मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

जुलाई 4  की सुबह जम्मू के "Z" टी वी के लिए गुफ्तगू कार्यक्रम के लिए साक्षात्कार लिया गया। यह चैनल पूरे विश्व में डोगरी भाषा के माध्यम से अपनी बात प्रस्तुत करता है। संध्या को जम्मू के प्रसिद्ध " अभिनव थियेटर" के विशद सभागार में जम्मू की आर्ट्स एण्ड कल्चर एसोसिएशन की सहभागिता में कवितोत्सव आरंभ हुआ। कार्यक्रम का आरंभ रंगयुग थियेटंर के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत "दीठ"नामक नुक्कड़ नाटक से हुआ जिसे सभागार के बाहर खेला गया। किसी कार्यक्रम की इतनी अनौपचारिक और खूबसूरत शुरुआत मैंने पहले कभी नहीं देखी। रसिक जन थियेटर के बाहर लगे डोगरी कविता के पोस्टर देख ही रहे थे कि नुक्कड़ नाटक आरंभ हो गया। "दीठ" (डोगरी में "तीट्ट ) नाटक जम्मू शहर में आए हुए ऐसे बदलावों की कथा है जिसने शहर की आवोहवा ही बदल दी। जब दो देवदूत जम्मू आते हैं तो किस- किस परिस्थियों से गुजरते हैं, यह नाटक बड़े मनोरंजक रूप में प्रस्तुत कर रहा था। मुझे देखते हुए लगा कि यह समस्या को संभवतः सभी शहरों की है जो शनैः शनैः अपना चोगा बदल रहे हैं।
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तो कवि समझ जाता है कि
अब कभी भी गोली चल सकती है
कि इतिहास में एक और हत्या का दर्ज होना
या भरे बाजार में
एक लड़के का एक लड़की को
प्रेम पत्र थमाना
एक जैसी तटस्थता को आमंत्रित करता है
कवि फिर भी नहीं करता
मौत की प्रार्थनाएँ

दिलीप कुमार कौल

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" हर दफा साफ करते समय
यह लाल रंग छूटता जा रहा है
इतनी लाली इसमें कहाँ छिपी हुई है
पहले भी इस तरह कहीं देखने में आई है
निगोड़ी , नालायक....
आखिर धोबी का हट और बढ़ता गया...
" कमबख्त .. इसकी लाली के छूटने को रोक भी सकूँगा या नहीं..."
कह कर वह चला गया।

के जी शंकर पिल्लै

इसे शुमार कर लो उस गिनती में
जिसे तुम भूलते जा रहे हो।
अकड़ी हैं उंगलियाँ- शाखाएँ
इन पर चिड़ियों से कहो
आएँ , गाएँ
पर फैलाएँ।

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
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यदि भारतीय कविता अन्य देशों की कविता से अलग है तो अलग होनी भी चाहिए, देशकाल के अनुसार भिन्नता कविता के स्वभाव में है। भारत में कविता की जो विधा है वह कहीं और नहीं है। जिस वेरियेशन की बात आप कर रहीं हैं वह तो समृद्धि की सूचक है। उसके लिए चिन्तित होने की आवश्यकता ही नहीं है। कविता अपना स्वरूप स्वयं ही बना लेती है। यह चिन्ता का विषय नहीं है।

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दरअसल नारी वादी रचना ने भाषा को काफी कुछ दिया है , कुछ तो बड़ी सशक्त लेखिकाएँ भी हुई है जैसे कि अहिल्याबाई आदि, लेकिन स्त्री लेखन से जो संस्कार भाषा को मिला वह बहुत महत्वपूर्ण है। घर के भीतर की भाषा ने साहित्यिक भाषा में प्रवेश कर लिया। घर एक ऐतिहासिक चरित्र के रूप में परिवर्तित हो गया। अनेक शब्द भाव और अर्थ जो पहले साहित्य के लिए अरिचित थे, वे अनायास स्थान बनाने लगे। साहित्य को एक नया स्वर और स्वभाव भी मिल पाया। मेरे विचार से स्त्री लेखन साहित्य को सम्पूर्ण बनाता है।

केदारनाथ सिंह
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तुम आयीं
जैसे छीमियों में धीरे- धीरे
आता है रस
जैसे चलते - चलते एड़ी में
काँटा जाए धँस
तुम दिखीं
जैसे कोई बच्चा
सुन रहा हो कहानी
तुम हँसी
जैसे तट पर बजता हो पानी
तुम हिलीं
जैसे हिलती है पत्ती
जैसे लालटेन के शीशे में
काँपती हो बत्ती !
तुमने छुआ
जैसे धूप में धीरे- धीरे
उड़ता है भुआ

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मै जा रही हूँ--उसने कहा
जाओ.. मैंने उत्तर दिया
यह जानते हुए कि जाना
हिन्दी की सबसे खौफनाक क्रिया है।
 

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उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुन्दर होना चाहिए।

केदारनाथ सिंह


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अपने पिता से करते हैं झगड़ा
बेटों को पितृभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं
पराई स्त्रियों को ला- ला कर रखते हैं घर में
पतिव्रत धर्म का पाठ सुनाते हैं अपनी स्त्री को।

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विवाह न होने तक कुँवारेपन का दुख
विवाह हो जाने पर
दो पत्नियाँ क्यों ना हुईं, यह दुख
कई पत्नियाँ हो गईं, तो
प्रेमिका न हुई , यह दुख
पुरुषों को नहीं मिला कभी
स्त्री से तृप्ति का सुख।

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वह ईश्वरवाद का खण्डन करता है
तर्क से ज्ञान से
वह निर्भय हो कर
आगम के प्रमाण पर करता है आक्षेप
अपने बच्चे को थोड़ा सा भी बीमार देख कर
भगता है मसान की ओर
पूजा का थाल सजा कर।


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VOL -  II/ PART -III

(अगस्त -
2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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