विरोध में अन्तर्विरोध -- 'बाघ'--कवि केदारनाथ जी की लम्बी एवं बहु चर्चित कविता पर एक  विमर्श

                                       

बाघ के मिथकीय आवरण में घुसने से पहले कवि केदारनाथ आगाह सा करते हुए कहते हैं--आज का मनुष्य बाघ की प्रत्यक्ष वास्तविकता से इतनी दूर आ गया है कि जाने अनजाने बाघ उसके लिए मिथकीय सत्ता बदल गया है। पर इस मिथकीय सत्ता से बाहर बाघ हमारे लिए आज भी हवा पानी की तरह एक प्राकृतिक सत्ता है, जिसके होने के साथ हमारे अपने होने का भवितव्य जुड़ा है।
समकालीन कविता के सम्मुख पारंपरिक काव्य शास्त्र की तकनीकी पदावलियों की समीक्षा करते हुए राधावल्लभ त्रिपाठी ने मम्मट के " विरोध" को अलंकार अलंकार व्याख्यायित किया जो विरोधाभास से कई मायनों में अलग है। विरोध अलंकार मनुष्य के अन्तर्विरोधों को प्रख्यापित करते हुए विरोध की संभावना न होने पर भी विरोध की वास्तविकता को स्थापित करता है ।

कवि और आचार्य के इन विचारों में समय या स्थान का अन्तराल हो सकता है लेकिन विषय का नहीं। केदारनाथ सिंह की लम्बी कविता " बाघ" अनेक परिदृश्यों को जोड़ती हुई व्यक्ति व समाज के तमाम अन्तर्विरोधों को भिन्न आयाम देती हुई एक ऐसी बुनावट बुनतीं हैं कि अलग- अलग कोण से भिन्न डिजाइन दिखता है। कविता का फलक इतना बड़ा है कि देश ‌और काल सभी गड्डमड्ड हो जाते हैं। प्रतीकों, बिम्बों , रूपकों और चित्रों में कोई भी भेद नही रह पाता है । पाठक बूझता ही रह जाता है कि आखिर बाघ है क्या? हमारी चेतना, हमारा अपनापन, हमारा नैराश्य, हमारा तिरस्कार या फिर हमारे वे अन्तर्विरोध जिन्हें हम जानते हैं फिर भी महसूसना नहीं चाहते। यूँ तो बाघ भी हमेशा जोर से नहीं दहाड़ता अपितु कभी सूँघता है , कभी मिमियाता है, कभी रोता है तो कभी फुफकार उठता है। उसमें कभी हताशा है तो कभी उम्मीद , कभी ईर्ष्या है तो कभी ममत्व भी। बाघ के पाठ में अन्तर्सन्निवेश भाव एक के बाद एक नाटकीय चाल चल आते हैं ‌और देखते ही देखते विलुप्त भी हो जाते हैं। हर बार बाघ का नया अर्थ है, हर बार उसका नया रूप है।

आखिरकार यह बाघ है कौन जो बार- बार सम्मुख चला आता है और हर बार अलग चाल है। क्या यह कवि का व्यक्तित्व है जो अन्तर्सन्निहित आकारों को रूप दे रहा है? या फिर कवि का काव्य कर्म है? हो सकता है कि यह समाज का व्यक्ति रूप हो। जो भी हो बाघ न तो मात्र मिथक है और न ही कोई पात्र। आखिरकार क्या है, इसे समझने के लिए बाघ की पूरी प्रक्रिया से गुजरना जरूरी होगा।

