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डोगरी कविता
डोगरी कविता

जम्मू कश्मीर के "डुग्गर" प्रदेश में बोली जाने वाली प्रमुख भाषा "
डोगरी" है। यह आधुनिक आर्य भाषा है। जहाँ तक इसमें साहित्य रचना का
प्रश्न है, तो उसका क्रमिक और नियमित विकास बींसवी सदी अर्थात्
आधुनिक काल में ही हुआ है। यही नहीं अन्य आधुनिक भाषाओं की तरह
इस भाषा के
साहित्य का उद्भव कविता से ही हुआ है। आज डोगरी कविता में साहित्य
के सभी रूप .. कविता, गीत, गजल, महाकाव्य, सानेट, चौपाई, दोहे आदि
सभी मिलते हैं।
आदिकालीन डोगरी कवियों में मानकचंद, लक्खू , गम्भीर चन्द, देवी
दित्ता, पं. गंगाराम, हाकम, जट्ट , लाला रामधन, आदि नाम उल्लेखनीय
हैं। कवि देवी दित्ता " दत्तु" नाम से प्रसिद्ध हुए हैं तथा इनके
डोगरी गीत तथा कविता डोगरा समाज के अपने समकालीन जीवन का व्यवहारिक
प्रतिबिम्ब हैं। इनकी भाषा सरल व सरस है। तथा ये कविताएँ अपने रोचक
गुणों के कारण आधुनिक साहित्य में भी अपनी पहचान रखतौ हैं। ऐसे ही
मध्यकालीन कविता... "चन्दे दी चान्दनी चंदै कन्नै"भाव विचार , शैली
आदि की दृष्टि से बड़ी सुदृढ़ तथा तथा प्रौढ़ रचना है। इसके कवि लाला
रामधन हैं।
डोगरी साहित्य का आधुनिक काल सन् 1944 से माना जाता है। इस काल
में यद्यपि हर विधा फली- फूली, किन्तु कविता साहित्यकारों की पहली
पसन्द रही। इस अवधि में कविता के कथ्य और शिल्प, दोनों का अच्छा
खासा विकास हुआ। पचास और साठ के दशक डोगरी साहित्य के विकास ,
विशेषतः कविता के लिए बहुत महत्वपूर्ण
रहे। सन्1950 से लेकर अब तक
सैंकड़ो कवि भिन्न- भिन्न पृष्ठभूमि से डोगरी कविता साहित्य के गगन
पर चमके। उन सभी का जिक्र पाना तो संभव नहीं है। इसलिए यहाँ केवल
उन्ही जिक्र किया जा रहा है जिन्होंने डोगरी कविता के क्षितिज को
नए आयाम दिए। बड़ी पीढ़ी के कवियों में दीनू भाई पंत, परमानन्द
अलमस्त, किशन इस्माइलपुरी, प्रो. रामनाथ शास्त्री, आदि नाम उल्लेखनीय
हैं। दीनू भाई पंत ने न केवल डोगी साहित्य को ही पुनर्जीवित किया
बल्कि डोगरियत में भी नई जान फूँकी। अलमस्त की कविता सगुण भक्ति
तथा आध्यात्मिकता का समन्वय है। किशन स्मैलपुरी ने कथ्य तथा शिल्प
दोनो को ही नए रूप दिए। उनके गीत तथा गजलें विषय तथा भावनाओं के
कारण विशेष हैं। प्रो. रामनाथ शास्त्री की कविता अपने समकालीन समाज
की परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करतीं हैं। बीच की पीढ़ी के
प्रतिनिधि कवियों-- केहरी सिंह "मधुकर", वेदपाल "दीप" यश शर्मा,
पद्मा सचदेव, चरणसिंह आदि ने डोगरी कविता को समृद्ध करने के लिए
अमर रचनाएँ रचीं। मधुकर की रचनाएँ आशावाद, यथार्थवाद , प्रगतिवाद,
प्रकृति चित्रण के अतिरिक्त जीवन दर्शन की कविताएँ है। वेदपाल दीप
ने जहाँ मयखाना, काला मानव जैसी कविताएँ रचीं
वहीं उन्हें डोगरी गजल का बादशाह कहा जाता है। यश शर्मा के
गीत डोगरा संस्कृति तथा प्रकृति को समेटे हुए विभिन्न भावों तथा प्रेरणाओं के स्रोत हैं।
पद्मा सचदेव की कविता मुख्यतः नारी मन की संवेदनाओं की कविता है।
परन्तु उनकी रचनाओं में डोगरा जीवन शैली की छाप इनकी कविताओं को ही
नहीं बल्कि सम्पूर्ण डोगरी कविता साहित्य को गरिमा प्रदान करती है।
डोगरी कविता में चरण सिंह नए विषयों तथा नए प्रयोगों का प्रतीक
माने जाते हैं। इनकी कविताओं बिम्बों और भावनाओं की सूक्ष्मता के
कारण विशेष वर्ग को अधिक प्रभावित करती है।
इन कवियों के अतिरिक्त नरसिंह देव जम्बाल, मोहन लाल सपोलिया, कुँवर
वियोगी, शिवराम दीप, मोहन सिंह, जितेन्द्र उधमपुरी , ओ. पी
शर्मा "सारथी", ध्यान सिंह, आदि कवियों न डोगरी कविता को नई
संवेदना, नई अभिव्यक्ति देने तथा सम्प्रेषण के स्तर पर उसको गहरे
तक ले जाने में अपनी योग्यता को प्रमाणित किया है।
डोगरी कविता को पद्मा सचदेव और चम्पा शर्मा ने भी वर्धित किया है।
इनकी कविता में डुग्गर धरती , प्रकृति , नारी चित्रण , त्याग,
देशप्रेम, आदि प्रमुखता से चित्रित हैं। अब इस काँरवा में
ज्ञानेश्वर , अभिशाप, वीरेन्द्र केसर, डा. अरविन्द , दर्शन दर्शी
आदि कवि आ जुटे हैं , जो डोगरी कविता के क्षितिज को इन्द्रधनुषी
रंगों से सँवारते हैं।
डोगरी गजल के जिक्र के बिना डोगरी कविता साहित्य की बात अधूरी है।
" गजल " डोगरी साहित्य में मकबूल तरीन विधा है, जो डोगरी साहित्य
की बगिया में नया रंग भर रही है। बेशक यह रूप अरबी फारसी की देन
है। परन्तु डुग्गर धरती इसको बहुत रास आई है। डोगरी गजल में शायरों
की वैयक्तिकता विषयों की विविधता के साथ- साथ अंदाज ए बया बेशक
अपना- अपना है।
परन्तु पैगाम ए कलाम साँझा
है। क्यों कि जहाँ उर्दू शायरी में मुख्यतः इश्क, हुस्न, साकी,
मयखाना आदि का जिक्र हुआ है वहाँ डोगरी शायरी का रंगरूप समकालीन
परिवेश के साथ सामंजस्य बिठाता है तथा गजल को एक नया ठोस धरातल
प्रदान करता है।
इस तरह डोगरी कविता कथ्य और शिल्प दोनों स्तरों पर समय और हालात को
समेटते हुए अपने समकालीन परिवेश का प्रतिनिधित्व करते हुए सामाजिक
सरोकारों को निभाती युग- चेतना का बोध कराती है।
प्रस्तुति शशि पठानिया
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