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नीरज
YANGCHEN LAMO
सन् 1974 की एक दोपहर, राजस्थान यूनिवर्सिटी के कैम्पस का अहाता,
उन दिनों विश्वविद्यालय में मात्र राजनीति नहीं सक्रिय हुआ
करती थी, कला व
साहित्य को भी काफी महत्व मिला करता था। एक दिन खबर मिली कि
आज रात को कवि सम्मेलन हैः- प्रमुख कवि है नीरज, खबर सुनते ही
छात्रों में अप्रतिम उत्साह छा गया। उन दिनों लड़कियों को रात को घर
से बाहर निकलने की इजाजत मुश्किल से ही मिला करती थी। इसलिए यही
कोशिश होती थी कि सांस्कृतिक कार्यक्रम साँझ तक निपट जाएँ। लेकिन
इस बार कवि नीरज थे, जिनके के पास वक्त की कमी हुआ करती थ , इसलिए कवि सम्मेलन रात को ही निश्चित हुआ। होस्टल में रहने वाली
छात्राओं को स्पेशल इजाजात मिल गई पर घर से आने वाली अनेक लड़कियों
को निराशा ही हुई। कवि सम्मेलन हुआ, उसकी सुगन्ध कई दिनों तक लोगों
के मन में बसी रही। नीरज को न देख पाने की कसक मेरी जैसी ना जाने
कितनी लड़कियों के मन में बनी रही। उन दिनो नीरज का एक गीत बेहद
लोकप्रिय थाः "कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहे"।
शायद कोई ही
मंजनू होगा जिसने इसे ना दुहराया हो। नीरज की लोकप्रियता फिल्मी
सितारों की सी थी। बाद में वक्त बदला, कविता में वाद आए, अनेक विवाद
उत्पन्न हुए, और हमारी पीढ़ी के कई चहेते साहित्यकार जैसे कि शिवानी,
नीरज आदि पर्दे के पीछे चले गए। नीरज के गीतों में न केवल आवाज या
छन्द का जादू था बल्कि अर्थवत्ता भी थी। पुरानी किताब में से नीरज
के गीतों को प्रस्तुत करने का एक कारण यह भी है कि यह समझा जाए कि
कोई भी विधा बेकार नहीं होती, समय की धूल की पर्त जरूर पड़ती है, पर
उसे भी झाड़ा जा सकता है।
रुके न जब तक साँस
रुके न जब तक साँस
न पथ पर रुकना थके बटोही!
साँसों से पहले ही जो
पंथी पथ पर रुक जाता
जग की नजरों में कायर वह
जीकर भी मर जाता है,
चलते- चलते ही जो मिट
जाता है किन्तु डगर पर
उसके पथ की खाक विश्व
मस्तक पर सदा चढ़ाता है,
पथ पर साँसो की गति से है
मूल्य अधिक पग गति का,
पग के छालों से पथ पर
यह लिखना, थके बटोही!
रुके न जब तक साँस
न पथ पर रुकना थके बटोही!
अगणित कठिन पहाड़ नदी की
राह रोकने
आते
पर उसकी गति के सम्मुख
सब चूर -चूर हो जाते,
चलना ही, बढ़ना ही जिसके
जीवन का व्रत प्रण है,

जग भर के तूफान प्रलय
घन उसको रोक ना पाते,
साँसो की गति से, पग गति से
अधिक प्रबल गति मन की
पग गति मे मन की गति
भरकर चलना थके बटोही!
रुके न जब तक साँस
न पथ पर रुकना थके बटोही!
जीवन क्या माटी के तन में
केवल गति भर देना
और मृत्यु क्या उस गति को ही
क्षण भर यति कर देना,
गति यति के जो बीच किन्तु,
है एक वस्तु अनजानी
यही मनुज की हार जीत के
क्रम की अमिट निशानी,
यही निशानी पथ पर जिसके
जीत बनी मुस्काए
मुस्काकर स्वागत शूलों का
करना, थके बटोही !
रुके न जब तक साँस
न पथ पर रुकना थके बटोही!
तुम्हारे लिए
तुम्हारे लिए ,
केवल तुम्हारे
लिए
हम यहाँ आए थे
केवल तुम्हारे लिए !
सुबह से शाम तक
यात्रा के सब पड़ाव
पड़े थे दुख ही के गाँव
साथी गर कोई था
तो वे थे काँटे,
या छालो भरे पाँव,
फिर भी हमने
गीत यहाँ गाए थे