कविता के आमुख में कवि स्वयं उपस्थित है, बाघ उपस्थित न होते हुए भी नदारत नहीं है। वह कवि से ऐसा चिपटा है मानो कोई प्रेतात्मा हो। इस बाघ कथा के लिए कवि के पास न कोई बिम्ब है ना कोई प्रतीक, कोई हरकारा भी नहीं---नहीं / प्रतीक नहीं / तार नहीं / हरकारा नहीं / मैं ही कहूँगा-- स्वयं समय के पंजे की चुभन महसूस करते हैं। विरोधों को चुन-चुन कर दीवार खड़ी हो जाती है--मेरी आत्मा में जो खुशी है / असल में वही है /मेरे घुटनों में दर्द तलवों मे जलन. मस्तिष्क में वही / विचारों की धमक यह विरोध शारीरिक बनाम मानसिक के साथ-साथ अप्रत्यक्ष बनाम प्रत्यक्ष अधिक है। यह ऐसा विरोध है जो -एक विराट झूठ है और वही है सदी का सबसे बड़ा सच! इस झूठ से परे हो कर कवि पुनः बाहर निकल आता है--यह लो मेरा हाथ, इसे तुम्हें देता हूँ / और अपने पास रखता हूँ / अपने होठों की थरथराहट.-- एक कवि को क्या चाहिए! सृष्टि के विरोधों को दिखाता हुआ वह बाघ हर बार नए- नए रूप में आता है, कभी शहर में तो कभी खेत में। बाघ बसे बड़ा झूठ होते हुए भी इस सदी का सबसे बड़ा सच है। बाघ का विरोध विरोध होते हुए भी विरोध नहीं है। तो फिर क्या है? निसन्देह ऐसा कोई अर्थ जो न दिखाई देते हुए भी सत्ता में है। इस अन्तर्निहित अर्थ को प्रकट करने के लिए कवि को न तो की जरूरत पड़ती है और न ही बिम्ब की। वे अलंकारों का सहारा भी नहीं खोजते है। ये अर्थ एक के बाद एक उसी तरह चले आते हैं जैसे बाजीगर का खेल हो। बाघ एक ही है पर हर बार उसका अर्थ बाघ बदला है, हर बार उसका संदेश भी अलग है। मानो पूरी सृष्टि बाघमय हो गई हो।

झूठ के सच का विरोध

प्रकृति प्रेमी विशुद्ध जंगली जीव बाघ को शहर से उतनी अरुची होती होगी जितनी कि विशुद्ध शहरी को जंगल से हो सकती है। अतः बाघ का शहर में आना जंगल का शहर की ओर आकर्षित होना है या फिर शहर का जंगल बन जाना है। शहर उस जंगल से आतंकित भी है और प्रभावित भी। किन्तु जंगल शहर से ना तो आतंकित है और ना ही प्रभावित। इसीलिए तो बाघ शहर में आकर भी शहर में नहीं होता है। शहर जो उसके आगमन से तनिक सा भयभीत है, उसके बहिष्कार को भी सहन नहीं कर पाता। बाघ वापिस लौटने पर भी अपनी गंध छोड़ जाता है। शहर उस प्राकृतिक गंध की कमी महसूस करता है। ....पर मैं सुन रहा हूँ/ कि सब बोल रहे हैं.. पैरों से पूछ रहे हैं जूते / गरदन से पूछ रहे है बाल / नखों से पूछ रहे हैं कंधे/ बदन से पूछ रही है खाल......। नीन्द से लदी बैलगाड़ियाँ एक ऐसे गन्तव्य की ओर जा रहीं हैं जिससे वापिस लौटने का सवाल ही नहीं , और उनका प्रत्यक्ष गवाह बाघ है... जिन्दा व सुच्चा । यह बाघ न जाने यह आदीवासी संस्कृति है जो अवहेलना का शिकार होती रही है या सम्पूर्ण मानवता है। हर बार गाँव का थोड़ा सा चैन और जरा सा स्वाद शहर की ओर जाता है तो यह बाघ निरुपाय खड़ा देखता रहता है। ... वे चली जा रही थीं, स्वाद और नीन्द से लदी बेलगाड़ियाँ .....एक जिन्दा और सुच्चा बाघ , वहाँ चुपचाप खड़ा था , और देख रहा था जाती हुई बैलगाड़ियों को , यह जाना अनवरत है, हर बार कुछ खोने के लिए ही कभी अपने हिस्से की जमीन तो कभी अपनी पहचान ... वे इसी तरह जाती हैं बस्ती से शहर की ओर, और अपने हिस्से की जमीन , लगातार लगातार खोती हुई बैलगाड़ियाँ । सामन्यतः किसी का खोना किसी का पाना होता है , पर यहाँ खोना एकतरफा है, क्यों कि दूसरा पक्ष कुछ लेने को तैयार है ही नहीं। तो फिर उनका मन्तव्य क्या है? ... वे चली जा रहीं थीं / पेड़ों की खोखल और नदियों की दाढ़ में / पानी की चमक और सरसों की साँय- साँय में / चली जा रही थीं वे... झूठ को सच में बदलने का सबसे बड़ा माध्यम किस्सागोई या कथावाचन हो सकता है। सच्चाई यह है कि सब कुछ झूठ है, और जो कुछ झूठ है उसे सच साबित करना सिर्फ कथा या किस्सा गोई के वश में है। यह एक माध्यम है जिसके अनेक माध्यम हो सकते हैं। मसलन जंगल के बाघ का सहर में आना और उससे भिन्न रहते हुए भी अभिन्न रहना। यदि यह झूठ है तो इसे बयान करने वाली कथा सच है और यदि यह सच है तो कथा झूठ है। सम्भवतः यही वह विराट झूठ जिसका उल्लेख कवि आमुख में करते हैं । इस विराट झूठ के जबड़े में लगा खून किसी कथा की आड़ लेकर सच में बदल जाता है... तो सच्चाई यह है, कि उस समय बाघ, यहाँ होता है न वहाँ , वह आपने शिकार का खून पी चुकने के बाद, आराम से बैठा होता है, किसी कथा की ओट में! झूठ के सच का विरोध ही संभवतः बाघ की सबसे बड़ी उपलब्धि है।


