कविता के आसपास भटकते हुए

कविता के प्रति कहे गए समस्त काव्यशास्त्रीय नियमों और आप्तवचनों से परे हटते हुए, महत् आलोचकों की उक्तियों से बचते हुए, एक सहज व स्वत्वरित चिन्तन या चिन्ता की भटकन को कविता के आसपास केन्द्रित किया जाए तो समकालीन परिवेश में कविता की स्थिति और उपादेयता का जायजा जरूर मिल सकता है किन्तु सवालों का जत्था ज्यों - का - त्यों खड़ा दिखाई देगा । समकालीन परिवेश में कवितागत सन्दर्भो के पूरी तरह से बदलने के बावजूद पूर्वोक्त की पुनर्व्याख्या को नकारा नहीं जा सकता, इस संदर्भ में एक सवाल जरूर उठता है कि हरदम पुराने आइने में झाँकते हुए छवि सुधारने की कोशिश की अपेक्षा ऐसा कुछ नया क्यों नहीं किया जा सकता जो विचारों को काल और दिक् से जोड़े रखते हुए उड़ान के सुख को बाधित न करे । कविता की विवशता यह भी रही है कि हर काल और स्थान ने उसके लिए निश्चित मापदण्ड निर्धारित किए, जो उसकी स्वछन्द उड़ान को बाधित करते रहे । हालाँकि हर दिक् - काल में अपनी उड़ान को स्वतंत्र करने की कोशिश करती हुई कविता ने कभी-कभार एक दो पैंगे ले लिए है तो कभी‍ कभार अपने को घायल भी कर लिया, किन्तु अबाध गतिशीलता से सदैव वंचित रही । पूर्वकथित की पुनर्व्याख्या के स्थान पर सहज चिन्तन को सोच का हिस्सा बनाते हुए कुछ सवाल उपजते हैँ, जिन्हें पाठकीय चेतना से जोड़ा जाए तो भटकन कुछ बढ़ती ही दिखाई देती है ।

समकालीन जटिल परिवेश में कविता के स्थान को निर्धारित करना उतना ही कठिन है जितना कि ओस की बूँद को हथेली पर रख उसमें बिम्ब प्रतिबिम्ब को तलाशना । आज रीतिकालीन संस्कृति के उच्छिष्ट समकालीन दरबारों में जी हजूरी तो है पर कविता के प्रति संवेदनशीलता नहीं ....हो भी तो कैसे ..... देह संस्कृति का चप्पा-चप्पा इतना खंगाल लिया गया है, नखशिख सौन्दर्य वीभत्स रुप धारण कर चुका है ......स्वदेह, परदेह के रेशे-रेशे को व्याख्यायित करने के बाद, देहानुभूति के नए नए आयाम खोजने के बाद, सब कुछ इतना घिनौना हो चुका है कि आज यदि कालीदासकालीन या फिर रीतिकालीन शैली में शुद्ध श्रृंगारमय कविताएँ रची जाएँ तो ब्लू फिल्म का एहसास होने लगेगा । रह जाएगा सारा का सारा सौंदर्यवाद छद्मवाद बन कर ..... उस छद्म में न तो पाठकीय चेतना प्रवेश कर सकेगी और नं ही कवि का स्वत्व ..... लेकिन समस्या तो यह है कि देह ऐसा तत्व है जो हर वर्ग व हर चेतना के पाठक के पास उपस्थित है .... उससे उठती सारी वेदनाएँ .... सारे सुख .... सारी वर्जनाएँ स्वानुभूति से ऊपर उठ कर सार्वजनिक अनुभूति का अंग बन सकती हैं, संभवतः यही कारण है कि समकालीन रचनाकार ने देह के साथ भी विभिन्न प्रयोगकर लिए ...... कुछ देर के लिए पाठकीय चेतना को उद्देलित भी कर सके, किन्तु हर उद्देलन फिसफिसाता गया । स्थिति यह भी आई कि एक पूरे के पूरे वर्ग ने इस क्षेत्र को नकारना शुरू कर दिया ..... इतने कठोर रूपमें कि उस नकार का सकार के रूप में स्थापित होने का भय उत्पन्न होने लगा । उस पुराने पड़ रहे सत्य की पुनर्व्याख्या शुरु हो गई जिसमें आवाज उस दिशा से उठने लगी, जिस दिशा में उसे दबाया गया था । अभी भी यक्ष प्रश्न हैं -

