कविता का उत्सव

कृत्या ने साहित्य के विशद संसार में पहला कदम रख लिया । कइयों ने खुशी जाहिर की तो कुछ एक ने आलोचना की । कृत्या दोनों की आभारी है! बच्चे का पहला कदम चाहे कितना लड़खड़ाता क्यो ना हो माता पिता के लिए उत्सव का सबब बन जाता है, क्यों कि पहले कदम में चलना ही नहीं बल्कि दौड़ना, चढ़ना और उड़ना भी निहित होता है । कृत्या के पहले कदम ने कविता प्रेमियों को उत्सव मनाने का अवसर दे दिया । १८ जून को केरल के तिरुवनन्तपुरम शहर के म्यूजियम आडिटोरियम में "कवितोत्सव" मनाया गया । कविता मात्र अक्षरों मे नहीं है, अन्य कलाओं जैसे अभिनय, नृत्य, संगीत और चित्रकारिता में भी है । कवितोत्सव में इन सब कलाओं की उपस्थिति थी ।

अय्यप्प पणिक्कर ने रति सक्सेना की कविता " एक ऋचा चप्पलों के लिए " के वाचन से कार्यक्रम का आरंभ
किया । प्रमुख नाट्यधर्मी कावालम नारायण पणिक्कर ने प्रमुख अतिथि के रूप में अपनी और अय्यप्प पणिक्कर की कविताओं के अभिनय और वाचन से लोगों को अभिभूत किया । जिस वक्त मंच पर अय्यप्प पणिक्कर जी और कावालम नारायण पणिक्कर जी कविता वाचन कर रहे थे, केरल के महान चित्रकार बी डी दत्तन जी चित्र बना रहे थे । इस तरह वाचन, अभिनय और चित्रकला की जुगलबंदी ने कविता में रस, रंग और संगीत भर दिया । इसके उपरान्त सोपानम ग्रुप ने संस्कृत नाटक  "आश्चर्य चूड़ामणि" के सीता अपहरण भाग को बड़ी खूबसूरती से प्रस्तुत किया । तपोवन में सीता के सौंदर्य का बीसों आँखों से पान करते रावण की तरह दर्शकों ने द्विगुणित मन से नाटक का रसास्वादन किया । इस उत्सव में अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तुतियाँ थीः पंजाबी कलाकार नीता महेन्द्रा द्वारा अभिनीत अमृता प्रीतम की कहानीः "कोरी हांडी", श्रीमती पल्लवी द्वारा प्रस्तुत रवीन्द्र संगीत, और पाश की कविताएँ । मलयालम कवि विनय चन्द्रन ने भी श्रोताओं के कविता के श्रवणानन्द से परिचित करवाया । कविता प्रेमियों के लिये कवितोत्सव एक यादगार शाम थी, इसमें कोई संदेह नहीं । कविता को उत्सव के रूप मे मनाना कवि सम्मेलन से अलग अनुभूति है, यहाँ कविता को विविध कलाओं के माध्यम से अनुभूत किया जाना और रस के केन्द्र में प्रवेश कर पाना प्रमुख लक्ष्य है । इसमें न तो कविता की औपचारिकता है और न ही रस प्रवेश की दुरूहता । छहों इन्द्रियाँ और मन किस सरलता से रस प्रवेश कर जाते हैं, मालूम ही नहीं पड़ पाता है ।