करुणा में आतंक की मानवीयता

बुद्ध और बाघ के आगे रिक्त स्थान छोड़ा जाए तो बुद्ध के सम्मुख करुणा और बाघ के सम्मुख आतंक आएँगे। न तो बुद्ध को आतंक से जोड़ा जा सकता है न ही आतंक को बुद्ध से। ऐसा नहीं है कि बाघ का करुणा से कोई सम्बन्ध नहीं है परन्तु मिथकीय सच्चाई यह है कि बाघ का अर्थ ही आतंक है। यह भी गलत नहीं कि कभी- कभार करुणा में कायरता और आतंक में निर्भीकता होती है। बाघ सिर उठा कर देखता है पर बुद्ध का चेहरा झुका रहता है। -- पर कभी -कभी दोनों का / हो जाता था सामना / फिर बाघ आँख उठा कर देखता था बुद्ध को / और बुद्ध सिर झुका / बढ़ जाते थे आगे...जीवन अभिशप्त होता है करुणा और आतंक की दोहरी छाया में जीने को --.बुद्ध की करुणा और बाघ के आतंक की , एक दूसरे को काटती हुई दोहरी छाया में...आतंक में सिर्फ भूख है और करुणा में मात्र करुणा। करुणा और आतंक की प्राकृतिक सहयोगिता समान है। लेकिन आतंक के लिए करुणा की भाषा समझना मुश्किल है... वहाँ लोगों का खयाल था कि बुद्ध समझते हैं / बाघ की भाषा / पर बेचारे बाघ के लिए / बुद्ध की पाली घास की तरह सुन्दर थी / किन्तु एकदम अखाद्य ...फिर कुछ जरूर था जो दोनों को जोड़ता था। पर कभी- कभी रातों में , जब हिमालय की चोटियों पर / गिरती थी बर्फ / और नगर में चलती थीं तेज हवाएँ / तो नगर वासी सोचते थे --इसी झौंके में कहीं सिहरते होंगे बुद्ध / और कितना अजब है / कि इस झोंके में / कहीं हिलता होगा बाघ भी !

आतंक का आधुनिक रूप है मशीनीकरण । मशीन ना केवल सुविधा बल्कि छद्म चटख रंग भी देती है। इसी चटख रंग से प्रकृति के धूमिल रंग भी प्रभावित होते दीखते हैं। कभी-कभी यह प्रभाव ईर्ष्या का रूप ले लेता है। यह मशीन का प्रकृति का मशीन से तादात्म्य या फिर प्रकृति का मशीन से प्रभावित होना माना जा सकता है। जब बाघ की कल्पना टैक्टर को बड़े से लाल दाने के रूप में देखती है तो यहाँ बाघ आदमी की भोली लालसा के रूप में दिखाई देता है। बाघ की कल्पना में बुढ़िया परम्परा के प्रति विमोह है , एक ऐसा विमोह जिसमे परम्परा की पुनर्व्याख्या सम्भव है..फिर उसने दबी हुई ईर्ष्या से / नीचे से उपर तक / गौर से देखा समूच टैक्टर को / और खुद ब खुद / एक बुढ़िया की बटुली में / पकने की इच्छा से / हो गया लाल....