1 क्या देह को पूरी तरह नकार कर सौन्दर्य के नए मापदण्ड स्थापित किए जा सकते हैं ?
2 क्या देह सौन्दर्य के अतिप्रयोग को वीभत्स होने से बचाते हुए नए प्रयोगों की संभावना है ?
3 क्या नए प्रयोग इतने सहज व सर्वप्रिय हो सकते हैं कि आम आदमी उसमें खुद को महसूस कर सके ?
4 क्या परम्परावादी उपमानों में भोक्ता और भोग्य के भेद को भुलाते हुए भोग्य को भोक्ता होने का अवसर दिया जा सकता है ? (तीसरी शक्ति की यही आवाज तो नहीं उठ रही है ?)
5 क्या इस कर्म में कवि आत्मसुख से ऊपर ऊठ कर लोक की भावना के साथ तारतम्य बैठा सकता है ?
6 क्या देह - तथ्य को पूरी तरह नकारते हुए किसी नए उद्देलन की खोज की जांए ?

हम आप सब को इन तमाम सवालों से जूझते छोड़ कर दूसरे डायमेन्शन में भटकने की तैयारी करते हैं ।

कविता का सर्वलोकप्रिय रूप अधिकतर किसी न किसी धर्म से जुडा रहा है ...... न जाने अधिकतर धार्मिक ग्रंथों के कवितामय होने के पीछे कविता की सर्वग्राह्यता थी या फिर 'बहुत कुछ' को 'कुछ' के परदे के पीछे छिपा देने की भावना ...... जो भी हो ...... यह सम्बन्ध काफी लोकप्रिय या पापुलर रहा है । हर मजहब ने अपनी अफीम को चटवाने के लिए कविता का सहारा लिया है ...... परिशुध्द मानसिकता की उपस्थिति को भी नकारा नहीं जा सकता ...... जिनमें मीरा, सूर, तुलसी आदि का नाम लिया जा सकता है । परम गहनता भी कभी - कभी उपस्थित रही है जैसे कबीर ...... किन्तु कुछ स्थितियों को छोड़कर अधिकतर इस तरह की कविताएँ पैरोडी बन कर रह गई । फिर भी इस चलन को हर वक्त ने स्वीकारा ...... इतना स्वीकारा कि यह भावना ही पैरोडी बन गई .....समकालीन कविता इस सहज व सर्वग्राह्य रूप को मन से स्वीकार नहीं पाई ...... उनकी इस भावना के पीछे कविता की हठधर्मिता नहीं बल्कि किसी भी 'अंधता के कारण' से बचने की भावना प्रमुख रूप में रही हैं । इस 'कारण' से उसे अपने को काफी सिकोड़ना पड़ा है ..... भक्त मंडलियाँ ...... मजलिसें ...... महफिलें ......फिल्मी संगीतो और तथाकथित बाबाओं के भजन समारोहों में जहाँ नृत्य, संगीत और चित्रकला जैसी अन्य कलाएँ आज भी मंच पाती रही हैं वहीं कविता अलग - थलग पड़ती जा रही है । इस समुदाय के बीच कविता का स्थान शनैः‍-शनैः वह संगीत लेता जा रहा है जो एक समय की कविता का दूसरे रूप ही है । धर्म के नाम पर आतंक जगाने वालों ने कविता के पर ही नोच फेंके हैं । अब फिर भटकन बढ़ रही है -

