दिलीप कुमार कौल की कविताएँ

अभिशप्त दिनांक

कवि लम्बी उमर से नहीं डरता
वह याद रखता है हर दिन
6  दिसम्बर की राष्ट्रीय शर्म और
11 सितम्बर के अन्तरराष्ट्रीय शोक के बीच
वह याद रखता है 19 जनवरी का निजी दुख
" क्या फायदा दिनाँको को याद रखने से!
सामने लम्बा जीवन है
अनगित दिन हैं सुख और समृद्धि के"
बुद्धीजीवी सान्त्वना
अभिनन्दन ग्रन्थ लेकर चली जाती है
तो कवि समझ जाता है कि
अब कभी भी गोली चल सकती है
कि इतिहास में एक और हत्या का दर्ज होना
या भरे बाजार में
एक लड़के का एक लड़की को
प्रेम पत्र थमाना
एक जैसी तटस्थता को आमंत्रित करता है
कवि फिर भी नहीं करता
मौत की प्रार्थनाएँ

19  जनवरी -- 19  जनवरी 1990  के दिन कश्मीर की हर मस्जित के लाउडस्पीकर पर भारतविरोधी नारे बाजी हुई, कश्मीरी पण्डितों को कश्मीर छोड़कर चले जाने को कहा गया। अगले दिन से कश्मीरी पण्डितों का विस्थापन शुरु हो गया।


(दिलीप कुमार कौल अन्य कविताएँ) .


सीताकांत महापात्र की कविता

दूब

दूब दूब पहचानता हूँ मैं तुझे
हुत् हुत् जलता सूरज और आकाश
निश्चल शान्त मेदिनी
है कितना अद्भुत भरोसा तुझे
है कितना विश्वास
पीकर जरा सी ओस
दिन- दिन भर , रात- रात
घुटनो चलना, घिसटते हुए
कुँआ कुँआ रोना और हाँफना
सुना है सुना है
रेत में अँगुली भर आगे
विकल प्राणी का बरताव
पहचाना पहचाना है
दुबली पतली हरी देह में तेरी
आनन्द और यंत्रणा का शिलालेख
खरोंच- खरोंच कर पढ़ा है मैने सदा।

देख मेरी ओर
कोमल पत्ते की आँखों से
किसलिए घिसटती हूँ मरुस्थल में
शून्यता से शून्यता ही
अँधेरे से घोर अँधेरे में
प्रथम कुँआ कुँआ के जापाघर से लेकर
शब्दहीन शेष घड़ी तक
बीच में यही बँधाए कुल पल
अबूझ , फिर भी आस्वाद
कैसी यंत्रणा, कैसा अंधकार
फिर भी है आल्हाद।

दूब दूब
यह आकाश , चाँद और ओस
दूब दूब
नारी और नक्षत्रों की नील रात्री
पवन का स्नेह से सरोबार स्वर
दूब दूब
क्षुधा, तृणा, प्रतीक्षा का अंतहीन उनींदा प्रहर
साथ- साथ रमे हैं
सखि मेरी प्राणों की अपनी।

(
सीताकांत महापात्र की अन्य कविताएँ )



विजयदेवनारायण साही की कविता

सन्दर्भहीन बारीश

बारीश- बारीश- बारीश
इस सुनसान बारीश का कोई नाम नहीं है
और न उस आवाज का ही
जो घास पर पड़ती हुई बून्दों से
पैदा होतीं है
सिवा इसके कि मुझे महसूस होता है
कि इस आवाज को मैं
आजीवन सुनता रहूँगा
और इसमें कभी कोई फर्क नहीं पैदा होगा।
हजारों खिड़कियों पर
लोग हाथ पर हाथ धरे
दिन डूबने का इंतजार कर रहे हैं
और उन्हें भी लग रहा है
कि आज जो वे हो गए हैं
सचमुच कल भी वे वही थे।
और इसी तरह
लगातार जमीन और आसमान को मिलाने वाली
नीरस बारीश होती रहेगी
जिसके बाद कुछ करने को
शेष नहीं रह जायेगा
जिस तरह हरारत की धारा बहते बहते
एक सपाट सन्तुलन पर पहुँच जाती है
फिर कुछ भी घटित नहीं होता।
बेशक मैं उन लोगों में से हो गया हूँ
जिनके पास करने को कुछ भी नहीं
सोचने को बहुत है।
एक बार खिड़की पर कैद
तुमने और मैंने
सिर्फ चिन्तन की पीली शहतीरें फैंक कर
खुले आसमान तक
अदृश्य सुरंग बनाने की कोशिश की थी
जिसके भीतर हम चुचाप फरार हो सकें
और उस सुरंग के रास्ते
सुनसान कमरे में
सुनहरे सफूफ की तरह रोशनी आयी थी
जिसके आवरण में
तुम समूचे खड़े हो गए थे
तुम्हारे बाल प्लैटिनम की तरह चमक रहे थे
और तुम्हारी आँखे अपरिचित हो गयीं थीं