श्रद्धांजलि

प्रभाकर चित्रकार छत्तीसगढ़ के एक छोटे से कस्बे धमतरी का रहने वाला था । कुछ वर्षों पूर्व मेरी छत्तीसगढ़ की साहित्यिक यात्रा के वक्त किसी काव्य गोष्ठी के उपरान्त कविता के लिये बधाई देने वालों में प्रभाकर भी शामिल था । उसने मुझसे कहा भी था "आपकी कवितायें कुछ न कुछ कहती हैं , मैं उन पर चित्र बनाना चाहता हूँ ।" मैंने मुस्कुरा कर हामी भर दी पर प्रभाकर की बात को गंभीरता से लिया ही नहीं । न जाने कितने ऐसे वायदों से गुजरते हैं हम, अधिकतर वक्त से पहले ही मुरझाकर झड़ जाते हैं । किंतु दो चार महिनों में ही चार चित्र आ पहुँचे । मेरे आश्चर्य का ठिकाना ना रहा, मैंने तुरंत उसे धन्यवाद का खत डाला । जवाब में उसके चित्र आ पहुँचे । इस तरह चित्रों के आने का सिलसिला चलता रहा..  । एक वक्त ऐसा आया कि हमारे बीच मौन छा गया, मैं अपनी जिन्दगी में उलझ गई और वह अपनी । जब कृत्या की कल्पना दीमाग में आई तो प्रभाकर के चित्र मन में जरूर रहे होंगे, कृत्या की तैयारी के वक्त मैंने उसे खत लिखा.. कोई जवाब नहीं, सोचा नाराज होगा.. कृत्या निकलने पर फिर खत लिखा.. फिर जवाब नहीं कई खतों के बाद टूटी फूटी भाषा में एक खत आया... प्रभाकर की पत्नी विमला प्रभाकर का... प्रभाकर हमे छोड़ कर चले गये...

कृत्या का यह अंक प्रभाकर चित्रकार को समर्पित है ।

कृत्या इस अंक में

कृत्या के इस अंक में हमने "समकालीन कविता में" खण्ड में विविधता पर ध्यान दिया है । प्रभाकर चित्रकार इस अंक के केंन्द्र में है, इसलिये पहली गद्य पद्य कविता प्रभाकर के लिये ही है । इस अंक के साथ मानसून भारत के नक्शे पर छा जायेगा, अतः पूनम वर्मा के बरसाती दोहे ऋतु के आनन्द को निश्चित ही बढ़ाएंगे । मानसून से सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं नदियाँ, अपने समय के वरिष्ठ कवि प्रकाश मिश्र की नदी शृंखला कुछ कविताओं का पाठन हमे अनुभूति के भिन्न रूपों से भी परिचित करवाएगा । इस अंक में यश मालवीय और आफताब की कवितायें मानवीय संवेदनाओं की कविताएँ है । विदेश से दो कवयित्रियों, भारतीय मूल की दिव्या माथुर और इरानी मूल की शीना की कविताओं के अनुवाद को पढ़ना निश्चय ही एक अलग अनुभव रहेगा । कविता के बारे में हम कविता और उसके आस पास की कलाओं पर विचार विमर्श करंगे । यह विमर्श सवालों को जन्म देता है अतः पाठकों की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी, संभव हो तो इस चर्चा को आगे बढ़ाया जायेगा । इस बार संपादकीय पसंद हैं केरल की वरिष्ठ कवि" बालामणियम्मा " जिनके काव्य फलक की बहुलता और विविधता पाठकीय संवेदना को विशिष्ठ रूप में आंदोलित करती है । कवि अग्रज के रूप में करीब हम दो हजार वर्ष पहले के विद्वान कवि " तिरुवल्लुवर" के वचनों को जिन्हें "तिरुक्कुरल" के नाम से जाना जाता है, दोहों के रूप में ला रहे हैं । इनके अनुवादक लेखक हैं दक्षिण के हिन्दी लेखक श्री टी एस के कण्णन ।

कृत्या तभी सफल होगी जब हम पाठकों से संवाद स्थापित कर सकें । अतः पाठकों से निवेदन है कि वे अपनी राय से अवश्य परिचित करवायें ।

रति सक्सेना

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 । ।संस्मरणात्मक श्रद्धांजलि । ।

                चित्रित चित्रकार

टिटहरी टिट टिट करती कभी बादलों से कहती सुनो ..सुनो... चित्रकार नहीं रहा, तो कभी पेड़ के नीचे बिल में पैर पसारे साँप से कहती....मालूम है चित्रकार चला गया..... , तो कभी दरख्त की शाख पर बैठ टिटियाती.... अरे देखो... वह चला गया, लेकिन मुझे मालूम क्यों नहीं पड़ा....