1 क्या कविता इन जलसों में अपने को परोसने केलिए तैयार हो ?
2 क्या कविता वाद और विवाद से ऊपर उठ कर, कबीरात्मक साफगोई के साथ इस लोकप्रिय भावना का सम्मान करते हुए अपनी जगह बनाने की कोशिश करे ?
3 क्या विशुध्द सूफीनुमा धार्मिकता या विशुध्द ईश्वर तादात्म्य आदि को भी कविता में जगह मिल सकती है ?
4 क्या कविता इस तरह के प्रपंच से पूरी तरह बचते हुए नई जगह तलाशने की कोशिश रखे ? ध्यातव्य यह है कि आनन्द कहलाई जाने वाली इस अफीम के पूरी नहीं तो आधी जनता जरूर ग्रसित है।
5 क्या इस सत्+चित्+आनन्द की परम्परा के बदले हुए रूप को पूरी तरह खारिज करते हुए कविता अपना स्थान बना सकती है ?

निस्संदेह इस परिधि में संभावनाएँ फिलहाल काफी कम दिखाई देती हैं ...... किन्तु इस ओर बढ़ते हुए रुझान ने कविता को सिकुड़ने के लिए बाध्य किया है, इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है।
तीसरी दिशा वह थी जिसे कविता ने बड़ी मेहनत से पाया था ...... यहाँ कविता जिन्दगी के रगों में प्रवाहित होने लगी थी...... लहू में मिली पसीने की बूँदो से रची गई थी ...... आकोश को शब्द देती हुई केवल एक तथ्य पर विश्वास करती थी ...... और वह तथ्य था मानवता ...... जी हाँ सौ फीसदी मानवता ...... ऐसी कविता को न तो को किसी दरबार की जरूरत पड़ी और न ही किसी भक्तमंडली की ..... यहाँ आवाज ही नहीं सुर भी बदला था ...... क्या तेवर था ....! कारखानो, खेतों, गली कूचों में गूंजती इस कविता ने समकाल में कविता को काफी कुछ प्रतिष्ठित भी कर दिया था ...... जिन्दगी का मायना बदल दिया ...... लगा कि दिशा और दशा दोनों को पाने में सफलता मिल ही जायेगी .... किन्तु फिर लगा कि सब कुछ फुसफुसा कर बैठ गया ...... वह जोश ..... वह उमंग .... कुछ करने की चाह ...... सही रास्ते में भटकने कि इच्छा ...... सब कुछ बदल देने की शक्ति ...... सब कुछ बुदबुद कर बैठने लगा
.... अब स्थिति और भयंकर है .... वे सब .... जो एक वक्त जमीन से जुड़े थे .... पसीने से लथपथ थे ..... नया रूप गढ़ रहे थे .... अचानक उन आकाओं की जगह जा विराजे जिनसे नफरत करते हुए उन्होंने इस राह को चुना था । उनके जाम में वही सुरा ढ़लने लगी जो उन नाकाम आकाओं के जामों में ढ़ला करती थी । हालाँकि वे अभी भी अपने वादों को उसी तरह बुदबुदा रहे है जिस तरह मंत्र बुदबुदा के साँप को हथियाने का कार्यक्रम चलता है । नतीजा .... आज भी पिस रही आम आवाज अचंभित सी खड़ी है .... उन शब्दो के खोखलेपन को खोज रही है जिन पर उसे एक वक्त भरोसा था .... उनके साथी बुढ़ाते हुए परम्परागत शांति की खोज में वानप्रस्श लेते जा रहे हैं .... जो ऐसा नही कर पाते हैं वे सुरा के रंग में अपने वजूद को भुलाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं .... इक्का - दुक्का, आज ईमानदार आवाजें भरभरा के बैठने लगीं है .... अपने को ढ़हता हुआ देख रही हैं । इस नाम और वादों के साथ आज भी