कविता का भविष्य-- एक संवाद

नेट जगत की अपनी सुविधाएँ हैं तो असुविधाएँ
भी। यहाँ संवाद जितनी तीव्रता से आरपार होता है, उतनी ही
संवादकर्ताओं में दूरी बनी रहती है। कृत्या की ही बात लें तो अभी तक कुछ
संपादकों से दूरभाषीय संवाद मात्र संभव हो पाया है। आमने-
सामने बैठ कर संवाद में जो गोष्ठी का आनन्द आता है उससे वंचित
रहना पड़ा हैं। पिछली बार दिल्ली यात्रा के दौरान कृत्या के युवा
लेखकों से मिलने का मन बनाया तो , कला संपादक
विजेन्द्र
ने एक अनौपचारिक गोष्ठी का आयोजन किया। स्वाभाविक था कृत्या और
कविता, यहाँ भी संवाद का माध्यम रहीं। गोष्ठी में
प्रत्यक्षा, जया पाठक, संगीता मनराल,
विजेन्द्र विज और आशुतोष सिंह के
साथ प्रत्यक्षा की बिटिया और पति भी मूक श्रोता के रूप में उपस्थित
थे। ये सभी युवा कवि कार्यरत हैं, विशेष रूपसे तकनीकि जगत में। अतः
वक्त निकाल कर गोष्ठी में भाग लेना इन सब के लिए कठिन था, पर सभी
दूर- दराज से चले
JAMBEYANG
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आए, जो
उनके दिल में कृत्या के प्रति
प्रेम को दर्शाता है। स्वाभाविक है कि मेरी उत्सुकता कविता के
प्रति ही थी। मैंने पहला सवाल यही किया कि .....वर्तमान
सन्दर्भ में, जब कि कविता का वजूद ही खतरे में पड़ता जा रहा है,
आप के लिए कविता क्या महत्व रखती है।
सभी की तरफ से प्रत्यक्षा ने जवाब दिया कि ..आफीस और घर की
मोनोटोनी को तोड़ने में मदद करती है, भीतर की जड़ता को चटकाने का
हथियार है। प्रत्यक्षा का जवाब एक कटु सत्य है, कोई सन्देह नहीं।
किन्तु यह भी सोचने की बात है कि युवा पीढ़ी डिस्को और बीयर बार की
जगह कविता, संगीत आदि गंभीर शौकों से जड़ता को तोड़ने के लिए भी
तैयार है। विजेन्द्र जैसे भी युवा हैं जो कला और जिन्दगी को एक साथ
देखते हैं। इस जवाब से एक सवाल भी उठता है कि हमने अपने से युवा
पीढ़ी के लिए ऐसा क्या छोड़ा कि वे अभिरुचि में उत्तम कलाओं को ही
अपनाएँ? फिर भी यदि वे अपनाते हैं तो हमें अहसान ही मानना पड़ेगा।
कम से कम भारत में तो इस बात की संभावना नहीं है कि कोई युवा लेखन
को सर्वस्व मान ले और जीवन आसानी से चला
ले, तो यदि वे कविता को पार्श में रख कर अपनी तरह से जीते है तो
हमे उनका शुक्रिया मानना चाहिये।

मेरे मन में यह इच्छा उत्पन्न हुई कि यह जाना जाए कि इन युवाओं के
पास कविता के कितने संस्कार हैं, इसलिए अगला सवाल था कि..
आप लोगों ने कितने और कौन- कौन से कवियों को पढ़ा है?
सबसे पहले जवाब प्रत्यक्षा का आया.. ज्यादा नहीं, दरअसल पढ़ने का
संस्कार तो था, पर कथा, उपन्यास ज्यादा पढ़े हैं। कविता तो बस कोर्स
की पढ़ीं हैं, हाँ अंग्रेजी साहित्य भी काफी पढ़ा है। मुझे उसके जवाब से
आश्चर्य नहीं हुआ। क्यों कि हमारे प्रकाशक कविता की पुस्तक नहीं
बिकने का रोना तो रोते हैं किन्तु कविता छापते नहीं हैं। इस तरह
कविता के चाहने वालों को अच्छी कविता मिल ही नहीं पाती है। हाँ जया
पाठक का जवाब जरूर सन्तुष्ट करने वाला था । जया ने बताया कि
उन्होंने करीब- करीब सभी नामी कवियों-.दिनकर,
मैथिलीशरणगुप्त महादेवी और मुक्तिबोध आदि को पढ़ा है। संगीता मनराल,
विजेन्द्र ने भी कवियों को पढ़ा है, और ध्यान से पढ़ा है।विजेन्द्र
को तो बचपन से ही गंभीर कविता पढ़ने का शौक रहा है। आशुतोष की भी
यही स्थिति रही है, उन्होंने देशी-
विदेशी अनेक कवियों को पढ़ा। लेकिन शायद इनमे से किसी ने भी कविता
को उस तरह से अपनाया जिस तरह से हमारे अग्रज कवियों. महादेवी ,
दिनकर, निराला आदि ने अपनाया? इसका क्या मतलब हो सकता है? क्या
हमारे भविष्य में कोई भी दिनकर, पंत या निराला नहीं होगा, या फिर
मीरा का खिताब महादेवी के साथ ही खत्म हो जाएगा? लेकिन इसमें कोई
संदेह नहीं कि ये युवा लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। यद्यपि
वे अपना शतप्रतिशत नहीं दे पा रहे हैं, किन्तु कविता को आगे बढ़ा
जरूर रहे हैं। इनके साथ भाषा को नए मुहावरे मिलें हैं, नया तेवर
मिला है, बस कमी है सही प्रौत्साहन की।

