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यश शर्मा की कविताएँ

धरती सब कुछ सहती है
धरती सब कुछ सहती है
चुपचाप अम्बर को निहारे , मुँह से उफ न करती है।
धरती सब कुछ सहती है
वह ममता की मूरत मानव पर सर्वस्व लुटाती है,
अन्न- धन देती मानव को, जीवन की ज्योंति जगाती है,
गिरतों को लगाती छाती से, रूठों को बहलाती है
बुरे बोल , गन्दी बातें, मन से नहीं लगाती है
माँगे सब का सुख, है सबकी हमदर्द!
अनुवाद अरुणा शर्मा
(यश
शर्मा की अन्य कविताएँ) .
वेद राही की कविता
थैंक्यू माई पैन
तुम्हे छोड़ते मेरा मन उदास है
ओ मेरे पैन
निब खुरखरी हो गई है
स्याही लीक हो रही है
मैं मजबूर हूँ तुम्हें बन्द कर
अपनी मेज के एक कोने पर
रखने के लिए
तुम चाहे मेरे तन से नहीं जुड़े
पर बने रहे मन,
ना जाने क्या क्या लिखवाया
कितनी कविताएँ, कहानियाँ, फिल्में
उन सब में
जो कुछ भी था वह मेरा भी था
और तुम्हारा भी
तुम गवाह रहे मेरे हर अहसास के
नाम हुआ , तुम्हारे कारण
तुमने कभी नहीं लिखा नाम अपना
मेरे दस्तखत
थे तुम्हारे हस्ताक्षर
धन्यवाद तुम्हारा
थैंक्यू माई पैन!
अब तुम नही कर पाओगे मेरा काम
पर पड़े रहोगे मेरे सामने
और बताते रहोगे कि
एक दिन , मेरी हस्ती भी मजबूर हो जाएगी
मेरी सोच, मेरी कल्पना की शक्ति ने भी
मेरा साथ छोड़ जाना है, एक दिन
पर क्या तब
मेरी तरह वह भी उदास होगा
जो मुझे अपनी कलम बना
अपनी सोच का इजहार करता है
कौन है वह?
किसके हाथ का पैन हूँ मैं?
किस ने मेरे बहाने
अपने मन के झरोखे खोले हैं
वह कोई है भी या
मेरी सोच ही उसका वजूद है?
या फिर उसके वजूद की तरह
मेरा वजूद उतना ही तो नहीं
जितना तुम मेरा मन बनकर
मेरे हाथों से लिखते रहे?
वह मेरी सोच थी या तुम्हारी?
वह मेरी हस्तीं थी या तुम्हारी?
अनुवाद अरुणा शर्मा

(वेद राही
)
पद्मा सचदेव की कविता
मैं
कुएँ पर रखी
एक बाल्टी हूँ।
जिस राहगीर का मन करता
मेरे गले में रस्सी बाँधकर
कुएँ में से पानी भरता
दो अंजुरी पी लेता।
फिर मुझे
बिल्कुल खाली कर
कुएँ के साथ लगती
कच्ची दीवार पर
लगी हुई कील के साथ
टाँग जाता है,
कील हिलती रहती है
मेरा कलेजा
मुँह तक आता रहता है
और मैं
अगले राही की राह ताकती
जो
अपनी प्यास के साथ मेरी भी बुझाएगा
उसके पैरों की आवाज आते
मैं माँगती दुआ हूँ
कि इसे भी
प्यास लगी हुई हो
अनुवाद अरुणा शर्मा
(
पद्मा सचदेव की अन्य कविताएँ
)
नृसिंहदेव जम्बाल की कविता
ताश का पत्ता
इस दुनिया की चौकड़ी में
मैं हूँ एक ताश का पत्ता।
कोई उठा आँखों से लगाता
कोई धीरे से फैंक मारता
कोई पटकता जोर से
फिर मैं मिलकर किसी खेल से
गुमनामी के कोने में सिमटता
वहाँ बैठे आभास होता है
इस खेल में मैं नहीं अकेला
उसी की दुनिया के सारे मानव
मेरी तरह ताश के पत्ते।
बेगम , शाह , इक्के को लेकर
दुक्की , तिक्की, चौके, पंजे
कई छक्के कई सत्ते अट्ठे,
कुछ नहले
कुछ पूरे दहले
कुछ गुलाम की तरह हुक्म बजाते
कुछ हाकिम की तरह हुक्म चलाते
कुछ पान की तरह बाँके सुन्दर
कुछ ईंट की तरह तराशे गए
कई चिड़ियों से तरह तरह के
कई जवान सिपाही छबीले
कई गोरी से नाजुक पतले
हर एक की आन अलग -अलग
हर एक की अपनी सत्ता
मान सम्मान भी अपना अपना