कविता रची जा रही है पर न जाने क्या बात है कि लहू की खुशबू आ ही नहीं पाती ..... कविता मात्र कथ्थ बन जिगर तक पहुँच ही नहीं पाती । ऐसा लगता है इस आवाज को मंत्र बनने से बचाने के तरीके खत्म होते जा रहे हैं .... कविता न तो शिराओं में लहू बन पा रही हैं न ही पसीने की दुर्गन्धमय खुशबू पा रही है .... चूने के बने विभिन्न टेलकम पाउडरों ने इसकी असली सुगन्ध को छिपा दिया है .... नकली साबुनी सुगन्धों से धो कर गंगा बना दिया है । वे व्यंग्य जो तीर की तरह लक्ष्य भेदने में समर्थ थे .... भोथरे होते जा रहे है .... खुलापन खालीपन में बदलता जा रहा है .... इस स्थिति में कविता ही नहीं उसके चाहने वालो की भटकन और बढ़ गई है .... ढ़ेर सारे सवाल ठालमठेल करते हुए भेजे में घुसे जा रहे हैं .... जिनका कोई जवाब हो .... ऐसा लगता तो नहीं .... किन्तु ये जरूर है कि जवाबों की खोज में कुछ दिशाएँ जरूर हाथ लग जाएँ -
1 यह जमीन जो कविता को पुख्ता आधार दे सकती है, उस पर से अगड़म-झगड़म, टीले-टबारे हटाते हुए क्या नया रूप दिया जा सकता है, जो मजबूत तो हो किन्तु मजबूर नही ?
2 इस समय जब जमीन से जुड़े लोग भी शार्टकट लेते हुए. उन सविधाओं के प्रति ललक रहे है, उन्हें सच्चाई के रास्ते पर लाए जाने की संभावना है ?
3 समय के सच को किस रूप में परखा जाए .... धीमे किन्तु सही रास्ते की ओर बढ़ते रहने को या फिर तीव्रगति से सबको पछाड़ते हुए, अश्वशक्ति का मशीनीकरण करने वाले सच के रूप में ?
4 तकनीकीकरण व व्यावसायीकरण के इस दौड़ में आम आदमी की दबी हुई आवाज को शक्ति मिलने की संभावना है ? वह भी कविता के जरिये ?
5 इस दौर में जब नृत्य और संगीत जैसी कलाओं ने अपने- अपने खेमे तलाश लिए हैं .... उनमें आज भी आम आदमी से जुड़े रहने की क्षमता है, वनिस्पत लक्ष्य की अस्पष्टता के बावजूद .... क्या कविता अपने लिए कोई जगह तलाश सकती है जो अलग- थलग न होती हुई .... जिन्दगी से जुड़ी रहती हुई स्पष्ट लक्ष्य की तलाश में समर्थक रहे ।
6 कविता को आत्मरति से ऊपर उठा सामान्य में ले जाने का दायित्व किसे है ?
7 पाठकीय चेतना को कविता के लक्ष्यों से किस तरह जोड़ा जाए ?
8 हालात से समझौते किए बिना सही जगह तलाश करने में कविता को किस मनोवृति की जरूरत पड़ेगी ?
9 पुरानी पड़ी मान्यताओं को केंचुल की तरह उतारते हुए नए - चमचमाते आवरण में निकलने की चाह को पूरा करने में कितना वक्त लग सकता है ?
10 पुरानी मान्यताओ की तरह बासी पड़े वादों को पूरी तरह से नकारना पड़ेगा या फिर उन्हीं में सुधार कर आगे बढ़ने की संभावना है ?

सवाल और भी बहुत से हो सकते है, समस्या इन सवालों को आगे बढ़ाने और उन में ही कुछ को जवाब में बदलने की है .... मुद्दा समकाल का है .... कविता के वजूद का है .... एक नए परिवर्तन का है .... वह परिवर्तन जो इन सवालो के जाल में फंसा हुआ है ।

रति सक्सेना


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