कवि केदारनाथ सिंह की कविताएँ
 

केदारनाथ सिंह जी का जन्म 1934 में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। आपने बनारस विश्वविद्यालय से 1956 में हिन्दी में एम . ए और 1964  से पी.एच डी की। आपने कई कालेजों में पढ़ाया और अन्त में जे. एन. यू में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से रिटायर्ड हुए। आपने कविता व गद्य की अनेक पुस्तकें रची हैं। और अनेक सम्माननीय सम्मानों से सम्मानित हुए। आप समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। आपकी कविता में गाँव व शहर का द्वन्द्व साफ नजर आता है। बाघ आपकी प्रमुख लम्बी कविता है, जो मील का पत्थर मानी जा सकती है। प्रस्तुत कविताओं का चयन कृत्या के संपादक मण्डल के प्रमुख सदस्य और स्वयं कवि विनोद दास जी ने किया है।

नए कवि का दुख

दुख  हूँ मैं एक  नये हिन्दी कवि का
बाँधो
मुझे बाँधो
पर कहाँ बाँधोगे
किस लय, किस छन्द में?

ये छोटे छोटे घर
ये बौने दरवाजे
ताले ये इतने पुराने
और साँकल इतनी जर्जर
आसमान इतना जरा सा
और हवा इतनी कम कम
नफरतयह इतनी गुमसुम सी
और प्यार यह इतना अकेला
और गोल -मोल
बाँधो
मुझे बाँधो
पर कहाँ बाँधोगे
किस लय , किस छन्द में?

क्या जीवन इसी तरह बीतेगा
शब्दों से शब्दों तक
जीने
और जीने और जीने ‌‌और जीने के
लगातार द्वन्द में?

1965


तुम आयीं

तुम आयीं
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते - चलते एड़ी में
काँटा जाए धँस
तुम दिखीं
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हँसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिलीं
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
काँपती हो बत्ती !
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे- धीरे
उड़ता है भुआ

और अन्त में
जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को
तुमने मुझे पकाया
और इस तरह
जैसे दाने अलगाये जाते है भूसे से
तुमने मुझे खुद से अलगाया ।

1967

जब वर्षा शुरु होती है


जब वर्षा शुरु होती है
कबूतर उड़ना बन्द कर देते हैं
गली कुछ दूर तक भागती हुई जाती है
और फिर लौट आती है

मवेशी भूल जाते हैं चरने की दिशा
और सिर्फ रक्षा करते हैं उस  धीमी गुनगुनाहट की
जो पत्तियों से गिरती है
सिप् सिप् सिप् सिप्

जब वर्षा शुरु होती है
एक बहुत पुरानी सी खनिज गंध
सार्वजनिक भवनों से निकलती है
और सारे शहर में छा जाती है

जब वर्षा शुरु होती है
तब कहीं कुछ नहीं होता
सिवा वर्षा के
आदमी और पेड़
जहाँ पर खड़े थे वहीं खड़े रहते हैं
सिर्फ पृथ्वी घूम जाती है उस आशय की ओर
जिधर पानी के गिरने की क्रिया का रुख होता है।

1973



जाना

मै जा रही हूँ--उसने कहा
जाओ.. मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।

1978

हाथ

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।

1980

बुनाई का गीत

उठो सोये हुए धागों
उठो
उठो कि दर्जी की मशीन चलने लगी है
उठो कि धोबी पहुँच गया घाट पर
उठो कि नंगधड़ंग बच्चे
जा रहे हैं स्कूल
उठो मेरी सुबह के धागो
और मेरी शाम के धागों उठो

उठो कि ताना कहीं फँस रहा है
उठो कि भरनी में पड़ गई गाँठ
उठो कि नाव के पाल में
कुछ सूत कम पड़ रहे हैं

उठो
झाड़न में
मोजो में
टाट में
दरियों में दबे हुए धागो उठो
उठो कि कहीं कुछ गलत हो गया है
उठो कि इस दुनिया का सारा कपड़ा
फिर से बुनना होगा
उठो मेरे टूटे हुए धागो
और मेरे उलझे हुए धागो उठो

उठो
कि बुनने का समय हो रहा है

1982

सन् ४७ को याद करते हुए

तुम्हें नूर मियाँ की याद है केदाननाथ सिंह?
गेहुँए नूर मियाँ
ठिगने नूर मियाँ
रामगढ़ बाजार से सुर्मा बेच कर
सबसे आखिर मे लौटने वाले नूर मियाँ
क्या तुम्हें कुछ भी याद है केदारनाथ सिंह?

तुम्हें याद है मदरसा
इमली का पेड़
इमामबाड़ा
तुम्हे याद है शुरु से अखिर तक
उन्नीस का पहाड़ा
क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर
जोड़ घटा कर
यह निकाल सकते हो
कि एक दिन अचानक तुम्हारी बस्ती को छोड़कर
क्यों चले गए थे नूर मियाँ?
क्या तुम्हें पता है
इस समय वे कहाँ हैं
ढाका
या मुल्तान में?
क्या तुम बता सकते हो?
हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में?
तुम चुप क्यों हो केदाननाथ सिंह?
क्या तुम्हारा गणित कमजोर है?

1982



नदी

अगर धीरे चलो
वह तुम्हे छू लेगी
दौड़ो तो छूट जाएगी नदी
अगर ले लो साथ
वह चलती चली जाएगी कहीं भी
यहाँ तक --कि कबाड़ी की दुकान तक भी
छोड़ दो
तो वही अंधेरे में
करोड़ों तारों की आँख बचाकर
वह चुपके से रच लेगी
एक समूची दुनिया
एक छोटे से घोंघे में

सच्चाई यह है
कि तुम कहीं भी रहो
तुम्हें वर्ष के सबसे कठिन दिनों में भी
प्यार करती है एक नदी
नदी जो इस समय नहीं है इस घर में
पर होगी जरूर कहीं न कहीं
किसी चटाई
या फूलदान के नीचे
चुपचाप बहती हुई

कभी सुनना
जब सारा शहर सो जाए
तो किवाड़ों पर कान लगा
धीरे धीरे सुनना
कहीं आसपास
एक मादा घड़ियाल की कराह की तरह
सुनाई देगी नदी!


1983



दाने

नहीं
हम मण्डी नहीं जाएंगे
खलिहान से उठते हुए
कहते हैं दाने॔

जाएंगे तो फिर लौटकर नहीं आएँगे
जाते- जाते
कहते जाते हैं दाने

अगर लौट कर आये भी
तो तुम हमे पहचान नहीं पाओगे
अपनी अन्तिम चिट्ठी में
लिख भेजते हैं दाने

इसके बाद महीनों तक
बस्ती में
कोई चिट्ठी नहीं आती।

1984


 

 

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