जबरनाथ पुरोहित की कविता           

                                                                                              
मेरा विराट

जबसे
मेरे सिर पर
आ गई छत
आकाश से मेरे आँगन के
सारे ही रिश्ते
टूट गए
सूरज
मेघ
चाँद
सितारे
उन्मुक्त उड़ते पंछी
लहरातीं पतंग
सारे ही साथी                                                                    
छूट गए
दूर- दूर तक उँचाइयों को                                                    
          
बहुत उँचाइयों को छूती मेरी दृष्टि                                 
दुबकी बैठी एक कोने में
इस छत ने
छीन लिया मुझसे
मेरा विराट !

( जबरनाथ पुरोहित की कविताएँ )


जोन्न टोलसन (Joanne Tolson) की कविता

बूढ़े आदमी का चलना

वे चलते हैं सड़क किनारे, मकड़े की तरह
छड़ी के सहारे आगे बढ़ते
पीछे झुकते
बन गये हैं ग्रीक पहेली
पहले बच्चा
फिर आदमी
फिर बच्चा
मैं देख रही हूँ पिता का मिटना
रेत पर खिंची लकीर जैसा
दो कदम आगे, दो पीछे
अब वे पढ़ नहीं सकते यह कविता
बिस्तर पर लेटे हुए
चिन्ता ही नहीं उन्हें इस दुनिया की
वे सोच रहे है अन्त के बारे में
बूढ़े अनन्त का सफर करते हैं।

( जोन्न टोलसन अन्य कविताएँ )


दिमित्री पेपादोपालस (Dimitris Papadopoulos) की कविता

उसने सीखा


उसने अपनी उदासी
गुलाब को दे दी
आँसू को वैसे ही माना
जैसे कि बरसाती बून्द
गुलाब की पंखुड़ियों पर

एक परछाई
उसने नजर उठाई
आज की रात
तुम वसन्त से होगे
उसने उससे कहा--

तुम पसन्द करो शायद


(  दिमित्री पेपादोपालस की कविताएँ )


कटरीना कत्सिरि (Katerina Katsiri) की कविता


लड़की के स्पर्श से


उसने हौले से हाथ फिराया
साँझ के फूलों पर
वह,  जिसे बेहिसाब प्यार मिला
उस दूसरी दुनिया में

उसके हाथ फूलों की पंखुड़ियों से भरे हैं
फिर भी लाल नहीं है

बाद में फीके पड़ गए
कहीं दूर मालूम पड़ा कि
लड़की के स्पर्श से
खुशबू बिगड़ गई


(
 कटरीना कत्सिरि  की कविताएँ )


रोर ह्यूम्स (Roger Humes)  की कविता

टूटी मोमबत्तियाँ

सुबह की मेज के चौखानेवाले मेज पोश पर
टूटी हुई मोमबत्तियों के निशान जैसे कि तैसे बचे हैं
पिघले मोम के बीच, अकेली बत्ती
लौ से आखिरी सम्वाद
तुम्हारी परछाई को दर्शाता , तुम्हारे लुप्त होने से पहले
यह गहन अकेलेपन दरवाजा ही तुम्हारे लौटने मार्ग
जहाँ से जिन्दगी विदा हो गई है
जिसे तुम अपना कह सकती हो

मन्दिम संगीत मंडरा रहा है
वहीं जहाँ तुम खड़ी हुई थीं, मेरे शब्द बिखर रहे हैं
मरुस्थल में इन्द्रधनुष पड़ा सूख रहा हो ज्यों
जब तुम अपने आप ही चल दी, शायद
निगाह तुम्हारे कंधों पर मंडराई होगी
मैं यूँ ही जड़वत खड़ा देखता रहा,
अपलक उस दूर के साथी को, लगातार
उस समुद्री यात्री को, लगातार उसको
जो वहीं बसना चाहता है, जहाँ तुम्हारे
दिल का नक्शा ले जाता हो।

मेरे हाथ काँपते हुए दराज तक पहुँचते हैं
मेज के लिए दूसरा बिछौना निकालने को
शायद दूरदराज किसी शाम के आनन्द के इंतजार में
जहाँ आन्नद के झुरमुटे में महसूस करूँगा मैं तुम्हें
सन्नाटे के गहराने के साथ मैं तुम्हारी उपस्थति
महसूस करता हूँ इस दहलीज पर, मेरी बाँहे मेजपोश
पर पड़ी हैं, दुआ के शब्दों का हिसाब लगाते हुए,
तुम्हारे शब्द थके पलों के नीचे, यह जतलाते हुए
तुम्हारा आखिरी ठिकाना मैं ही हूँ, जहाँ से
जिन्दगी विदा ले रही है।

(  रोर ह्यूम्स की अन्य कविताएँ  )


प्रमोद त्रिवेदी की कविताएँ
(अपनी बेटी के लिए)

भीत पर अब भी तुम्हारे पीले हाथों की छाप है
एक सुगन्ध है
वही अब तुम्हारी उपस्थिति है
यादें फूटतीं हैं कितनी ही कोंपलों की तरह
और लग रहा है
हम ठूंठ भर नहीं हैं।
कूकती है कोयल कहीं दूर
और तुम्हारे इन पीले छापों में से होकर
गुजरते हैं हम वसन्त की राह में........

( प्रमोद त्रिवेदी की कविताएँ )
 


रति सक्सेना की कविताएँ
 


एक और बारह के बीच

बरसों बरसों से
मेरे सीने के ठीक बीचोबीच
जड़ी थी एक घड़ी
एक से बारह के बीच में
वक्त को पकड़ कर
एक पाँव से घिसटती
दूसरी से सरपट दौड़ती

मैं दौड़ती रही सुइयों के साथ
रुक कर थमती रही
जिन्दगी के साथ
दुआ कर रही थी कि
टूट जाएँ ये सुइयाँ
बिखर जाए वक्त
गुलाल सा, हथेली पर

बरसो बरसो बाद
अचकचा कर रुक गई घड़ी
टिकटिकाहटों को समेट
मुँह लटका खड़ी हो गई
वक्त के मकड़ जाल ने
लपेट लील लिया मुझे

चीख उठी मैं
कहाँ है सुइयों की रस्सी
कहाँ है मेरी घड़ी

वक्त हँस पड़ा
चल दिया मुझे छोड़

( रति सक्सेना की कविताएँ )

 


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