शिक्षा को जब किसी जाति धर्म से जोड़ने की कोशिश की जाती है तो वह दुश्कर हो जाती है। धर्मान्धता के समक्ष बाघ की हार आदमी की कमजोरी है। उसकी सारी लड़ाइयाँ यहीं आकर रुक जाती हैं। जब बाघ कोशिश कर के भी ईश्वर नहीं लिख पाया तो उसकी हताशा आदमी की हताशा से अलग नहीं थी... ते उसकी आँखों में एक अजब सी / पीड़ा भरी चमक थी / जैसे लड़ते लड़ते / पहली बार पछाड़ खा गया हो.... वह ईश्वर ना लिख पाने के कारण दुखी नहीं था , वह इसलिए दुखी था कि ईश्वर नाम उसकी जिन्दगी के आसपास नहीं था।

प्यार में क्रूरता एक आत्मसुख विनोद है, बाघ की गोद में बैठा खरगोश अनुभूति क्या हो सकती है इसकी कल्पना करना भी कठिन है। बाघ के स्नेह में कितनी स्वादानुभूति होगी, और खरगोश के मन में प्रेम का यह रूप मृत्यु से कम भयावह नहीं होगा... फिर उसी तरह उन नरम- नरम रोमो में / अपने नखों को फिराता रहा / और उस मुलायम सी देह को / इस तरह सहलाता रहा / जैसे कि उसकी जीभ /, उस अद्भुद कोमलता का / स्वाद ले रही हो..... लेकिन इस प्यार का सुन्दर रूप भी होता है वह तभी होता है जब उसमें प्रकृति सी निश्चलता हो जब कोई वटवृक्ष गुनगुनाने लगता है तो उसकी जान का दुश्मन लकड़हारा भी प्यारा दोस्त बन जाता है। सुरों की आत्मीयता क्रूरता को आवाक कर देती है। फिर बाघ / हिला न गुर्राया/ बस उसी तरफ मुँह किए/ देर तक खड़ा रहा/ मुग्ध आवाक,,,,!

इस तरह बाघ की करुणा और आतंक के नए नए अर्थ खोलती जाती है, अन्ततः शब्द अपने चोले को उतार का नया चोलापहनने को तैयार हो जाते है।

जिन्दगी से विमोह

समाज में तेजी से बढ़ता जा रहा अभिजात्यीकरण सामान्य जीवन को लुभाने के साथ- साथ आतंकित भी करता है। जब भी आम आदमी इससे अलग पाता है, अपनी हीनता को नए सिरे से अनुभव करने लगता है। एक वह अभिजात्य आवरण के चुम्बकीय आकर्षण को महसूस करता है तो दूसरी ओर अपने अस्तित्व के प्रति शंकित भी हो जाता है। झाड़ियों से घिरे घर में सगोतिया की आग से गरमा रहा अभिजात्य परिवार एक ओर तो बाघ को अपनी देह की दुर्गंध का अहसास करवाता है, दूसरी ओर दीवार पर टंगी बाघ की खाल से प्रकृति के प्रति आतंक भी उपजाता है-- आग एक घर के / अन्दर जल रही थी / और झाड़ियों से घिरा वह घर / एक बंगल था जहाँ से आ रही थी / किसी परिचित लकड़ी के / जलने की गंध/ ....बाघ को पहली बार/ अपनी देह से उठती दुर्गंध से/ डर लगा...मैं मारा जाऊँगा/ मारा जाऊँगा.. सोचता रहा वह....उसकी विवशता यह भी है कि वह इस आतंक के खिलाफ आवाज भी नहीं उठा सकता। बाघ ने पहली बार / चिल्लाना चाहा/ पर चिल्लाना उसे नहीं आता था.. यह विरोध उसके भीतर ही चीत्कारता रहा... अन्दर कहीं चिल्ला रहा था वह/ कि वो देखो/ वो जो टंगी है दीवार पर / वह मेरी हाँ वह मेरी देह है...
न्याय का प्रसिद्ध सिद्धान्त है .. जहाँ धुँआ है वहाँ जिन्दगी है.... बस्ती है - लोग हैं जिन्दगी की उपस्थिति एक निर्जीव तत्व से स्थापित हो जाती है। तभी तो बाघ के पास सब कुछ है.. हिरण , पानी , हवा आदि, किन्तु जब उसे धुँआ नहीं दिखाई देता है तो वह उदास हो जाता है.... आज धुँआ नहीं उठ रहा थ/ पूरब या पश्चिम/ कहीं से भी/ शाम हो रही थी, और बाघ हैरान परेशान. कि क्या हुआ? क्यों नही उठ रहा है धुँआ... उसे पता था, कि जिधर से भी उठता है धुँआ , उधर होती है बस्ती .....जाने कैसा कैसा लग रहा था बाघ को , न बैठे रहने का मन, न छलांग मारने की हुमस......
जिन्दगी से जुड़ाव आदमी की खासियत है , चाहे कितनी भी दूर भागे , वह फिर जिन्दगी की ओर आता ही है, यह मोह भीतरी विमोह का परिणाम है। विमोह से हताशा उपजती है। बाघ आदमी के भीतर की हताशाभी है। आदमी का दुख दुमुखा है ... कभी वह दुख से दुखी होता है तो कभी उसकी कल्पना से ही दुखी हो जाता है। हो सकता है कि उन्हें काँटा गड़ा हो!...., हो सकता है आदमी ही, गड़ गया हो काँटे को ....

