डोगरी कविता
कवि केदारनाथ से एक संक्षिप्त साक्षात्कार--- कृत्या की संपादक रति सक्सेना द्वारा

केदारनाथ सिंह अपने समय के वरिष्ठतम कवियों में गिने जाते हैं। आप उन कवियों में से हैं जो आलोचना व वादविवाद के दायरे में बार- बार लाए जाते रहे हैं और बार- बार अपने सहज स्वभाव श्रेष्ठ सृजन के कारण छूटते गए। मेरा उनसे तब परिचय हुआ था जब मैं समकालीन हिन्दी से अनभिज्ञ सी केरल में मानों अज्ञात वास में थी। उन दिनों " कल्पना" के सम्पादक रहे मुनीन्द्र जी के बार- बार प्रौत्साहित करने पर मैं अनुवाद के क्षेत्र में कूद पड़ी थी। तभी मुझे मलयालम कवि अय्यप्प पणिक्कर जी की कविताएँ अनुदित करने का मौका मिला , अनुवाद एक तरह से स्वीकृत किए गए तो अय्यप्प पणिक्कर जी ने साहित्य अकादमी द्वारा पुरस्कृत अपनी कविता पुस्तक के अनुवाद का प्रस्ताव रखा। दरअसल में उन दिनों ना तो अय्यप्प पणिक्कर जी कार्य से ज्यादा परिचित थी और न ही समकालीन हिन्दी साहित्य से इत्तिफाक रखती थी। कारण यह था कि उन दिनों केरल में पाठ्यपुस्तकों के अतिरिक्त साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं का अभाव सा था। 1975 में राजस्थान छोड़ने के साथ मेरा साहित्य से नाता कट सा गया था । एक बार जब मुनीन्द्र जी हिन्दी प्रचार सभा के किसी कार्यक्रम में आए तो उन्होंने एक तरह से मेरे काम की दिशा निर्धारित सी कर दी। उन दिनों मैं कुछ छोटा -मोटा लिख कर लेखन की खुजली मिटा लेटी थी किन्तु मुनीन्द्र जी ने मुझसे अनुवाद के लिए जोर देकर कहा। और इस तरह विशेष आग्रह पर मैंने छुटपुट अनुवाद शुरु किए। मूर्खता ही मानी जाएगी कि केरल के सबसे कठिन माने जाने वाले कवि का अनुवाद सबसे पहले हाथ में लिया। खैर इसी मूर्खता की कड़ी मे एक और मूर्खता यह थी कि अय्यप्प पणिक्कर जी की पुस्तक का अनुवाद लेकर जब मैं उनके पास गई तो उन्होंने कहा कि जब दिल्ली जाओ तो केदारनाथ जी से मिल कर अपने अनुवाद दिखलाना, और मैं उनकी बात मानते हुए बड़े सहज भाव से केदारनाथ जी घर चली गई, बिना यह समझे कि मैं अपने समय के एक बड़े कवि से मिलने जा रही हूँ। केदार जी ने सहजता से अनुवाद को ध्यान से पढ़ा और सुझाव दिए। यह अनजाना सा सहज परिचय आज तक बना हुआ है, जिसके चलते मैंने केदार जी से कृत्या के लिए साक्षात्कार की बात की । इतने वर्षों में भी केदार जी ने स्वभाव को नहीं बदला और , उन्होंने सरल मुस्कान के साथ मेरी बात मान ली। दिल्ली की दूरियों का मुझे बहुत ज्यादा अनुभव नहीं है, अतः विकासपुरी से हैबिटाइट सैन्टर के लिए निकलने पर मैने समय की सीमा पर यह ध्यान ही नहीं दिया। परिणाम यह हुआ कि केदारनाथ जी जैसे वरिष्ठ लेखक को मेरा एक डेढ़ घन्टे तक इंतजार करना पड़ा, यह बात मेरे लिए शर्मिन्दा होने के लिए पर्याप्त थी यही नहीं साक्षात्कार के लिए मुश्किल से कुछ मिनिट मिले, क्यों कि केदार जी के कोई रिश्तेदार उनके साथ थे, जिन्हें तुरन्त ही वापिस स्टेशन जाना था ? अग्रिम यात्रा के लिए इन कुछ मिनटों मे ही केदार जी ने बड़ी स्पष्टता जो बाते कहीं, वे हमें और हमारी कविता को अपने समय से जोड़ती हुई एक दृष्टि देती हैं।

सम्पादक‍ कृत्या

मैंने जर्मनी से निकलने वाली वेब पत्रिका एण्डवर्ब द्वारा कृत्या के सम्पादक के समक्ष लाए गए एक सवाल का हवाला दिया‍.... ( So let’s talk about Indian literature for a second here-namely, we are hearing nothing but hushed silence from India in the states. In a country of roughly a billion, I find it hard to believe that there isn’t at least one literary genius worthy enough to push his work to the shores of the U.S. Why isn’t contemporary Indian literature making it over here? Is it a symptom of a larger problem, or simply American ethnocentrism? ) और पूछा कि भारतीय कविता के विश्व पटल में स्थान ना बना पाने का यह कारण तो नहीं कि समकालीन भारतीय कविता अन्य देशों से काफी भिन्न है, क्या ऐसा नहीं हो सकता कि भारतीय कविता विश्वपरक परिदृष्य को ध्यान में रख कर लिखी जाए?

