मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

फिर सवाल, यदि कविता जिन्दगी नहीं बचा सकती तो कविता का मतलब ही क्या? शब्द यदि शक्ति नहीं बन सकते तो शब्द- शक्ति का मतलब ही क्या? क्या जरूरत है उन्हें जाया करने की? यदि कविता जिन्दगी नहीं लिख सकती तो जिन्दगी के अभाव के लिए क्यों लिखी जाए? कहीं शब्द द्रवित ना बन जाए, द्रवित शब्दों में शक्ति नहीं पीड़न होता है। जिसमें भावनाएँ पिघलने लगती है। पिघलते भाव शब्दों को क्या शक्ति देंगे?

भारतीय काव्य शास्त्र में इस पर काफी चर्चा हुई है। काव्य मीमांसा में कहा गया है कि यदि कवि सामान्य की भावनाओं तक ना पहुँच पाए तो कवि- कर्म का क्या प्रयोजन?

रति सक्सेना
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उसने हौले से हाथ फिराया
साँझ के फूलों पर
वह जिसे बेहिसाब प्यार मिला
उस दूसरी दुनिया में

उसके हाथ फूलों की पंखुड़ियों से भरे हैं
फिर भी लाल नहीं है

बाद में फीके पड़ गए
कहीं दूर मालूम पड़ा कि
लड़की के स्पर्श से
खुशबू बिगड़ गई

कटरीना कस्त्सिरि

*****
भीत पर अब भी तुम्हारे पीले हाथों की छाप है
एक सुगन्ध है
वही अब तुम्हारी उपस्थिति है
यादें फूटतीं हैं कितनी ही कोंपलों की तरह
और लग रहा है
हम ठूंठ भर नहीं हैं।
कूकती है कोयल कहीं दूर
और तुम्हारे इन पीले छापों में से होकर
गुजरते हैं हम वसन्त की राह में........

प्रमोद त्रिवेदी***
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समझ में नहीं आता, जया ने जवाब दिया। शायद कक्षाओं में कविता को नीरस नहीं बनाया जाए तो कविता का कोई भविष्य सोचा जा सकता है। मुझे अजेय की चिट्ठी का ख्याल आया जो उन्होने कृत्या को लिखी थी और जिसे संपादकीय में छापा गया था। अजेय ने भी करीब- करीब यही बात की थी। यहाँ भी सभी युवा इस बात से सहमत दिखाई दिए कि क्लास रूम में ही कविता की हत्या हो जाती है। जिस तरह से कविता पढ़ाई जाती है उससे बच्चों के मन में कविता के प्रति एक भय सा बैठ जाता है। सवाल यह है कि यदि कविता नहीं पढ़ाई जाएगी तो बच्चों तक कैसे पहुँचाई जाएगी, लेकिन साथ ही गलत शिक्षण प्रणाली कविता के प्रति अनजाना भय भी बैठा सकती है। प्रत्यक्षा ने स्वीकार किया कि अब वे पुराने कवियों को नेट से निकाल कर पढ़ती हैं। यानी कि सवाल अभिरुचि का है, जबरदस्ती का नहीं। संगीता और जया भी इस बात से सहमत हुई कि अभिरुचि जगानी पड़ती है, अपने आप को लगातार ताजा बनाए रखने की कोशिश की जाती है, तभी कुछ लिखना संभव होता है।
 
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अर्ध सत्य तुम, अर्ध स्वप्न तुम, अर्ध निराशा आशा,
अर्ध अजित जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्ति पिपासा
आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया पानी
अर्धांगिनी नारी! तुम जीवन की आधी परिभाषा

*

याद सुखद बस जग में उसकी, होकर भी जो दूर पास हो,
किन्तु व्यर्थ उसकी सुधि करना, जिसके मिलने की न आस हो।
मै अब इतनी दूर कि जितनी सागर से मरुस्थल की दूरी
और अभी क्या ठीक कहाँ ले जाए जीवन की मजबूरी।
गीत हंस के साथ इसलिए मुझकों मत भेजना संदेशा,
नीरज

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*

धैर्य शक्ति में, सैन्य शक्ति में
परोपकार, उदार भाव में
सार शास्त्रों के ज्ञान दान में
                   भारत देश सर्वोत्कृष्ट है।
नेकी में तन की क्षमता में
संस्कृति में, अपनी दृढ़ता में                  
स्वर्ण मयूरी पतिव्रता में
                   भारत देश सर्वोत्कृष्ट है।
नव रचनात्मक कार्यों में रत
उद्योगों में परमोत्साहित
भुजबल और पराक्रम मंडित
                   भारत देश सर्वोत्कृष्ट है।
अति महान आदर्शों वाला
अवनी रक्षा का मतवाला
सिन्धु सदृश बृहद अनीवाला
                  भारत देश सर्वोत्कृष्ट है।
मेघाशक्ति मनोदृढ़ता में
शुभ संकल्प, कार्यक्षमता में
सत्य भावमय ध्रुव कविगण में

                 भारत देश सर्वोत्कृष्ट है।

सुब्रह्मण्यम भारती
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VOL -  II/ PART -1

(जून -
2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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