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कृत्या के पहले
कदम ने कविता प्रेमियों को उत्सव मनाने का अवसर दे दिया । १८ जून को
केरल के तिरुवनन्तपुरम शहर के म्यूजियम आडिटोरियम में "कवितोत्सव"
मनाया गया । कविता मात्र अक्षरों मे नहीं है, अन्य कलाओं जैसे
अभिनय, नृत्य, संगीत और चित्रकारिता में भी है । कवितोत्सव में इन
सब कलाओं की उपस्थिति थी ।
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मैं अक्सर सोचता हूँ
नदी में शब्द बो दूँ
शब्द बोते ही
नदी गंदली हो जाती है
श्रीप्रकाश मिश्र
इन दिनों मेरे पास वक्त नहीं है
जो कुछ भी है, वह अर्धकालीन
अर्धकालीन माँ
अर्धकालीन पत्नी
अर्धकालीन बेटी
अर्धकालीन प्रेमिका
अर्धकालीन कवि
अर्धकालीन खानसामा
शीमा कलबसी
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समकालीन जटिल परिवेश में
कविता के स्थान को निर्धारित करना उतना ही कठिन है जितना कि ओस की
बूँद को हथेली पर रख उसमें बिम्ब प्रतिबिम्ब को तलाशना । आज
रीतिकालीन संस्कृति के उच्छिष्ट समकालीन दरबारों में जी हजूरी तो
है पर कविता के प्रति संवेदनशीलता नहीं ....हो भी तो कैसे .....
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कभी-कभार तेरी आवाज़ सुनाई
दी मुझे
तेरे लिए सुगन्धित धूप-बाती जलाकर तेज़ की
आधार दीपं की लौ मैंने ।
दिन डूबने पर चाँदनी से खिले
मेरे अन्तरतम में आ विराजे
हे अनादिपुरुष, अर्पित करने दो मुझे
यह नैवेद्य, मन, वचन कर्म का मिष्टान्न !
बालामणियम्मा
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दिन में उल्लू पर विजय पा
लेता है काक ।
नृप जिगीषु को चाहिए, उचित समय की ताक । ।
पुत्र जनन पर जो हुआ, उससे बढ़ आनन्द ।
माँ को हो जब वह सुने, महापुरुष निज नन्द । ।
ओछों से डरना सदा, उत्तम जन की बान ।
गले लगाना बंधु सम, है ओछों की शान । ।
तिरुवल्लुवर
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