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केहरी सिंह मधुकर
डोगरी कविता को स्थिरता और विशालता प्रदान करने का श्रेय कवि
"मधुकर" को जाता है। केहरी सिंह का जन्म जम्मू जिले के गुडा
स्थालिया गाँव में 1930 में एक समृद्ध राजभक्त परिवार में हुआ था।
स्वभाव से क्रान्तिकारी इस कवि में राजभक्ति की वह परम्परा नहीं
थी। उनकी शिक्षा जम्मू के "प्रताप मेमोरियल स्कूल " तथा " प्रताप
कालेज श्रीनगर में हुई थी।
पढ़ाई के दिनों से ही वे साहित्यिक गतिविधियों में भी सक्रिय रहे।
केहरी सिंह ने लिखा गया है कि उन्होंने 1950 तक हिन्दी में लिखा
किन्तु बाद में मातृ- भाषाओ का प्रचलन शुरु होने पर उन्होंने भी
डोगरी में लिखना शुरु किया। डोगरी कविताओं का पहला संग्रह " नमिया
मिंजराँ " नाम से 1954 में प्रकाशित हुआ।
1961 से उन्होंने जम्मू कश्मीर अकादमी
आफ आर्ट , कल्चर एण्ड लैंग्वेजेज में डोगरी " शिराजा "
के सम्पादक के पद पर काम किया। उनका दूसरा संग्रह " डोला कुन्न
ठप्पेआ" 1964 में प्रकाशित हुआ, जिस पर उन्हें कल्चर अकादमी का
पुरस्कार भी मिला। उनका तीसरा संग्रह " मे मेले रा जानु" साहित्य
अकादमी द्वारा 1977 में पुरस्कृत हुआ।
1976 में डोगरी कविता में वर्ग संघर्ष को तेज करने के लिए उन्हें "
रोब आफ आनर" के साथ सम्मानित किया गया था।
उनका चौथा कविता शंग्रह " पद्म गोखरू" भी
1989 में प्रकाशित हुआ
था। डोगरी कविता में गजल स्थिरता देने वाले तीन स्तम्भ कवियों में
से एक थे " कवि मधुकर"।
यूँ तो मधुकर जी ने मुक्त- छन्द में भी रचनाएँ , गीतिकाएँ रची हैं।
मधुकार जी द्वारा रवीन्द्र नाथ टैगोर की
101 कविताओं का पद्य अनुवाद
डोगरी साहित्य को विशेष योगदान है। मधुकर की कविता में कल्पना
अनुभव भावनाओं का पुट है। उन्होंने डोगरी कविता को अन्य भारतीय
भाषाओं की कविताओं के समकक्ष पहुँचाया था।
उम्मीद
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कुँवारी मुस्कान!
तुम कोई सुहाग सेज किसी की
ताजी हैं फूल और कलियाँ
तुम जल की उद्गम धारा
जिसका घूंट भी नहीं
अभी तक पिया गया
तुम अनलिखा गीत
नहीं जहाँ पहुँचे कोई सुर
सुन चन्दा की चान्दनी
तुम गगन की सुरसरिता
कोई पावन किरण
जिसकों लहरे तरसे।।
सुन चन्दा की चान्दनी
मारों इक क्षणिक फेरा
उस जमी पर नीचे जहाँ
हर ओर है उजाड़
मारक विराना और चुप्पी
वैरी अंधेरा- गुब्बार!!
सुन चन्दा की चान्दनी,
तुम अनभेदा कोई मोती,
तुम कोई ऐसा भाव
नहीं कवियों ने शब्दों में बाँधा
तुम ऐसी मूरत
जो बस ख्यालों में हो!!
सुन चन्दा की चाँदनी
जरा उठाओं सालू का पल्लू
इस बियावान में चुप- चुप
पछताए दुर्ग अनमना
खण्डित बुर्ज मिनार
सहमे नैन झरोखे
विधवा बारादरियाँ
मुँह बाएँ देखते दरवाजे !!
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम अनहोनी कोई होनी
तुम सपनों के महल में
अनचाही कोई याद
तुम अनजानी राह
नहीं जिसने सेंक हथेली का जाना!!

सुन चन्दा की चाँदनी
चलो तो मेरे साथ
इन मिनारों में आज भी खनकती
तलवारों की धार
इन झरोखों में आज भी चमकते
मारक नैन कटार !!
बारादिरों में आज भी झाँझर
रुन- झुन, रुन- झुन, छनके !
दरवाजों पर लौ करते
आज भी मणिया जवाहर !!
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई कुँवारा हास
पर हंसो का रसिया
आज भी फिरता हारा- हारा !!
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई सेज सुहागन
पर सेज का स्वामी मुसाफिर
घूमे देश बेगाना
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम को निर्मल जल स्रोत
पर तुम्हारा साजन प्यासा
फिरे प्यासा थार- थार!
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई गीत अनरचा
पर गीतों को चाहने वाला
सौ- सौ आँसू पीता !!
सुन चन्दा की चाँदनी
तुम कोई निर्मल आकाश गंगा
फिर भी भागीरथ तुम्हारा
माँगे, जहर भरा प्याला !!
सुन चन्दा की चाँदनी
क्यों हो गई तुम उदास
नहीं मिलते धरती अम्बर
प्यारी! झूठी तेरी उम्मीद
सुन चन्दा की चाँदनी
तेरे चारों ओर सुन्दरी
अमावासों के अंधेरे
मेरे चारों ओर ओ कली,
कई स्वार्थों के घेरे
न तुम दोषी, न मैं दोषी
न यह बुर्ज मिनार
यह प्रेम का दुर्ग शौदाई
दिन में भी गिनता तारे!!
अनुवाद = अरुणा शर्मा
मैं बनाम मैं
मेरी सभ्यता
मेरी तहजीब
मेरी जाँत- पाँत अपनी !
मेरा शरीर
मेरी नाड़ियों में लाल लहू
दौलत मेरी!
मेरा अहम पागलपन अपना!!
मेरे पैरों की बेड़ी है
मेरे हाथों की जंजीर है
मेरे होने के लिए सीप है
और इस सीप में
मोती नहीं
नरक भोग रहा कीड़ा है।
कभी
चाँदी की कोख में
कभी
सोने के गर्भ में
कभी
आग की रंगत लिए
ताँबे

