सव धर्मी आयोजन
और आयोजनों में काव्य पाठ करते कवि
कलाकार
दाँत चियारते आलोचक
कविताएं नहीं होगी उनके पास
होगी कविता की ढप
मुर्दा शब्दों की खाल से मढ़ी"१
उपर्युक्त पंक्तियाँ आज के साहित्यिक परिदृश्य की सच्चाई है। परिस्थितियों के दबाव से कविताओं का उत्त्पन्न होना ही नरेन्द्र पुण्डरीक की कविताओं का वैविध्य है। भारत की जाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए 'सब एक ही जैसे थे' कविता में पुण्डरीक कहते हैं--

" स्कूल में आये तो आगे हमें नहीं
उन्हें बैठाया गया
तब हमें मालूम हुआ
हम और भी अलग थे
इसके बाद हमें यह बोध
लगातार कराया जाता रहा
हम छोटे हैं और वे बड़े

.....कुमार सुशान्त

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१)
देह में अटकी एक कहानी

मैं तो बस चले जाना चाहता हूँ
इस देह में अटकी
इक कहानी लिखकर.

२)
के अब गुजर जाने का समय है!

ये कैसे गुजर गए हम चमन से
के दिल पे कोई नया रंग नहीं
के रूह में कोई खुशबू नहीं
वही स्याह दिल का आलम
वही बदबू से भरी छाती मेरी

कोई रंग लाओ
कोई इत्र लाओ
के अब गुजर जाने का समय है!

३)
तुम्हारी देह के अनुवाद की एक कोशिश

मेरी देह में सुरक्षित है
तुम्हारी देह के अनुवाद की एक कोशिश
अनुवादक की पहचान लेकिन खो गई है

कुछ शब्द गोलाकार
अनुदित नहीं हो पाएं
कुछ भाव गहरे
और गहरे उतर गए
मेरी देह तक नहीं पहुंची
कुछ की ध्वनि

पूर्णिमा के रात में
समंदर के साथ में
मैं फिर प्रयास करता हूँ
उस अनुवाद का

परंतु,
सच तो यही है
की खो गया है अनुवादक
और
अधूरी मौत

मैं
मेरा घर
मेरे घर की दीवार
घर की दीवार में खिड़की
उस खिड़की से दिखता एक टुकड़ा आकाश...
- ये आकाश मेरा है

गणेश कनाटे

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ऊधर्म एक ही , जो कि जगत का
प्राणभूत है प्रेम, निराला,
वही न पूर्णेन्दु, सभी हम को
पय पीयूष पिलाने वाला?

है परमेश्वर चैतन्य वही
जो भक्ति दया अनुराग आदि,
कई ढंग के रूप ग्रहण कर
सरंव जगत को प्रकाश देता।

उसी पंथ का परिपंथी जो
नास्तिकता है , विद्वेष वही,
हा! उस तम में लोक पड़े तो
फल होता मृत्यु अकालिक ही।

है वह दुर्देवता बदलता
दारकर्म को प्रेत कर्म में,
मधुमय फुलवारी को ऊसर,
स्वर्ग लोक को नरक भयंकर।
‌‌***

शब्द समूह , समन्वय से ही
सार्थक सुन्दर वाक्य बनेगा,
स्वर तालों को संगीत से ही
कोई गाना श्रुतिसुख देगा।

अगणित गण परमाणु परस्पर
मिलजुल सकल पदार्थ बने हैं,
उनके चित्र समन्वय से ही
सर्व चराचर सार्थ बने हैं।

कही पराश्रय बिन रहने को
अवकाश नहीं है प्राणों को,
पुरषोत्तम भी जगत् सृष्टि में
साथिन करते प्रकृति सखा को।
विश्व हमारे संभाषण का
पुनरुक्ति विशारद तोता है,
विश्व हमारे भाव भाव का
निपुण विडंबक नट होता है।
उल्लूर एस परमेश्वरय्यर
***
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VOL - XIV/ ISSUE-V

सितम्बर‍ अक्टूबर 2019

प्रमुख संपादकः
रति सक्सेना

 

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