कविता का भविष्य क्या है?
मेरे इस सवाल ने युवा चेहरों को चिन्ता में
डाल दिया।
समझ में नहीं आता, जया ने जवाब दिया। शायद कक्षाओं में कविता को
नीरस नहीं बनाया जाए तो कविता का कोई भविष्य सोचा
जा सकता है। मुझे अजेय की चिट्ठी का ख्याल आया जो उन्होने
कृत्या को लिखी थी और जिसे संपादकीय में छापा गया था। अजेय ने भी
करीब- करीब यही बात की थी। यहाँ भी सभी
युवा इस बात से सहमत दिखाई दिए कि क्लास रूम में ही कविता की हत्या
हो जाती है। जिस तरह से कविता पढ़ाई जाती है उससे बच्चों के मन में
कविता के प्रति एक भय सा बैठ जाता है। सवाल यह है कि यदि कविता
नहीं पढ़ाई जाएगी तो बच्चों तक कैसे पहुँचाई जाएगी, लेकिन साथ ही
गलत शिक्षण प्रणाली कविता के प्रति अनजाना भय भी बैठा सकती है।
प्रत्यक्षा ने स्वीकार किया कि अब वे पुराने कवियों को नेट से
निकाल कर पढ़ती हैं। यानी कि सवाल अभिरुचि का है, जबरदस्ती का नहीं।
संगीता और जया भी इस बात से सहमत हुई कि अभिरुचि जगानी पड़ती है,
अपने आप को लगातार ताजा बनाए रखने की कोशिश की जाती है, तभी कुछ
लिखना संभव होता है।

यहीं पर मैंने एक समस्या उठाई कि
साहित्य से जुड़े लोगों का कहना है कि नेट पर आने वाले साहित्य का
स्तर कम होता है। शायद यह इसलिए
है कि इससे जुड़कर लिखने वाले साहित्य को मनोविलास के रूप में देखते
हैं या फिर वे असली साहित्य से जुड़ते ही नही। इस में कोई सन्देह
नहीं कि भारत में अब भी साहित्य प्रिन्ट मीडिया से ज्यादा जुड़ा है।
केवल नेट के माध्यम से साहित्य को समझना कठिन है। मेरे सामने बैठी
युवा पीढ़ी नेट से जुड़ी है, और पूरी तरह से। ये सब अपने समय को स्वर
भी दे रहे है। इसलिए कहा जा सकता है कि भविष्य में नेट पर आने वाला
साहित्य अपनी पहचान बनाएगा।
मुझे यह भी लगा कि नेट का जगत अभी तक वादों से मुक्त है, यहाँ
लिखने की छूट है, इसलिए यहाँ लगातार लिखा जा रहा है, जो स्तर का
होगा वह स्वतः टिक जाएगा और स्तर हीन झड़ जाएगा। मुझे लगा कि इसमे
गलती नेट से जुड़ने वालों की नहीं बल्कि अपने को अलग- थलग रखने वालों
की है।
विजेन्द्र एक ऐसे कवि हैं जो चित्रकला से ज्यादा जुड़े हैं। मैंने
उनसे पूछा कि कविता उनके लिए क्या है तो विजेन्द्र का जवाब था कि
मैं जो कुछ लिखता हूँ, वह मानों
पेन्ट करता हूँ और जो चित्र बनाता हूँ वह कविता लिखता हूँ।
विजेन्द्र के चित्रों की जो विशेषता कृत्या के पाठकों को महसूस हुई
वह है, रंगो का समावेश और उनका चटकीलापन। विजेन्द्र ने यह स्वीकारा
कि पहले उनके रंग कुछ "डल" हुआ करते थे, किन्तु अब उनमें एक चमक आती
जा रही है। मुझे विजेन्द्र के चित्रों की चमक सभी युवाओं की आँखों
में दिखाई दी। मुझे लगा कि हमें ना तो कविता के भविष्य के लिए
चिन्तित होना है और ना ही उसके स्तर के लिए।
यदि कुछ युवा महानगरीय आपाधापी से लड़ते हुए भी कविता के लिए वक्त
निकाल रहे हैं, कुछ अनछुआ भोगा लिख रहे हैं । उनके लिए कविता करना
बाध्यता नहीं है, वे लगातार साहित्य से जुड़े भी नहीं हैं, फिर भी
लिख रहे हैं, और अच्छा लिख रहे हैं तो कौन कहता है कि कविता का
भविष्य अंधकार में है ।

प्रस्तुति----रति
सक्सेना