तुम्हारे लिए ,
केवल तुम्हारे लिए
फलती थी सिर्फ विष बेल ही,
भूमि थी
ऐसी बंजर कठोर,
बोकर मगर कालजयी
सपने यहाँ साँझ भोर
कमल वन हमने उगाए थे
तुम्हारे लिए ,
केवल तुम्हारे लिए
अंचल में बंधे थे
करील मन
रज के रिश्ते हजार
होंठों पर प्यास के मरुस्थल थे
कंधों पर
निर्मम जिद्दी पहाड़
फिर भी हम अमृत ले आए थे
तुम्हारे लिए ,
केवल तुम्हारे लिए
जब भी हम आए हैं,
बेचे गए
केवल मरण के हाथ,
जागे तो दिये गए
निर्धनतम आँसू को
दिवस रात
फिर भी हम
हर दिन यहाँ धाये थे
तुम्हारे लिए ,
केवल तुम्हारे लिए
हम यहाँ आए थे
केवल तुम्हारे लिए!

नारी
अर्ध सत्य तुम, अर्ध स्वप्न तुम,
अर्ध निराशा आशा,
अर्ध अजित जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्ति पिपासा
आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया पानी
अर्धांगिनी नारी! तुम जीवन की आधी परिभाषा!
मुझे न करना
याद
मुझे न करना याद , तुम्हारा आँगन
गीला हो जाएगा।
रोज रात को नीन्द चुरा ले जाएगी पपीहों की टोली,
रोज प्रात को पीर जगाने आएगी कोयल की बोली।
रोज दुपहरी में तुमसे कथा कहेगी सूनी गलियाँ
रोज साँझ को आँख भिगो जायेंगीं वे मुरझाई कलिया।
यह सब होगा पर न दुखी होना तुम मेरी मुक्त केशिनी !,
तुम सिसकोगी वहाँ, यहाँ यह पग बोझिल हो जाएगा
मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।
कभी लगेगा तुम्हे कि जैसे दूर कहीं गाता हो कोई,
कभी तुम्हें मालूम पड़ेगा आँचल को छू जाता हो कोई।
कभी सुनोगी तुम कि कहीं से किसी दिशा ने तुम्हें पुकारा,
कभी दिखेगा तुम्हें कि जैसे बात कर रहा हो हर तारा।
पर न तड़पना, पर न बिलखना, पर न आँख भर लाना तुम!
तुम्हे तड़पता देख विरह शुक और हठीला हो जाएगा,
मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।
याद सुखद बस जग में उसकी, होकर भी जो दूर पास हो,
किन्तु व्यर्थ उसकी सुधि करना, जिसके मिलने की न आस हो।
मै अब इतनी दूर कि जितनी सागर से मरुस्थल की दूरी
और अभी क्या ठीक कहाँ ले जाए जीवन की मजबूरी।
गीत हंस के साथ इसलिए मुझकों मत भेजना संदेशा,
मुझको मिटता देख तुम्हारा स्वर दर्दीला हो जाएगा,
मुझे न करना याद , तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा।
मैने यह कब चाहा , मुझको याद करो, जग को तुम भूलो?
मेरी यही रही ख्वाहिश बस मैं जिस जगह झरूँ तुम फूलो
शूल मुझे दो, जिससे वह चुभ न सके किसी अन्य के पग में
और फूल आओ, ले जाओ, बिखराओ जन जन के मग में।
यही प्रेम की रीति कि सब कुछ देता, किन्तु न कुछ लेता है,
यदि तुमने कुछ दिया, प्रेम का बंधन ढीला हो जाएगा,
मुझे न करना याद , तुम्हारा आँगन गीला
हो जाएगा।

दीप और मनुष्य
एक दिन मैंने कहा यूँ दीप से
"तू धरा पर सूर्य का अवतार है,
किसलिए फिर स्नेह बिन मेरे बता
तू न कुछ , बस धूल कण निस्सार है?"
लौ रही चुप, दीप ही बोला मगर,
" बात तक करना तुझे आता नहीं
सत्य है सिर पर चढ़ा जब दर्प हो,
आँख का परदा उघर पाता नहीं।
मूढ़! खिलता फूल यदि निज गंध से
मालियों का नाम फिर चलता कहाँ?
मै स्वयं ही आग से जलता अगर

ज्योति का गौरव तुझे मिलता कहाँ?"
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