वक्त पर हर की महत्ता
एकता कर ले तीन दुक्के तो
बेगम शाह इक्का भी झुकते
पल दो पल सब नाटक करते
धीरे- धीरे गिरते उठते
एक दूसरे से टकराते
या रंगों से रंग मिलाते
एक- एक कर बाजी से मिलकर
सब उसी जगह जा पहुँचते
जहाँ कोई नहीं छोटा बड़ा
जिस जगह तिक्की दुक्की
उसी जगह है शाह और इक्का
सब ठहर रहे हैं
उसी की मार को
जिसके बाद फिर अवसर है मिलना
अपने करतब दिखलाने का
समय के रथ पर सवार
इस जग का चतुर खिलाड़ी
युगों- युगों से खेले खेल
जब भी रंग पड़े फीके
ताश नए को रच देता
अनुवाद अरुणा शर्मा
चम्पा शर्मा की कविताएँ
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लाडले जब बड़े हो जाना
एक दिन लाडले जब बड़े हो जाना
पढ़ना- लिखना चतुर होना
काम- काज फिर ब्याह होना
माता- पिता का अति खुश होना
वह दिन भाग्यशाली
होगा,
पर सज्जनों एक युग- परिवर्तन होगा
****
फिर पंछियों ने उड़ जाना
जाकर बसाना एक नया ठिकाना
दूर से श्रवण करेंगे सलाम
कहेंगे " भेजता हूँ पता,
चिट्ठी- पत्री भेजते रहना
समय अनुसार खाना और सोना
पर मन उसके पास ही रहना
मिलने की बनी रहनी आस
बेशक मेल कभी ही होना
एक दिन लाडले जब बड़े हो जाना
वह दिन भाग्यशाली
होगा
पर सज्जनों , एक युग परिवर्तन
होगा
अनुवाद अरुणा शर्मा
चम्पा शर्मा की लम्बी कविता
जिसके 79 विभाग हैं कि पहली दो कविताएँ
डा अरविन्द की कविता
परदेसी
फारस की खाड़ी की लहरों
क्या तुमसे मैं बात करूँ
क्या कहूँ, क्या सुनाऊँ
मैं परदेसी घर से दूर
तुम क्या जानो मेरी वेदना
मेरी पीड़ा!

फारस की खाड़ी की लहरों!
गंगा यमुना, रावी तवी
चिनाव और जेहलम के तटों पर
जो आँसू बरसे हैं
जो फूल खिले हैं
जाओ, खोज लाओ, हिन्दमहासागर में
तब तुमसे कुछ बात करूँ
कुछ कहूँ , कुछ सुनाऊँ।
तुम क्या जानों मेरी वेदना
मेरी पीड़ा!
फारस की खाड़ी की लहरों!
जेठ मास के ताप से
धरती माँ कुम्हलाई होगी
सागर की ममता बन बदली
फिर अम्बर पर छाई होगी
बरखा की बून्दे खेतों में
नई जिन्दगी लाई होगी
अम्बुआ के बूटे पर कोयल
हँसती गाती आई होगी
यह सब कुछ
जाओ , ले आओ खोज
हिन्द महासागर से
तब तुमसे कुछ बात करूँ
कुछ कहूं , कुछ सुनाऊँ!
मैं परदेसी घर से दूर
तुम क्या जानों मेरी वेदना
मेरी पीड़ा!
फारस की खाड़ी की लहरों!
लाल किसी माँ का सड़क पर
फिर सर्दी से ठिठुरा होगा
किसी कुँवारी के पाँवो में
फिर से घुँघरू खनका होगा
लाउड स्पीकर पर फिर से
इक झूठा नारा गरजा होगा
ग्रन्थ साहिब के पन्नों पर
फिर खून किसी ने छिटका होगा
फिर दहेज का कफन
किसी माँ की प्यारी से लिपटा होगा
यह सब कुछ
जाओ हिन्द महासागर से खोज लाओ!
तब तुमसे बात करूँ
कुछ कहूँ सुनाऊँ!
मैं परदेसी घर से दूर
तुम क्या जानों मेरी वेदना
मेरी पीड़ा
फारस की खाड़ी की लहरों!
अनुवाद अरुणा शर्मा
ज्ञानेश्वर
गीत
गीतों के अमन तराने हैं
हम भाग्य जगाने वाले हैं
नहीं भेदभाव कोई भीतर है
एकता हमारे अन्दर है
रण बाँके कहलाने वाले हैं
हम भाग्य जगाने वाले है
वैसे तो अमन के पुजारी हैं
रणभूमि में तेज कटारी हैं
हम बैर भुलाने वाले हैं
हम भाग्य जगाने वाले है
स्वागत के लिए हम भोले हैं
छेड़ो अगर तो आग के गोले हैं
हम कहर बरसाने वाले हैं
हम भाग्य जगाने वाले हैं
आँखों में देश का खाका है
दुश्मन इधर न झाँका है
हम सर कटाने वाले हैं

