आफताब अहमद की कविताएँ

झाड़खंड के पालमु जिले में पैदा हुआ युवा पत्रकार आफताब गत १५ वर्षों से पत्रकारिता के पेशे से जुड़ा है । कम लिखने वाले, कम छपने वाले आफताब की कविताओं मे बैचेनी है, जो आजके युवा कवियों में कम दिखती है । मानवीय संवेदना की इस कविता के भीतर ना जाने कितने सवाल हैं, जो उस समूह की बैचेनी को व्यक्त करती है जो भीतर ही भीतर असुरक्षित महसूस कर रहा है । सवालों को खोलती सवालों में बन्द होती यह कविता अपने साक्षात अर्थ से हट कर भी पढ़ने योग्य है ।

भाई की तलाश


मैं घर का सबसे छोटा बेटा नहीं हूँ
मुझसे भी छोटा एक भाई है
है और था के बीच झूलता एक भाई,
नीली आँखों वाला, मुझसे कछ ऊँचा ६ फुट लम्बा कद्दावर भाई
कालेज से घर और घर से कालेज
कुल मिला कर यही थी उसकी दुनिया

ठंड की एक रात उसे पुलिस उठा कर ले गयी
कहाँ, यह किसी को नहीं पता

अगले दिन जब सब तरफ कोहरा छाया हुआ था
इस चाकू के धार वाले समय में
मैं अपने पिता के साथ
शहर के एक थाने से दूसरे थाने तक
अपने भाई को तलाश रहा था,

पूरे दिन तलाश के बाद भी
हम यह पता लगाने में असफल रहे कि मेरा भाई कहाँ है

हर थाने से एक रटा रटाया जवाब मिलता.. हमें पता नहीं

ऐसे गुजर गए कई कई दिनलेकिन भाई का पता नहीं चला
कई कई दिन और कई कई रातें
फिर सप्ताह महिने और साल
तलाश जारी रही लेकिन भाई का पता नहीं चला

इस बात को १४ साल गुजर गए
लेकिन कमबख्त कोहरा है कि खत्म नहीं होता

आप में से कोई
मेडिकल साइंस से जुड़ा हो तो उसके लिए
एक रोचक केस हमारे घर में है
१४ सालो से मेरी माँ एक क्षण सोई नहीं
७० की उम्र में रात रात भर कुर्सियों पर बैठ कर
सुनने की कोशिश करती है कोई आहट

कहीँ भी ईश्वर के ना होने के अपने दृढ़ विश्वास के बाद भी
मैं हर रोज करता हूँ प्रार्थना
कि हे ईश्वर, बचा रहे मेरी माँ का विश्वास
कि एक दिन लौटेगा मेरा छोटा भाई
और लिपट कर माँ को गोद में उठा कर आँगन भर में घूमेगा
फिर छूटते ही पूछेगा.. दद्दा को दवाई दी कि नहीं
और जब होगा बड़े भैया से सामना
तो शरारतन आँगन से कमरे में जाते हुए
सर खुजलाते हुए कहेगा...नोट्स लेने थे, इसलिए देर हो गई



मैं भी कहना चाहता हूँ उससे
छोटे, बहुत देर हो गई
इतनी देर गोया दर के बाद
केवल खाली जगह हो
या अब दुनिया में देर के बाद कोई जगह नहीं होती
लेकिन यह सुनने के लिए छोटे तक घर नहीं लौटा है

मेरा सबसे ज्यादा वक्त जाता है लावारिश लोगों
की सूचना अखबारों में पढ़ने में
रेल लाइन के पास पड़ी कोई लाश ही या
सड़क किनारे किसी पागल की मौत की खबर

पागलों की तरह
सब जगह जा कर हमने तलाशा है अपने भाई को
अफसोस कोई भी शक्ल मेरे भाई से नहीं मिलती

और आप हँसेंगे शायद
कि रेल गाड़ियों में जाते या यूँ ही सड़कों पर
कई कई बार पीछे से
कई कई नौजवानों के कंधे छू कर इन्हें पलटा है
कि ये अपना छोटा है
लेकिन नहीं

लोग हँस कर कह देते हैं .. कोई बात नहीं, होता है, होता है
मैं अपनी गलती पर सकुचाने के बाद भी
अचरज से भर जाता हूँ
कि कैसे कोई किसी के बारे में
इतनी गैरजिम्मेदाराना ढ़ंग से कह सकता है , कि कोई बात नहीं....

हर दीवाली, होली और ऐसे ही त्यौहारों पर
बचा कर रख दी जाती है
उसके हिस्से की मिठाई
कि जाने कब आ जाए

बेबसी एक शब्द भर नहीं है
छोटी छोटी मुस्कानों के बीच
कभी आप तलाशे तो वहाँ मिलेगी

माफ करं , मुझको मालूम है कि आप भी ऊब रहे होंगे
जैसा कि हर कोई हमारे किस्से सुन सुन कर ऊब चुका है
सिवाय मेरे घर वालों के

मेरा एक खास मित्र है
जो देर रात तक हमारे साथ घर में बैठा रहता है
लँबी साँस लेता हुआ मित्र
अक्सर ठंडे स्वर में कहता है... जीवन बहुत कठिन है मित्र
मैं धीरे से आकाश की ओर देखता हूँ और बुदबुदाता हूँ
मरना और भी कठिन
फिर आकाश में ही तलाशने लगता हूँ
छोटे का चेहरा

 


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