मेरी बात                                                         


उसकी आँखों को इंतजार नहीं- तिनके भर भी हरियाली का, साँसों की चिड़िया अब कभी- कदार ही आती है उसके सीने के घौंसले में तिनका रखने, उसके भाव दिल की तलहटी में जम से गए हैं, उसकी उंगलियाँ प्रेम गीतों के मनकों पर फिसलने से हिचकने लगीं हैं, उसे शब्दों के संसार से देशनिकाला मिल गया है। वह , जो मेरे दर्द में भागीदार रहा, वह जो मेरे दर्ग का कारण रहा है, चटखे हुए मटके जैसे टप- टप टपक रहा है।

मैं उसकी चूती जिन्दगी के नीचे अपनी हथेली लगाना चाहती हूँ, मैं उसके साँसों के मोतियों को अपनी अंजुरी में समेटना चाहती हूँ। मैं कुछ भी करना चाहती हूँ, क्या? यह तो मैं खुद ही नहीं जानती हूँ।

क्या
प्रार्थना करूँ?        
कविता लिखूँ?  
                                                                                                                                   GREEN TARA 
क्या कविता लिखी जा सकती है...                                  
                   
ऐसे क्षण भी ?
क्या निचौड़ा जा सकता है...
भावनाओं को इन पलों में भी?
क्या मेरी कविता बचा सकती है उसकी
जिन्दगी ?

फिर सवाल, यदि कविता जिन्दगी नहीं बचा सकती तो कविता का मतलब ही क्या? शब्द यदि शक्ति नहीं बन सकते तो शब्द- शक्ति का मतलब ही क्या? क्या जरूरत है उन्हें जाया करने की? यदि कविता जिन्दगी नहीं लिख सकती तो जिन्दगी के अभाव के लिए क्यों लिखी जाए? कहीं शब्द द्रवित ना बन जाए, द्रवित शब्दों में शक्ति नहीं पीड़न होता है। जिसमें भावनाएँ पिघलने लगती है। पिघलते भाव शब्दों को क्या शक्ति देंगे?

भारतीय काव्य शास्त्र में इस पर काफी चर्चा हुई है। काव्य मीमांसा में कहा गया है कि यदि कवि सामान्य की भावनाओं तक ना पहुँच पाए तो कवि- कर्म का क्या प्रयोजन?


काव्येन किं कवेस्तस्य तन्मनोमात्रमवृत्तिना।
नीयन्ते भावकैर्यस्य न निबन्धा दिशो दश।।
           (काव्य मीमांसा --चतुर्थ अध्याय)

हर्ष चरित में भी यही बात कही गई है ...

कि कवेस्तस्य काव्येन सर्ववृत्तान्तगामिनी।
कथेव भारती यस्य न व्याप्नोति जगत्त्रयम्।।
               (हर्ष चरित-1.10)

इसका मतलब तो यही है ना कवि को अपना कर्म करते रहना है परम शक्ति के द्वारा डाले गए खलल के बावजूद । इस तरह वह एक ऐसा संसार बना लेगा जहाँ पर असली संसार का व्यथित जन आकर क्षण दो क्षण विश्राम कर सके। संभवतः कुछ जोड़ी आँखे अपनी पीड़ा या आनन्द से संवाद करने के लिए कुछ शब्द खोज लें। कहाँ तक भाग सकता है कवि अपने कर्म से? अन्ततः उसे आग में चलना ही पड़ेगा! पीड़ा या आनन्द, कष्ट या विनोद, सभी को शब्दों की दुनिया में बसाना पड़ेगा। तभी तो कृत्या धरती के साथ सूरज की एक परिक्रमा पूरी कर फिर से चलने को तैयार है। चरैवेती ..चरैवेती....

इस अंक के लिए जो चित्र मिले हैं वे कृत्या के लिए काफी महत्वपूर्ण है। इन्हें केलंग से अजेय ने विशेष आग्रह के साथ भेजा है। ये चित्र बौद्ध चित्रकला के अप्रतिम उदाहरण हैं। इन्हें तंका कहा जाता है। तंका पारंपरिक बौद्ध चित्र कला है जिसमें बौद्ध देवता और उनके ब्रह्माण्ड‍ विज्ञान की बारीकियों को विस्तार से रेखांकित किया जाता है। इस कला की विशेषता है, रंगो का सामंजस्य । ये कला गुरु शिष्य परंपरा से सीखी जाती है और इनका प्रयोग धार्मिक प्रयोजन में किया जाता है।
कृत्या में प्रस्तुत
Yangchen Lamo, Green Tara, Jambeyang नामक चित्र Rev. Tsultrim Tanzin द्वारा बनाए गए हैं। आपका जन्म हिमाचल प्रदेश की Mayar valley के टिंग्रेट गाँव Tingret village में हुआ था।
 आपने “Gompa Style Painting School” से  तंका कला की शिक्षा पाई‍ जिसे एक तिब्बती कलाकार ने हिमाचल प्रदेश मनाली में चलाया था।
Rev. Tsultrim Tanzin की चित्रकला का देश और विदेश के अनेक स्थानो पर ससम्मान प्रदर्शन हो चुका है? VAJRAKEEL नामक चित्र हिमाचल प्रदेश की Bunan valley के कलाकार Rev. Lama Paljor द्वारा बनाया गया है। आपका जन्म . सन् 1945 मे Kardang villageमें हुआ था। आपको Kardang Monastery के Aipa School of Budhist Paintings के कलाकार Sumnam के Lama Yontan से पेन्टंग की शिक्षा मिली। MILAREPA,. नामक चित्र बौद्ध पोस्टर से लिया गया है। इस अद्भुत कला से परिचय करवाने के लिए कृत्या दोनों कलाकारों की आभारी है।

कृत्या के इस अंक में समकालीन कविता के अन्तर्गत विश्व के कई समकालीन कवियों की कविताओं से परिचित करवाने की कोशिश की है। इससे हिन्दी के पाठकों को कविता के सन्दर्भ में नए आयाम मिलेंगे। हमारे अग्रज के रूप में
सुब्रह्मण्यम भारती को याद करना हमारी सोई हुई देश भक्ति को जगाना है। प्रिय कवि के रूप में नीरज निसन्देह भूली- बिसरी यादें जगाते हैं। कविता के नाम पर कृत्या के ही युवा कवियों के विचार व संवाद प्रस्तुत हैं।

आशा है कि कृत्या अपनी यात्रा को इसी तरह से जारी रखेगी और कविता के युग में पहचान कायम करेगी।

शुभकामनाओं सहित

रति सक्सेना


Please read an interview with Rati Saxena by editor andwerve.com

http://andwerve.com/june06_featured_artist

http://andwerve.com/rati_saxena

 


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