इस विमोह से छुटकारा पाना आदमी के अस्तित्व के लिए जरूरी होता है , उसके लिए आदमी को अपने भीतर की उस अवस्था को खोजना पड़ता है जो उसके आदमी बनने से कहीं पहले की थी । जिस तरह बच्चे के लिए खिलौना हकीकत है, खिलौने का टूटना जिन्दगी के टूटने से कम नहीं है। आदमी के भीतर का यह बच्चा जब तक जीवित रहता है वह कल्पना से सम्बन्ध स्थापित कर पाता है... सवेरे सवेरे / एक बच्चा रो रहा था/ उसके हाथ से गिर कर/अचानक टूटा था / उसका मिट्टी का बाघ/ एक छोटा सा बाघ/ जो तारों से लड़ चुका था / जो लड़ चुका था चाँद और सूरज से, और समुद्री डाकुओं से / ठीक उसकी आँखों के सामने/ उसके हाथ से गिरा/ और खट से टूट गया...

विमोह जिन्दगी का यथार्थ नहीं है, वह क्षणिक अवस्था है, विमोह वह पिंजरा है जो उसके मन को रोक नहीं पाता। पिंजरे में बन्द बाघ को जब भी जंगल में आम के पकने की सुगन्ध आती होगी , उसका मन पिंजरे के बाहर होता होगा... हवा का / एक सुगन्धमय झौंका आया/ और बाघ जो उस समय कहीं पिंजरे में था/जरा सिहरा / शायद जंगल में आम पक रहे हैं/ उसने सोचा....फिर बदन को जरा ढ़ीला किया, नासपुटों को फैलाया, एक जोर से साँस ली, पृथ्वी पर लम्बी , और हो गया चित्त!

अन्तहीन अन्त

आदमी निरन्तर अन्त होती जिन्दगी के अन्त के प्रति शंकालु रहता है, जिन्दगी के प्रति नहीं। जिन्दगी का अन्त हमेशा नए जीवन का उद्भव हो ही , यह जरूरी नहीं। बाघ जैसे प्राणियों की प्रजातियाँ जिस तरह लुप्त हो रही हैं, उससे लगता है कि कभी इन प्राणियों की सत्ता मात्र पुस्तक तक सीमित रह जाएगी। इन प्रजातियों के नष्ट होने के अलवा भी कुछ भय हैं जो जिन्दगी के नष्ट होने से कम कष्टकारक नहीं। मसलन की किताबें पढ़ने की आदत, शब्दों के प्रति आत्मीयता आदि..... उन्हें डर है कि एक दिन/ नष्ट हो जाएंगे सारे कि सारे बाघ.... मुझे भी डर है/ पर मुझे एक और भी डर है / बाघ से ज्यादा चमकता डर/ कि हाथ कहाँ होंगे/ आँखे कहाँ होंगी जो पढ़ेंगी किताबे/ प्रेस कहाँ होंगे जो उन्हें छापेंगे...

