तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल

तमिल विश्व की प्राचीनतम भाषाओं में से एक है, अतः तमिल भाषा में साहित्य का अनुपम खजाना भरा पड़ा है । करीब दो हजार वर्ष पहले सन्तकवि तिरुवल्लुवर ने मानव जीवन की व्याख्या करते हुए गार्हस्थ्य, सन्यास, राजनीति, स्वस्थ आर्थिक नीति, प्रेम, वीरता, मान आदि अनेक विषयों को आधार बना कर "कुरल" रचे थे । ये आकार में अत्यन्त संक्षिप्त किन्तु अर्थ मे अत्यन्त विशाल थे । तत्कालीन कवि कपिल ने इनके बारे में कहा है कि " जैसे एक छोटी सी घास की नोक पर पड़ी तिन्नी से भी लघु ओस की बून्द ऊँचे ताड़ के पेड़ को प्रतिबिम्बित करती है वैसे ही कुरल महान विचारों को प्रकट करता है । "
तिरुक्कुरल किसी जाति या सम्प्रदाय का मार्गदर्शक ग्रन्थ न होकर साधारण जन के लिए नैतिक जीवन की श्रेष्ठता को निरुपित करने वाला ग्रन्थ है । इसीलिए इसे जीवन पुस्तक भी कहा जा सकता है । कुरल की विशेषता यह है कि इसमे केवल केवल सात शब्द होते हैं, ऊपर की पक्ति में चार और नीचे की पंक्ति में तीन । इन्हें चाहे सप्तऋषि कहा जाए या फिर सप्त समुद्र, अनन्त ज्ञान इसमे भरा पड़ा है । कृत्या के लिए कुरलों का चयन त.श.क.कण्णन के कुरल आलेखन से किया गया है । कण्णन तमिल और हिन्दी के बीच की कड़ी हैं, बड़े भाई हैं अतः यथावत अनुमति की परवाह किए बिना उनके द्वारा अनुदित कुरलों हिन्दी के पाठकों को उपलब्ध करवाया गया है । हिन्दी अर्थों के साथ मूल कुरलों को भी उपलब्ध करवाया गया जिससे हिन्दी के पाठक मूल की सुगन्धि से भी वाकिफ हो जाएँ

पगल्वेल्लुम् कूगैयैक्काक्कै इगल्वेल्लम्
वेन्दर्क्कु वेन्डुम् पोलुदु ( ४९। ४८१ )

दिन में उल्लू पर विजय पा लेता है काक
नृप जिगीषु को चाहिए, उचित समय की ताक ।।

इन्र पोलुदिल् पेरिदुवक्कुम् तन्कनैच्
सान्रोन् एनक्केट्ट ताय ( ७।६९ )

पुत्र जनन पर जो हुआ, उससे बढ़ आनन्द।
माँ को हो जब वह सुने, महापुरुष निज नन्द ।।

शिट्रिनम् अञ्जुम् पेरुमै शिरुमैतान्
शुट्रमा शूल्न्दु विड्डुम् ( ४६। ४५१ )

ओछों से डरना सदा, उत्तम जन की बान
गले लगाना बंधु सम, है ओछों की शान ।।

पेरुमवटुल यामरिवदु इल्लै अरिवरिम्द
मक्कट पेरु अल्ल पिर ( ७। ६१ )

बुद्धिमान सन्तान से बढ़कर विभव सुयोग्य
हम तो मानेंगे नहीं, हैं पाने के योग्य ।।

वाल्पोल् पगैवरै अंजर्क अंजिग
केल्पोल् पगैवर तोडर्बु (  ८९। ८८२ )

डरना मत उस शत्रु से , जो है खड्ग समान
डर उस रिपु के मेल से, जो है मित्र समान ।।

ईरुनोक्कु इवल् उण्कण् उल्लदु ओरुनोक्कु,
नोय् नोक्कोन्र न्नोय् मरुन्दु ( ११०।१०९१ )

इसके कजरारे नयन, रखते हैं दो दृष्टि
रोग एक, उस रोग की, दवा दूसरी दृष्टि ।।

यान्नोक्कुङ् काले निलन्नोक्कुम् नोक्कक्काल्
तन्नोक्की मेल्ल नगुम् ( ११०। १०९४ )

मैं देखूँ तो डालती, दृष्टि भूमि की ओर
ना देखूँ तो देख खुद, मन में रही हिलोर ।।

अट्रेमेन्दु अल्लुर् पडुपवो पेट्रेमेन्दु
ओम्बुदल् तेट्रा दवर ( ६३। ६२६ )

धन पा कर आग्रह सहित, जो नहीं करते लोभ
धन खो कर क्या खिन्न हो, कभी करेंगे क्षोभ ।।

ताम् वील्वार् मेन्रोल् तुयिलिन् इनदु कोल
तामैरैक् कण्णान ईलगु ( १११। ११०३ )

निज वनिता मृदु स्कंध पर, सोते जो आराम
उससे क्या रमणीय है कमल नयन का धाम ।।

कादलर् इल्वलि मालै कोलैक्कलत्तु
एदिलर् पोल वरुम् ( १२३। १२२४ )

वध करने के स्थान पर, ज्यों आते जल्लाद
त्यों आती है साँझ भी, जब नहीं रहते नाथ ।।

कण्णुम् कोलच्चेरि नेञ्जे इवैयेन्नेत्।
तिन्नुम् अवर्क्काण लुटु ( १२५। १२४४ )

नेत्रों को भी ले चलो, अरे हृदय, यह जान
उनके दर्शन हेतु खाते मेरी जान ।।

कलित्तानैक् कारणम् काट्टुदल कील्नीर्क्
कुलित्तनैत् तीत् तुरी इयटु ( ९३। ९२९ )

मद्यप का उपदेश से होना होश हवास
दीपक ले जलमग्न की करना यथा तलाश ।।

ओरुत्तारै ओन्राक वैयारे वैप्पर्
पोरुत्तरैप् पोन्पोर् पोदिन्दु ( १६। १५५ )

प्रतिकारी को जगत तो, माने नहीं पदार्थ
क्षमशील को वह रखे स्वर्ण समान पदार्थ ।।

ओलुक्कम् उडैमै कुडिमै इलुक्कम्
ईलिन्द पिरप्पाय् विड्डुम् ( १४। १३३ )

सदाचार सम्पन्नता, है कुलीनता जान
चूके यदि आचार से, नीच जन्म है मान ।।

पट्रि विडा अ इडम्पैकल् पट्रनैप्
पट्रि विडा अ दवर्क्कु ( ३५।।३४७ )

अनासक्त जो ना हुए, पर है अति आसक्त
उनको लिपटें दुःख सब और करे नहीं त्यक्त ।।
 


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