
जिन दिनों कृत्या का बीज दीमाग में जड़ जमा
रहा था उन दिनों एक चाह मन में रही थी कि कृत्या की जड़ें कन्या
कुमारी से कश्मीर और जैसलमेर से कामाक्षी तक फैलें, और इसकी
शाखाएँ
चीन जापान से लेकर अमेरिका अफ्रीका तक लहराएँ। यही कारण था कि जिन
लोगों को कृत्या से जोड़ा गया, उनमे अग्निशेखर
( जम्मू) किम
फाम, (शिलांग) और टी पी राजीवन (केरल) आदि थे। अन्य सहयोगी तो
कृत्या के साथ अधिक नहीं चले पर अग्निशेखर जी ने कृत्या को
आरंभ से बेहद सक्रिय साहित्यिक सहयोग दिया। उन्ही की बदौलत हब्बा खातून,
ललद्यत, अरुणिमाल , और रूपभवानी जैसी कवयित्रियों की कविता से
हिन्दी समाज और अंग्रेजी समाज को परिचित करवाने का मौका मिला।
उन्होंने ही अजेय और अरुणा शर्मा जी जैसे कर्मठ कवियों को कृत्या
के साथ जोड़ा।
हमने कृत्या के जन्म के साथ " कवितोत्सव " मनाया और कल्पना की कि
पहली वर्षगाँठ कश्मीर की भूमि में हो, वाग्देवी ने कहा
"तथास्तु"!!, देखिए हम डोगरी विशेषांक के साथ कश्मीर की साहित्यिक
भूमि पर अपनी पहली वर्षगाँठ मनाने के लिए उपस्थित हैं। इस विशेषांक
के लिए हम अग्निशेखर जी और अरुणा जी दोनो के प्रति आभारी हैं,
अग्निशेखर जी तो कृत्या के संचालक हैं, किन्तु अरुणा जी ने जिस
त्वरता से यह अंक तैयार किया वह सराहनीय है। इस अंक के लिए हमने
जम्मू प्रदेश की बसहोली पेंटिंग्स को लिया है। ये चित्र पारम्पिक
कला शैली है जो प्राकृतिक रंगों से तैयार किए जाते हैं। इनका
चित्रण पारंम्परिक कथाओं पर आधारित है। यह अंक डोगरी अंक है, और इस
अंक के साथ हम फिर रेखाचित्रों के द्वारा प्रभाकर को याद कर हैं ।
इस अंक की अतिथि सम्पादिका अरुणा शर्मा हैं, अतः हम उनके शब्दों
में "मेरी बात" पढ़ेंगेः---रति सक्सेना

मेरी बात
" हर देश, काल, वर्ग, जाति, भाषा विशेष की अपनी चिन्ताएँ समस्याएँ
तथा सरोकार होते हैं। डोगरी कविता को केन्द्र में रख कर यदि बात की
जाए तो इसका व्यवहारिक पक्ष साहित्यिक पक्ष पर भारी पड़ता है। डोगरी
जो कि पहाड़ी कण्ढ़ी प्रदेश के सीधे साधे, भोले
लोगों की भाषा है,
उनकी कविताएँ अपनी सरलता व सहजता के कारण आकृष्ट करती हैं। इनमें
जीवन की सच्चाई उद्घोषित होती है। पाब्लो नैरुदा ने कहा भी हैः
-किसी पेड़ ने नहीं कहा मुझसे/ मैं सबसे ऊँचा हूँ। किसी जड़ ने नहीं
कहा मुझसे/ मैं ही आती हूँ सबसे ज्यादा गहराई से/. और कभी नही कहा
रोटी ने/ कुछ भी नहीं रोटी जैसा।
बस ऐसी ही सादगी में डूबी कविताएँ हैं इस प्रान्त की। 17 वी सदी के
कवि देवी दित्ता अर्थात् "दत्तू" प. गंगाराम, बाबा काशीनाथ जैसे
कवियों की कविता में यही सरलता दिखाई देती है। कालांतर में जीवन
मूल्य बदला, सरोकार बदले, और साथ ही पहाड़ी क्षेत्र की जीवन शैली
भी बदली। दुनिया में चल रही क्रांन्तियों, संघर्षों और आन्दोलनो का
असर डुग्गर साहित्य पर भी पड़ा। वर्ग- चेतना, वर्ग- संघर्ष,
स्वतंत्रता- प्राप्ति , स्वदेश- प्रेम, यहाँ के सम्पूर्ण वांग्मय
का स्वभाविक विषय बने। दीनू भाई "पन्त", केहरी सिंह "मधुकर",
वेदपाल "दीप", रामनाथ शास्त्री, यश शर्मा आदि क्रान्ति धर्मी
कवियों की कविताओं को देखते हुए यह बात कही जा सकती है। उत्तरोत्तर
समय की परिवर्तन शीलता का प्रभाव कविताओं के शिल्प, शिल्प भाव आदि
पर स्पष्ट दिखाई देने लगा। इन कवियों में न केवल एक दृष्टि है
अपितु यह स्वयं भी समाज निर्माण की प्रक्रिया में भागीदार हैं। इन
कविताओं से गुजरते हुए डोगरी कविता की यात्रा में आए इन उतार
चढ़ावों को देखा परखा जा सकता है। चयनित कविताएँ इस दृष्टि से स्वयं
बोलेंगी।
डोगरी कविता की अपनी अस्मिता इस बात में भी निहित है कि वह अपने
आसपास के भाषा प्रदेशों में घटित विचारधाराओं से प्रेरणा ग्रहण
करने के बावजूद भी उनसे अलग बनी रहीं। यही कारण है कि डोगरी कविता
न किसी के समान्तर चली, न किसी की होड़ में रही, इसकी अपनी लय,
गति,आग्रह और संवेदना बिन्दु हैं। इस डुग्गर प्रदेश की भौगोलिक,
राजनीतिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के चलते जिस लोकमानस की निर्मिति
हुई है वह अपनी सभी आकांक्षाओं और संघर्षों के साथ हर दौर में
धड़कता हुआ आभासित होता है। "
अरुणा शर्मा |
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