" अरे क्या कहती हो, चित्रकार नहीं रहा," जम्मु में बैठे अग्निशेखर ने अफसोस मेसेज भेजा ।
" बेहद बुरी खबर है" कृत्या के लिये काम करने वाली तकनीकि टीम ने कहा ।
" अच्छे लोग इसी तरह से वक्त से पहले चले जाते हैं, ऐसा प्यार देकर जिसे कई जन्मों तक नहीं चुकाया जा सकता है"... कैलिफोर्निया से रोजर ह्यूम्स ने चैट पर कहा ।

बादलों ने कुछ बून्दें चुआ दीं, साँप फण बुझा कर बैठ गया, दरख्त की शाखा कुछ चटक गई । टिटहरी ट...च....ट...च....करती चुप्पा गई.. ।

कौन था चित्रकार? क्या नाता था उसका इतने लोगों से? क्यों असर कर गया उसका जाना?

वह चित्रकार है इसमे कोई संदेह नहीं, कितने चित्रकार हैं इस दुनिया में, फिर ऐसी कौन सी बात है कि चित्रकार के जाने से सारी दुनिया हिल गई? .. टिटहरी चुप्पा गई... टिच्चचचचच्च्च्च्च्च्.....


वह चित्रकार ही तो था, तभी चुपचाप चित्र बनाता रहा, बिना कुछ पाने की आशा से... हर दूसरे चौथे महिने भेज दिया करता था........., ऐसे चित्र जो कविता के साथ खड़े होकर कवि को अपनी ही कविता पर सोचने को मजबूर कर दें । चित्र भेजते ही उसका कर्म समाप्त हो जाया करता था .... न वह उनकी याद दिलाता और न कभी कोई तकाजा करता.... कभी कभार चित्रों के साथ नन्हें नन्हें खत... आपकी कविता कि इस पंक्ति ने पाब्लो नेरुदा की उस पंक्ति की याद दिलाई.... या फिर... जब मैं चित्र बनाता हूँ तो एक चिड़िया आकर बैठ जाती है मेरी मेज पर... तो कभी.... रात के दो बजे हैं एक गाय खड़ी है मेरे दरवाजे पर...बस कुछ यूँ ही...
क्या नाता था उसका चिड़िया, गाय और पाब्लो से... और उससे जिसके लिए वह चित्र बना रहा है!. कौन जाने और कौन जानने की कोशिश करे?... जरा खटका तो हुआ.. ठेठ गाँव में बैठा यह युवक पाब्लो की बात कैसे कर रहा है...

उसके चित्र हमेशा एक दायरे से शुरु होते और असीम में व्याप्त हो जाते.... शायद उसी की तरह, जो एक छोटे से राज्य के छोटे से शहर में रहता हुआ, कुछ रचता हुआ अनजाने में इतनी दूर तक पहुँच गया । कला की कौन सी कल.. कैसे समझा जा सकता है आज के युग में ।

न जाने कितने चित्रकार हैं जो केनवास के रंगों को जिन्दगी में उतार लेने में भी सक्षम हैं... लेकिन चित्रकार के चित्रों का रंग तो धूमिल रहा या कभी कभार चटख केसरिया भी... मिट्टी की सुगन्ध के साथ प्रेम की तड़प... पर दरख्तों की हरियाली नहीं.... फिर भी जो उसे जानते तक नहीं, पर चित्रों को जानते हैं , उन सबका दिल कम से कम एक दिन के लिए तो बुझ गया ।