केदार जी..


यदि भारतीय कविता अन्य देशों की कविता से अलग है तो अलग होनी भी चाहिए, देशकाल के अनुसार भिन्नता कविता के स्वभाव में है। भारत में कविता की जो विधा है वह कहीं और नहीं है। जिस वेरियेशन की बात आप कर रहीं हैं वह तो समृद्धि की सूचक है। उसके लिए चिन्तित होने की आवश्यकता ही नहीं है। कविता अपना स्वरूप स्वयं ही बना लेती है। यह चिन्ता का विषय नहीं है।


सम्पादक‍ कृत्या


लेखन में भिन्न- भिन्न वादों का स्थापन और खण्डन भारतीय कविता के लिए नया नहीं है, समाज में उपस्थित वाद विवाद का प्रभाव कविता पर पड़ता रहा है। इन्हीं में नारीवाद के चलते जिस तरह की रचनाएँ रची गई, उनमें आरंभ में तो एक तरह की साफगोई और ईमानदारी झलकती थी, किन्तु कुछ वक्त के बाद ऐसा लगा कि इस भावना को भुनाया जाने लगा, ओर एक ऐसा छद्म खड़ा हो गया कि अब लगता है कि नारी विषय कविता में उतनी ही पुनरावृत्ति हो गई जितनी कि एक वक्त संस्कृत में शृंगार मूलक कविता हो गई थी। कभी- कभी मुझे लगता है कि ऐसी रचनाएँ सिवाय नेगैटिव भावना पैदा करने के कुछ नहीं कर पा रही हैं।

केदार जी--


नहीं ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि उसमें कुछ भी पोजीटिव नहीं है, दरअसल नारी वादी रचना ने भाषा को काफी कुछ दिया है , कुछ तो बड़ी सशक्त लेखिकाएँ भी हुई है जैसे कि अहिल्याबाई आदि, लेकिन स्त्री लेखन से जो संस्कार भाषा को मिला वह बहुत महत्वपूर्ण है। घर के भीतर की भाषा ने साहित्यिक भाषा में प्रवेश कर लिया। घर एक ऐतिहासिक चरित्र के रूप में परिवर्तित हो गया। अनेक शब्द भाव और अर्थ जो पहले साहित्य के लिए अरिचित थे, वे अनायास स्थान बनाने लगे। साहित्य को एक नया स्वर और स्वभाव भी मिल पाया। मेरे विचार से स्त्री लेखन साहित्य को सम्पूर्ण बनाता है।


सम्पादक‍ कृत्या

कविता को लेकर हमारे देश में ही काफी कुछ वेरिएशन है, जैसे केरल में कविता प्रस्तुति एवं छन्द विधान बहुत पापुलर है, हिन्दी मे समकालीन कविता का साहित्यिक रूप विचारप्रधान है, किन्तु आजकल फिर टी.वी. चैनल कविता को मनोरजन के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इस तरह कविता पुनः पापुलर और साहित्यिक खेमों में बटती जा रही है। पत्रिका एण्डवर्ब पत्रिका द्वारा पूछे गए सवाल से यह पता चलता है कि कविता की पापुलरिटी की समस्या पश्चिमी देशों में भी है। ( Is literature dying the same slow death in India, going the way of Baliwood as our great works are fed to dogs in Hollywood? ) मुझे लगता है कि मंचीय कविता का श्रोता है, साहित्यिक कविता आम आदमी के बीच लोकप्रियता खोती जा रही है।

केदार जी...

लोकप्रिय शब्द में नैगेटिव ध्वनि निकलती है। कविता को हमेशा ही उच्चतर श्रोता मिले हैं। कविता को किसी तरह के बन्धन में डालने का में व्यक्तिगतरूप से विरोधी हूँ, गायन में भी इतनी विविधताएँ हैं, लोकप्रियता कविता की ना तो कसौटी है और ना ही सीमा..

सम्पादक‍ कृत्या


आपने बाघ के रूप में हिन्दी कविता के सामने एक नई परम्परा रखी है, एक नया शास्त्र रचा है..आज लेखक और पाठक में अन्तराल क्यों?


केदार जी...


नही बाघ से परम्परा नहीं बनी है, बाघ एक मोटिव के रूप जरूर सामने आया है। यह सही है कि आजकल कविता के स्वाद बोध में आए पाठक की अपेक्षा को समझा नहीं जा रहा है, यह अन्तराल कुछ बढ़ जरूर रहा है, किन्तु कविता में भी तो जैनरेशन गैप होता है। लेखन अनुभव जन्य होता है। अनुभव ही कवि का परिचय और ताकत है।

सम्पादक‍ कृत्या
 

कृत्या के लिए कुछ सन्देश?

केदार जी...

कृत्या अच्छा प्रयास है , कृत्या काफी दूर दूर तक पहुँच रही है , मेरी शुभकामनाएँ हैं।

विरोध में अन्तर्विरोध -- बाघ---कवि केदारनाथ जी की लम्बी एवं बहु चर्चित कविता पर एक  विमर्
 


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