मेरी बात

जब कृत्या आरंभ की गई थी तो केरल की राजधानी तिरुवनन्तपुरम् में "कविता का उत्सव" मनाया गया था, जिसमे बी डी दत्तन के चित्र-निर्माण  के साथ कावालम पणिक्कर जैसे लब्ध प्रसिद्ध नाटककारक के ट्रुप के कलाकारों द्वारा अनेक नाट्य- विधाओं की प्रस्तुति की गई थी। उस वक्त शहर के समस्त समाचार पत्रों और टी. वी. चैनलों ने कवितोत्सव को प्रमुख खबर के रूप में प्रस्तुत किया था। तब एक टी वी चैनल द्वारा पूछा गया था कि अगला कविता उत्सव आप कब और कैसे मनाना चाहेंगी। तब मैने यही कहा था कि हम अगला कविता उत्सव जम्मू कश्मीर में मनाना चाहेंगे, क्यों कि कृत्या की परिधि सम्पूर्ण भारत है। इस वर्ष हम अपने डोगरी अंक के साथ जुलाई में जम्मू कश्मीर में थे, एक बार फिर से कविता का उत्सव मनाने के लिए। यहाँ पर हमारे सम्पादीय मण्डल के सदस्य अग्निशेखर जी ने कवितोत्सव के लिए बड़ा जबरदस्त इंतजाम किया हुआ था। अग्निशेखर उन कवि लेखकों में से हैं जो कविता रचना को कवि की व्यक्तिगत अभिरुचि ना मानते हुए समाज और उनकी समस्याओं से भी जुड़े हैं।

हम लोग दो जुलाई को लेह से जम्मू पहुँचे, उसी दिन शाम को अभिनव थियेटर के हाल में जम्मू के युवा साहित्यकारों के साथ एक बैठक हुई । यूँ तो जम्मू में कृत्या के लेखक व पाठक दोनों ही हैं,  किन्तु यहाँ  इतने सशक्त साहित्यकार और कलाकार क्रियाशील हैं , यह बात इस बैठक में मालूम हुई। यहाँ पर कविता और लेखन से जुड़े हर मुद्दे पर चर्चा हुई जैसे कि अनुवाद, कविता में छन्द, गजल आदि विधाओं की वापिसी, वेब पत्रिकाओं का दायित्व और अनुवाद आदि। इस चर्चा की रिपोर्ट कभी और पेश की जाएगी , किन्तु इतना कहा जा सकता है कि औपचारिक चर्चा किस तरह से अनौपचारिक चर्चा में तब्दील हो गई , पता ही नहीं चला। संजना कौल, रवीन्द्र कौल,  लियाकत, शेख मुहम्मद संजय आदि अनेक सुपरिचित नाम उपस्थित थे।
 

हम दो तारीख की रात को ही वैष्णो देवी के लिए चल पड़े. लद्दाख की दस दिनों की यात्रा में अच्छे खासे थक चुके थे, इसलिए वैष्णो देवी की चढ़ाई और धार्मिक स्थानो में स्वभावतः  होने वाली दुरवस्थाओं से मन खिन्न होना लाजमी ही था। मैं यही सोचने लगी कि आस्था अनुशासन और सच्चाई का अनुकरण क्यों नहीं कर पाती? आस्था में बेहद शक्ति होती है, यदि इसका सही उपयोग किया जाए तो देश में हर क्षेत्र में विशेष बदलाव लाया जा सकता है। किन्तु यह समस्त शक्ति बेहद व्यक्तिगत कारणों में अपव्यय की जा रही है। स्वतंन्त्रता से पूर्व इस आस्था शक्ति का सदुपयोग किया गया था।  जैसे कि  तिलक ने गणेतोत्सव में किया था। क्या स्वतंत्रता के बाद इस उर्जा की हमे जरूरत नहीं? यह सवाल साहित्य का न होते हुए साहित्य से जुड़ा होना चाहिए, ऐसा मैं मानती हूँ।