यह चित्रकार जिसके चित्र किसी गलियारे में नहीं टंगे..... राजमहल की शोभा नहीं बने.... किसी बड़ी प्रदर्शनी का हिस्सा भी नहीं बने.... बस चुपचाप घर की दीवार पर टंगते रहे.....या कभी बिना टंगे बड़े से लिफाफे में बन्द रहे. बिना किसी शिकायत के.... फिर भी कश्मीर से कन्याकुमारी तक दुख की काली लकीर खिंच गई, कैलिफोर्नया में बैठे रोजर ह्यूम्स तक चली गई ।

धमतरी की धुंधली सी शाम .. अंधड़. पानी.बारीश के बीच किसी तरह निपटाया जाने वाला कवि सम्मेलन... कितनों के आने की आशा हो सकती है !.... फिर कोई आकर यह कहता है कि ‍मैने आपकी कविताएँ पढ़ीं हैं... मैं एक चित्रकार हूँ.... आपकी कविताओं पर चित्र बनाना चाहता हूँ तो अच्छा तो लगा.... पर ऐसा नहीं लगा कि उस चेहरे को दिल में बैठा लूँ, कहीं फिर देखने को मिले या नहीं.. शायद फिर अफसोस हो... । दरअसल मैंने उन शब्दों को गंभीरता से लेने की कोशिश भी नहीं की, न जाने कितने जाने पहचाने लोग वायदे करते हैं और दरिया में डाल देते हैं, फिर यह तो अनजान है.... और इतना बड़ा वायदा?

चित्रकार सबके जैसा नही निकला, दूसरे तीसरे महीने एक पार्सल चला आया चार चित्रों के साथ.... चित्र क्या आए घर में रंग भर गए... बेटी ने दीवार खाली की .... पति उन्हें मड़वा लाए... हम सब तुरन्त चित्रों से दोस्ती बना बैठे । तुरन्त चित्रकार को लिखा... तुम्हारे चित्रों से मेरी बैठक सज गई है.... तो जानते हैं चित्रकार ने क्या किया.. तुरन्त २ चित्र और भेज दिए । अब तो चित्रों का सिलसिला बन गया... बरसात का मौसम होता तो चित्रों का आना रुक जाता... चित्रों को सूखने के लिए खुश्क मौसम की जरूरत जो होती है... पर खतों के लिए तरलता की... जो उसके खतों में देखी जा सकती थी । इस बीच जो भी घर आया उसे बड़ी ललक के साथ चित्र दिखाए गए... हर पाहुना अनजाने में चित्रकार से जुड़ता गया ।

किसको फुर्सत कि चित्रकार को याद करे.. चित्रों ने चित्रकार की जगह जो ले ली । इतना भर याद कर लिया कि उसका नाम प्रभाकर है , वह धमतरी में रहता है और... और.. बस इतना कि वह चित्र बनाता है । वह कैसे रहता है, कैसे जीविका चलाता है, घर में कौन कौन है आदि बातों को जानने की कोशिश ही नहीं की  । समय के केनवास में जितनी तेजी से रंग भरते हैं उतनी तेजी से फीके भी पड़ जाते हैं । चित्रकार के साथ खतों और चित्रों का सिलसिला टूटता गया । एक डेढ़ बरस का वक्त सपाट बीत गया । न चित्र आए न खत गए । इसी बीच इंटरनेट पत्रिका कृत्या का विचार दीमाग में आया , तो चित्रकार का ख्याल मन में था । ख्याल को बीज से पौधा बनने में वक्त तो लगता है, थोड़ा और वक्त बीत गया । सोचा कि कृत्या आने दो... चित्रकार को खत लिखूंगी. मित्र तुम अब इंटरनेशनल चित्रकार बन गए हो । पत्रिका का मूल तैयार होते ही खत डल दिया । फिर रम गई कृत्या में, प्रभाकर का कोई जवाब नहीं, लगा नाराज होगा चित्रकार दोस्त.. सोचता होगा... कैसी कवि है... मैंने इसके घर को रंग डाला, किन्तु इसने तो मेरी दीवार पर काली लकीर भी नहीं खींची । हड़बड़ाहट में दुबारा खत लिखा, पूछ भी लिया... नाराज हो ना दोस्त!