किताबें मात्र किताबें नहीं होतीं/ शब्द मात्र आदमी तक नहीं रहते / पूरे पर्यावरण में फैल जाते हैं...वे मौत के सामने एक मीठा गीत बन जाते हैं...जिसे हवा सुनेंगी/ और अपनी स्मृति में गढ़ लेगी/ एक पूरा का पूरा शब्द / जिसे पत्ते दुहराएँगे/ और पृथ्वी के किन्हीं अदृश्य तारों से/ किसी सुदूर अस्पताल की खिड़की के नीचे/ एक मरते हुए आदमी के होंठों तक पहुँच कर/ चुपके से बन जाएगा/ एक छोटा सा/ मीठा सा गीत....
जीने की चाह ही आदमी के अस्तित्व को बनाए रखती है, ... जीना होगा/ जैसे पानी जीता है/ जैसे पत्थर जीता है, इंच- इंच जीना होगा/ चप्पा -चप्पा जीना होगा/ और जैसे भी हो / यहाँ से वहाँ तक समूचा जीना होगा.....


खण्डों में बँटी अखण्डता

बाघ एक समूची चेतना है, जिसे खण्ड देखकर भी समूचे देखने का आभास होता है। पूर्णता मात्र कल्पना है, वस्तुस्थिति खण्डता में ही अखण्डता को तलाशती है, यही खण्डित अखण्डता हमें जिलाए रखती है... किसी ने देखी/ सिर्फ उसकी आँखे/ किसी ने धारियाँ/ किसी को दिख गए पूरे जबड़े/ किसी को हिलते हुए माँसल पुट्ठे...सब को थोड़ा थोड़ा / दिख गया बाघ। खण्ड- खण्ड बाघ वैसे ही एक समूची चेतना बन कर जी जाता है/ जैसे कि खण्ड- खण्ड काल एक चक्र पूरा करने पर छद्म ही सही / एक पूर्णता पा लेता है।

आज के समय में जब कि नई सदी का रोमांच भी धूमिल सा पड़ गया है , बाघ अपने समय को खोता नहीं है। कवि कहते हैं..मित्रों , इस तरह एक ऋतु- चक्र पूरा हुआ/ और चक्र में सिर्फ एक गति होती है/ जो चलती रहती है निरन्तर, चक्र के चक्रे होने विरुद्ध.....
चक्र समय को काटता नहीं , बल्कि गति देता है,  आरंभ और अन्त के बीच निरन्तरता बनाता हुआ, यही कवि का बाघ है----अन्त में मित्रों / इतना ही कहूँगा/ कि अन्त महज मुहावरा है/ जिसे शब्द हमेशा अपने विस्फोट में उड़ा रहता है/ और बच रहता है हर बार/ वही एक कच्चा सा/ आदिम मिट्टी सा ताजा आरंभ/ जहाँ से हर चीज/ फिर से शुरु हो सकती है/ फिर से खड़िया/ ककहरा फिर से/ फिर से गिनती सौ से शून्य की तरफ/ सूर्यास्थ से धूप घड़ी की तरफ/ समय फिर से....

बाघ इंच- इंच करके सम्पूर्ण ऋतु का एक चक्कर लगा आता है। हर पल नया अर्थ खोलता जाता है और पाठक किसी तरह के बौद्धिक दवाब के परे रह कर उसके द्वारा अपने को समझने की कोशिश करता है। मानो बाघ ने कुरेद- कुरेद का उन आकारों को निकाल लिया है जो ऐन आँखों के सामने होते हुए भी दिखाई नहीं देते, वह भी सरलता औ सहजता से। कवि की भाषा शैली में अद्भुत ताल, लय और गति है कि भाव तैरते चले आते हैं, मानो कवि कहना चाहते हो कि जिन्दगी उतनी सरल है जितना कि बाघ, और उतनी ही कठिन जितना कि बाघ। अन्त फिर से एक नए आरंभ की सूचना देता है।


रति सक्सेना


 


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