की खोहों में
कभी गौओ की गिनती से
कभी गाँवों देहातों से
और
कभी टाँकी मुद्राओं से
बना है हुलिया अपना!!
इन तानों और बानों से
मेरी ओकात तौली गई।
मेरे रुतबे की बोली लगी
मैँ नहीं मनुष्य?
इस कारण
मनुपुत्रों से कोई
नाता नहीं।
मैं कैदी हूँ....
नस्ल का
कौम का
भूगोल की हदबन्दी का
यह मेरा कैदखाना है।
अनुवाद- अरुणा शर्मा शीशा
यह कौन झाँकता शीशे में?
किसका है प्रतिबिम्ब?
मेरा?
नहीं मैं नहीं, कदापि नहीं
मैं ज्ञानी- दानी पराक्रमी
दुनिया का सच्चा उपकारी
नहीं यह मेरा प्रतिबिम्ब!
यह कोई चोर लफंगा लगता
डाकू- लुटेरा दिखता
यह निस्तेज चेहरा
मुँह पर ज्यों थुपी कालिख
कमरे में बस मैं हूं अकेला
फिर, यह कौन
झाँक रहा शीशे में
किसका प्रतिबिम्ब?
मेरा?
नहीं , हो सकता मेरा!
मेरी आँखों के संकेत से
रचे जाते हरदिन इतिहास
हर कदम मेरा कहलाता मंजिल
मैं मोह त्यागी, निष्काम भक्त
कवि लेखक
सारी दुनिया माने मेरा लोहा
यह नहीं मेरा प्रतिबिम्ब है
यह कौई धोखेबाज फरेबी
बहुत झूठा चापलूस
आँखों में भरी चालाकी !
इस कमरे में मैं अकेला
फिर कौन रहा झाँक
किसका यह प्रतिबिम्ब ?
अरे मित्रों!
शीशा है मेला
धो लेता हूँ इसे पहले
अरे, यह कौन कह रहा है
" क्या धोएगा शीशे को
धो ले पहले मन का मैल ।।"
 अनुवाद
अरुणा शर्मा एक वसीयत- नए आदमी
के नाम
कोई दावा नहीं करना
कोई दावा नहीं करना ।।
मेरे विश्वास, भय मेरे
मेरे तो जुर्म ठहरे हैं ।
जन्मजात आजादी पर
कई वर्गों के पहरे हैं ।।
दया मेरी में फंदे है
धर्म मेरा यह कातिल है।
मेरे इमान के पर्दे में
बस बाते हीं बाते हैं ।
मेरा लालच बेपनाह ,
हवस मेरी गुनाह मेरा ।
पराये हक मारने का
युगों से है स्वभाव मेरा ।।
मेरी मिन्नत- समाजत ने
गढ़ें हजारों खुदा मेरे
मेरी हस्ती की बिसात के
बने सहारे न दाँव मेरे
मेरे वरदान क्या कहूँ
मेरे वरदान तो फन्दे हैं
युगों की भूख वृती
तबाही ही तबाही है।
मेरे वरदान होने का
कोई दावा नहीं करना।
कोई दावा नहीं करना
कोई दावा नहीं करना ।।
मेरी धरती का यह बँटवारा
मेरे यह ताज राजा के ।
रचाए हुए जेल खाने हैं
मुझे लूटने वाले समाज के
मेरे भ्रामक ये उपदेश
मेरे प्रपंच ये भाग्य के
पराई मेहनत के पीछे
मेरे सिक्के हैं बन्धे हुए
मेरा जादू मेरी दौलत
मेरा टोना सिवासत है
मेरा कानून तो डंडा है
मेरी नीति रियासत है।
मेरी झोली के दानों में
बन्धक तुम्हारे बच्चे हैं।
मेरे हथियार हैं यह सुथरे
तेरे कैदी ये जमाने हैं।
मेरा दबदबा, मेरा दावा
मेरे ऐलान डाकू हैं
मेरे ऐलान होने का
कोई दावा नहीं करना
कोई दावा नहीं करना
मेरी अक्ल की मंजिल पर
मेरी पागल समझदारी
मेरे विज्ञान की कीमत ।
मेरी अपनी शर्मसारी
मेरी दुनिया का वास है
सबल एटम के ढेर पर।
मेरा प्रकाश तैर रहा
युगों के घुप्प अंधेरों में
मेरे सागर ठिकाने हैं
मेरी नियत के जहर के।
मेरे अम्बर बसेरे हैं
प्रलय से बढ़ कर कहर के।।
मेरे लहु में नस्लों का
कसैला बोला बाला है
मेरी सोच पर समझ पर
घनी नफरत का जाल है।
मेरे आदम को दावा है
स्वर्ग श्मशान होने का।
मेरी सन्तान होने का
कोई नहीं करना दावा ।
निरा इंसान होने का
कोई दावा नहीं करना

कोई दावा नहीं करना
कोई दावा नहीं करना
अनुवाद अरुणा शर्मा
केहरी का एक गीत जो कृत्या के पिछले अंक में
छपा है-- पढ़िये |