हम भाग्य जगाने वाले हैं
गीतों के अमन तराने हैं
हम भाग्य जगाने वाले हैं
अनुवाद--शेख मोहम्मद
जीतेन्द्र उधमपुरी के गीत
एक गीत का जन्म
मन के खेत में दबी
एक सकारात्मक सोच को
जब मिलते हैं
दर्द के रंग और रोशनी
भावों की उष्मा
हालात की हवा
विरह, पीड़ा की खाद
और
निंरन्तर बहती
अश्रुधारा की नमी
हर दिन
साँय प्रातः
तो फिर कहीं जाकर
कोई कौंपल फूटती है
किसी एक गीत का
जन्म होता है।
(जीतेन्द्र
उधमपुरी के अन्य गीत)
मोहन सिंह की लम्बी कविता
तवी
एक
गर्मी की
भरपूर तपती ऋतु
दूर- दराज से
निचले प्रदेशों से
आते थे कुछ
साइकिल , तांगे
ठंडी हवा में नहाने.
मीठी नीन्द में सोने
जब तुम्हारे
प्रेम की लोरी
फर्र फर्र कर
बहती
सारे दिन की तपिश
और थकावट को
पलों क्षणों में भुला देती
गहरी नीन्द में सुला देती
तुम्हारे कारण
मेरा कण्ढ़ी प्रदेश
कण्ढ़ी नहीं एक सैरगाह था
जहाँ आते
दूर दूर से

भरपूर गर्मी की
तपती ऋतु में
ठण्डी हवा में नहाने के लिए
मीठी नीन्द में सोने के लिए
तो तुम्हारी
ममता की ठण्डक
सब के मन को
करती थी शीतल
इस शहर का मान बढ़ाती
शहर मेरा जो
कण्ढ़ी था
जहाँ थे सिर्फ
लोग या पत्थर
जहाँ थे सिर्फ
लोग या मन्दिर
कठोरता थी
श्रद्धा भी
पर थी कमी
प्रेम की
तुम्हारी मीठीं लोरी
पवनपुर की पहली थपकी सी
पहाड़ों की चोटियों पर गूँजे
ज्यों गोद किसी माँ की
अब क्या हुआ
क्या हुआ अब?
न रही ममता की ठण्डक
शीतलता भरी
न आता कोई
नीचे प्रदेशों से
साईकिल ताँगा
भरपूर गर्मी की
तपती ऋतु
ठण्डी हवा में नहाने के लिए
मीठी नीन्द में सोने के लिए
तुम बदली
बदल गए लोग।।
अनुवाद---अरुणा
शर्मा
(मोहन
सिंह की लम्बी कविता कर बाकी अंश)
निर्मल विनोद की कविताएँ
कर्फ्यू--1
सूने सब चौराहे गलियाँ
नुक्कड़ कोने
पीली जर्द हवा
रह रह कर गश खा जाती है
दहशत की पड़ रही ओस के
ठंडे कण
आसमान से झरते हैं चुपचाप
बीच-बीच में
लोहा काली सड़क के
पर
जब बजता है
सिर दीमाग पर
नसों- नाड़ियों पर पड़ते
बजते से दुर्मट
अनुवाद--
कवि

