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डोग री कविता
समकालीन डोगरी कविता
एक परिदृश्यः--
डोगरी कविता के आरंभ के विषय में जब कोई चर्चा सिर उठाती है तो
हमारी नजर 18 वीं सदी के डोगरी के आदि कवि "देवी दत्ता" उर्फ कवि
"दत्तू " पर जा टिकती है। कहा जा सकता है कि अट्ठाहरवीं सदी से ही
डोगरी कविता लिखित रूप में उपलब्ध है। हालाँकि डोगरा लोक संस्कृति
के राग, रूप, लोक गीतों की उपस्थिति डोगरा जीवन शैली में सदियों से
बनी हुई है।
उन्नीसवीं तथा बींसवीं सदी तक पहुँचते -पहुँचते डोगरी कविता
स्वच्छन्द झरने की सहस्र धाराओं में फूट पड़ी। नित्य नए विषय, नई
समस्याएँ, नए सरोकार, जन- जीवन का व्यवहारिक व सांस्कृतिक पक्ष
कवियों की रचनाओं में छटा बिखेर रहा था। आम आदमी से जुड़े विषयों ने
कविता को एक नया मोड़ दिया कवि दीनू पंत की कविता " शहर पैहलो पैहल"
( शहर पहली बार) जैसी कविताओं ने एक आन्दोलन को जन्म दिया यह एक
अत्यन्त लोकप्रिय रचना हुई। उसके बाद डोगरी कविता के कई आन्दोलन
चले जैसे डोगरा जागरण, देशप्रेम , स्वतन्त्रता, प्रगतिशील आदि। इन
आन्दोलनों में जुटे कलम के सिपाहियों ने कविता के माध्यम से
जनसाधारण में क्रान्ति की ज्योति जलाई। इस समय मुक्त छन्द कविताएँ
पद, गजल दोहे आदि सभी विधाओं में समान रूप से लिखा जा रहा था।
इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दौर में नए कवियों का कविता के क्षेत्र
में आना डोगरी कविता के अच्छे भविष्य का आश्वासन है। इस नई पौध के
कवियों ने कविता को हृदय की गहराइयों में तलाशा है और नृसिंहदेव
जम्बाल की रची इन पंक्तियों को साकार किया हैः--
" मूल्य जैसे बदलते हैं , रचनाएँ भी बदलती हैं,
पर अदब कोई कोरा नारा नहीं, कोई भी पक्ष इसकों प्यारा नहीं,
अदब के इस बगीचे में, कितने ही रूप वाद हैं,
पर सृजना यदि ताजा नहीं तो वाद भी विवाद हैं।"
नए कवियों में इस ताजगी का उदाहरण कवि धीरज केसर इन्हीं पंक्तियों
को सार्थक करते हैं:-
" हँसते होंठों पर बल पड़े / रोऊँ तो नमक
बरसता है जख्मों पर,
बिखरी यादें नहीं संभलती/ जीने का है
कोई पता न ठिकाना,
बता भाई ! आग से पहचान हुई कि नहीं?
अन्यः
" अक्कड़ बक्कड़ पंबै पौ।
पीड़ा रख सिरहाने सो, 
सौ पीड़ाओं के हार पिरो।
तो फिर जितना चाहे रो
तुम्हारा जरा न चलेगा जोर,
बता भाई! आग से पहचान हुई कि नहीं
प्रस्तुतिः डा. ज्ञान सिंह
सम्पादक. सिराजा डोगरी
अनुवाद अरुणा शर्मा
पढ़िये--
डोगरी कविता पर लेख शशि पठानिया द्वारा
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