पत्रिका निकल चुकी थी । कइयों ने प्रभाकर के चित्रों की तारीफ की । मैंने फिर खत डाला.. प्रभाकर कहाँ हो.. देखो तुम्हारे चित्रों की तारीफ हो रही है । जवाब में एक खत आया...... टूटेफूटे अक्षरों में विमला ने लिखा था...... दीदी हमारे प्रभाकर सर नहीं रहे...हार्ट अटैक पड़ा था....उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की गई.... किन्तु वे हमे छोड़ कर चले गए..... आपकी विमला । यानी कि जब मैं अचानक प्रभाकर को छकाने का सोच रही थी, चित्रकार हमारे बीच नहीं थे । लेकिन यह कैसे हो सकता है, मैंने उससे पूछा था ना देखा मित्र, कृत्या कितनी सज गई तुम्हारे चित्रों से.. कितनी सुन्दर लग रही है... जवाब में वह मुस्काया था । पर विमला कहती है कि प्रभाकर नहीं रहे.....

टिटहरी टिटयाने लगी....टिट्...टिट्.....टिट्... च्च्च्च्च, वह मैंडक के पास गई, पोखर पर गई, सूखते तालाब पर गई.... समन्दर के पास गई... और डूब गई.....

समन्दर के सीने पर काली लकीरे उठ गईं.......

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उतने ही
अनगढ़ हैं ये अक्षर
जितनी
सुथरी थीं उसकी तस्वीरें

इन अक्षरों में
उसकी तस्वीर है
उतनी ही सुन्दर
जितने कि उसके चित्र..

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उसने लिखा था
" रात के दो बज रहे हैं, और
मैं तुम्हे खत लिख रहा हूँ,
एक गाय आ कर खड़ी हो गई है
मेरे दरवाजे पर"
मेरे लिए अबूझ था
रात के दो
गाय का दरवाजे पर खड़ा होना
न कि
उसका मुझे खत लिखना

मैं मिलना चाहती हूँ उस गाय से
जिसने देखा था
उसे खत लिखते हुए
मेरे नाम

मैं चूमना चाहती हूँ उन आँखों को
जिसमें तस्वीर है
उसकी उंगलियों की
उंगलियों में उलझे अक्षरों की

अक्षरों में दबे प्यार की?

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रोजाना सुबह एक चिड़िया
आकर बैठ जाती है मेरी मेज पर
गौर से देखती है
मेरे बनाए चित्रों को, फिर
उनमें से एक चुन
चौंच में दबा कर उड़ जाती है
चित्र को मिल जाता है
नीला रंग आसमान का

जब वह बैठती है दरख्त पर
मेरा चित्र हो जाता है हरा
चित्रकार ने लिखा था

लेकिन तुम्हारे चित्रों का रंग है
गहरा भूरा, काला और सलेटी, चित्रकार मित्र!
मैंने पूछा था उससे

कितना भी उड़े आसमान में चिड़िया
दाना चुगने उतरना पड़ता है उसे जमीन पर
भूख का रंग भूरा या काला होता है
चित्रकार ने कहा था

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बेहद खामोश है
मेरी खिड़की के
सामने वाला दरख्त
चुप हैं चिड़ियाँ

बेहद उदास हैं
मेरी दीवार पर टंगे चित्र
ठंडे पड़ गए हैं
चित्रों के केन्द्र में
दहकते लाल गोले

उसने लिखा था,
बरसात बेहद पसन्द है मुझे
मैं आउँगा
बरसात में भीगने
तुम्हारे पास

इस बरसात में वह आया
चुपचाप हो गया चित्रित
टंग गया मेरी दीवार पे....

टिटहरी का टिटयाना कब का ही बन्द हो चुका है.....

रति सक्सेना


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