जुलाई 4  की सुबह जम्मू के "Z" टी वी के लिए गुफ्तगू कार्यक्रम के लिए साक्षात्कार लिया गया। यह चैनल पूरे विश्व में डोगरी भाषा के माध्यम से अपनी बात प्रस्तुत करता है। संध्या को जम्मू के प्रसिद्ध " अभिनव थियेटर" के विशद सभागार में जम्मू की आर्ट्स एण्ड कल्चर एसोसिएशन की सहभागिता में कवितोत्सव आरंभ हुआ। कार्यक्रम का आरंभ रंगयुग थियेटंर के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत "दीठ"नामक नुक्कड़ नाटक से हुआ जिसे सभागार के बाहर खेला गया। किसी कार्यक्रम की इतनी अनौपचारिक और खूबसूरत शुरुआत मैंने पहले कभी नहीं देखी। रसिक जन थियेटर के बाहर लगे डोगरी कविता के पोस्टर देख ही रहे थे कि नुक्कड़ नाटक आरंभ हो गया। "दीठ" (डोगरी में "तीट्ट ) नाटक जम्मू शहर में आए हुए ऐसे बदलावों की कथा है जिसने शहर की आवोहवा ही बदल दी। जब  दो देवदूत जम्मू आते हैं तो किस- किस परिस्थियों से गुजरते हैं, यह नाटक बड़े मनोरंजक रूप में प्रस्तुत कर रहा था। मुझे देखते हुए लगा कि यह समस्या को संभवतः सभी शहरों की है जो शनैः शनैः अपना चोगा बदल रहे हैं। जब तक लोग नाटक के माध्यम से साहित्यिक परिवेश में उपस्थित हुए, मंचीय कार्यक्रम के आरंभ होने का वक्त आ गया। डोगरी की प्रसिद्ध गायिका नैना सप्रू मंच पर उपस्थित थीं अपनी जादुई आवाज के साथ। उनकी आवाज में " पल भर भई जाना कौल जिन्दे" नामक डोगरी गीत मंन्त्रमुग्ध कर गया, इसके बाद निर्भय सिंह सलाथिया ने अपनी बेहद खूबसूरत आवाज में एक लोकप्रिय डोगरी गीत गाया.."मेरी गली चा फेराडाल जा तू, मेरा जी नी लंगदा" । गीतों के साथ तबला बाँसुरी आदि साज लोमहर्षक समा बाँध रहे थे। इसके बाद दोनों कलाकारों ने एक युगल गीत गा कर गायन को विश्राम दिया।
इस वक्त तक सभागार में उपस्थित श्रोता सम्पूर्ण चेतना के साथ कार्यक्रम में प्रवेश कर चुके थे। अब डोगरी कविताओं के पाठन का कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया। रंगायन के कलाकार राजकुमार बहुरूपिया ने केहरी सिंह मधुकर की की कविताएँ " बे चराग बस्तियों" नामक कविता से आरंभ की। इसके बाद प्रसिद्ध गायिका चंचल शर्मा ने पद्मा सचदेव की कविता का पाठ किया , अन्त में रंग कलाकार डा. सुधीर महाजन ने मोहन लाल सपोलिया की कविता की प्रस्तुति की।

अब अग्निशेखर जी ने आगंतुक रसिक गण का विधिवत स्वागत करते हुए तकनीकि और कला की सहभागिता और आवश्यकता की ओर ध्यान दिलवाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृत्या का उद्देश्य भारतीय साहित्य को एक मंच प्रदान करना है, यही कारण है कि डोगरी कविता जिसे मान्यता मिले अर्सा नहीं बीता, विशेषांक के रूप में प्रस्तुत की जा रही है।
इसके उपरान्त कृत्या के सम्पादक के रूप में मैंने कृत्या का साहित्य के क्षेत्र में योगदान का उल्लेख करते हुए आगामी कार्यक्रमो का उल्लेख किया। मैंने उन्हे बताया कि कृत्या का उद्देश्य सम्पूर्ण भारतीय साहित्य को विश्वमंच पर एक साथ लाना है। कृत्या के अगले अंक इस कड़ी में अन्य भाषाओं को वेब पर लाएँगे।

अन्त में प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक प्रो. वेद भसीन का प्रमुख भाषण हुआ , जिसमें उन्होंने कृत्या के कृतित्व को सराहा और भारतीय साहित्य के मंच पर प्रादेशिक भाषाओं को स्थान देने की बात पर सन्तुष्टि जाहिर की। अभिनव थियेटर का सभागार में जम्मू के प्रो. रामनाथ शास्त्री जैसे नामीगिरामी साहित्यकारो और कलाकारों उपस्थित थे, इससे इस प्रान्त के साहित्यिक परिवेश का परिचय मिलता है। अन्त में लियाकत अलि ने कृत्या की ओर सभी को कृतज्ञता प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन युवा साहित्यकार कुँवर शक्ति सिंह ने सफलता से किया।

इस तरह कृत्या ने एक सफल परक्रमा पूरी कर ली। समाचार पत्रों और टी.वी चैनलों ने कृत्या के कवितोत्सव को विशेष महत्व से छापा। कुछ पत्रो में छपी रिपोर्ट को हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृत्या के 15 अंक है , इस अंक में हमने अपने समय के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह जी कविताओं को "प्रिय कवि" के अन्तर्गत प्रस्तुत किया है। आपकी कविता बाघ पर एक लेख भी प्रस्तुत किया गया है। कवि केदारनाथ को पढ़ना निसन्देह एक खूबसूरत अनुभव है। "कवि अग्रज" खण्ड में हम बेहद रोचक संस्कृत कविताओं के अनुवाद लाए हैं, जो जिन्दगी के पाखण्ड से जुड़ी हैं। इन्हें पढ़ते हुए हमे पता ही नहीं लगता कि काल और स्थान में परिवर्तन भी हुआ है।
इस बार समकालीन कविता में सीताकान्त महापात्र , के जी शंकर पिल्लै,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, विजयदेव नारायण साही और चन्द्रकान्त देवतले जैसे नामी- गिरामी कवियों के साथ सुजाता और दिलीप जैसे युवा कवियों की कविता भी पढ़ने को मिलेगी।

इस बार हमने चित्रकारी की जगह फोटोग्राफी को महत्व दिया है और लद्दाख के खूबसूरत चित्रों को प्रस्तुत किया है। आशा है कि पाठकों को कृत्या का यह अंक भी पाठको को अच्छा लगेगा।

आमीन

रति सक्सेना


REPORT ON FESTIVAL OF POETRY



 

 

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