( निर्मल
विनोद की अन्य कविताएँ)
वीरेन्द्र केसर,
सुर
भोर की शुभ वेला
अग्रसर मैं अपने पथ पर
एक घने जंगल से गुजरता
झींगुर स्वर मे गुनगुना रहे थे
पक्षी भी थे अपनी धुन में
चखे नहीं थे पके फल
मधुर मधुर गाते थे पंछी
कोई गाता था इक लय में
प्यारे सुरमय बोल बनाकर
चहचहा ही जाता था कोई
चूँ चूँ, चुड़ चुड़, चुप चुप , चिड़ चिड़
अपने अपने सुर को सम्हाले
लय में गाते ताल में थे सब
बेताल तो बस एक पाँव थे मेरे
भूला था साँसो का सरगम
धक- धक दिल यह धड़क रहा था
लाख स्वार्थ शिकवे ले मैं
उठता गिरता घिसट रहा था
धरती जैसे मसल रहा था
सोच में कोई दूर फँसा था
दुविधाओं के जाल में जैसे
झींगुर या पंछी सब उस जंगल में
मैं ही बेसुर चलता था जाता
अनुवाद..कवि स्वयं
( वीरेन्द्र
केसर
की अन्य कविता)
सुनील शर्मा
मेरी जिन्दगी मेरी मौत
मैं जब नहीं था
यह दुनिया ऐसी ही थी
रोज सुबह जागती, रोज रात सो जाती
मेरी जिन्दगी की मिठास और कड़वाहट के साथ
कुच मीठी कुछ कड़वी हो जाती
मेरे हँसने में हँसती है
और मेरे रोने में रोती है
मेरे कहकहे हवा में घुल जाते हैं
मेरे गीत नाडू गाते हैं
चान्दनी मेरी आँखौं में डूब
आडू के नीचे
मेरे आँगन आ कर
मेरी खाट पर बैठ जाती है
और चाँद आसमान से चोरी चोरी देखता
पछताता और फिर सब्र कर
तारों की खूँटी लटक जाता है
सूरज मेरे तन से गुत्थमगुत्था हो
रोज सुबह तवी के तट पर
हार कर गिर जाता
लौट जाता
और फिर दिन भर
गिरने के गुस्सा पूरे जोर से
सूंकता, ठहरता है रह रह कर
दूसरे दिन की रात काटने के इंतजार में
वह रात

जो मुझे पूरी रात गुदगुदाती रहती
कभी ऊपर, कभी नीचे
अपने हौठ, अपना जिस्म
अपनी बाजुओं का पूरी तरह प्रयोग करते हुए
वह प्रतीक्षरत सूरज
सब्र नहीं करता क्षण भर को भी
दिन को सुबह सवेरे उठाता
रात को दरवाजों पर दस्तक दे
आ ही जाता है
फिर मेरे साथ
तवी के किनारे
गुत्थमगुत्था होने के लिए
पर कल जब मैं नहीं रहूँगा
मेरी आवाज गूंजती रहेगी
भारत के पहाड़ों की भाखों में
मेरे गीतों की मिठास में
चलती हवा को मिठास देते रहना
जिसमें मेरा भी कुछ भाग होगा
मैं होऊँगा !
इन बहते नाडूओं में कुछ स्वाद
जरा सी चीनी के एक
दाने जितनी मिठास
तो मेरी होगी
मेरे गीतों की मिठास
छल छल नाडू की लगातार आती
आवाज में घुल घुल जाएगी
तो रसीले गीत गाते गाते
नाडू कभी- कभार ही सही
मुझे याद तो करेगे
मेरे न रहने के बाद
मेरी जिन्दगी
इस चाँदनी की
इस सूरज की
हारे हुए सूरज की
इन नाडुओं की
मेरे गीत गाती इस रात की
रोज जागती रात भर मेरे साथ
करवटें बदलती
दबोचती मेरा जिस्म
और मैंने हर रात के हौंठों पर
अपने दाँतों के निशान
रात के साँसो में
अपने साँसों की खुशबू
और जिस्म में
सम्पूर्ण होने का भाव
और तसल्ली से
हर रात तृप्त होते रहना
हर रात तृप्त होते रहना
तो फिर मेरी मौत मेरा
क्या ले जाएगी?
बेचारी मौत मेरा क्या ले गई?
अनुवाद अरुणा शर्मा
आर्यवीर की कविता
कैद तोते की भविष्यवाणी
पिंजरे में
कैद तोते से
भारत का
भविष्य पूछना चाहा
पहले
तो
तोता बाहर ही नहीं निकला
पर
हरी मिर्च की रिश्वत लेकर
वह
बाहर तो निकला
कई कार्डों के उलटफेर
के बाद
जो कार्ड उसने
अपनी
चौंच में दबा कर
अपने
ज्योतिषि को दिया
उस पर खूबसूरत अक्षरों में
इस तरह लिखा था
मेरा भारत महान का नारा
हर नेता यहाँ लगाएगा

जिसका जितना जोर चलेगा
रिश्वत लेता जाएगा
पूरी दुनिया में रिश्वत का झण्डा
यही देश फहराएगा
गरीबी नहीं , हर गरीब यहाँ
मिटाया जाएगा।
( आर्यवीर
की अन्य कविता)
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