मैंने पूछा थाः तुम कहाँ हो?
तुमने कहाः मै इतिहास के बाहर चला गया हूँ।
फिर हमने
इस घटना का जिक्र नहीं किया।
लेकिन मैं उन लोगों में से हो गया हूँ
जिनके पास सोचने को बहुत है
करने को कुछ नहीं
और तब से मैंने
न जाने कितनी बातों के टुकड़े सोच डाले हैं
और हर सोची हुई बात
सोख्ते में दबी हुई
सूखी और नाजुक पत्ती की तरह हो गई है
जिसकी दिन ब दिन साफ दीखती हुई रगों पर
इतिहास के बाहर से
सुनहरी रोशनी का सफूफ गिरता है।
बारीश- बारीश- बारीश
मैं फिर उसी कगार पर वापिस आता हूँ
और खिड़की के पार
मटमैले आसमान की ओर देखता हूँ
जिसमें बादल इतने सपाट हैं
कि उनके होने का पता ही नहीं चलता
सिर्फ सन्दिग्ध बून्दें बरस रहीं हैं
और पड़ोंस की छत से
धार गिरने की आवाज आती है।
और यह सारा शहर
अनिवार्य बारीश में इस तरह भीग रहा है
जिस तरह जानवर भीगते हैं।


( विजयदेवनारायण साही की अन्य कविताएँ )


सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की कविता


यह हाथ

डूबते आदमी का
जल से ऊपर उठा यह हाथ
फिर- फिर शून्य को पकड़ता
मेरे साथ-
तुमने रचा।

हथकड़ियाँ पहनाने के लिए
अब भी है यह बचा ।

इसे शुमार कर लो उस गिनती में
जिसे तुम भूलते जा रहे हो।

नित नयीं चट्टान तोड़कर
उगते पेड़- सा यह हाथ
सख्त धरती की परतें फोड़कर
निकली घास की पत्ती सा यह हाथ,
निरन्तर मेरे साथ-
जिसके इशारे पर
पानी में पड़ी लाश- सा
तुम फूलते जा रहे हो।

इसे शुमार कर लो उस गिनती में
जिसे तुम भूलते जा रहे हो।
अकड़ी हैं उंगलियाँ- शाखाएँ
इन पर चिड़ियों से कहो
आएँ , गाएँ
पर फैलाएँ।

( हिमम्त शाह की कृति हाथ देखकर )
 

(सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की अन्य कविताएँ)  
 


के जी शंकर पिल्लै की कविताएँ


धोबी

मेरी धोती की किनारी का रंग फीका होता जा रहा है
बार बार धोबी ने कहाः
" हर दफा साफ करते समय
यह लाल रंग छूटता जा रहा है
इतनी लाली इसमें कहाँ छिपी हुई है
पहले भी इस तरह कहीं देखने में आई है
निगोड़ी , नालायक....
आखिर धोबी का हट और बढ़ता गया...
" कमबख्त .. इसकी लाली के छूटने को रोक भी सकूँगा या नहीं..."
कह कर वह चला गया।
अगली बार धोबी कुछ देर से आयाः
फैसला देने को उद्यत जज की गम्भीरता के साथ
चुचाप, उसने , मेज पर रख, धोती की गठरी खोली
वह धोती असाधारण ढंग से
एक शहरी के समान सफेद हो चुकी थी,
खून की लाली से युक्त ज्वार वाली उसकी हर नस।

अनुवाद डा. अरविन्दाक्षन

( के जी शंकर पिल्लै की अन्य कविताएँ )


चन्द्रकान्त देवताले की कविता


बेटी के घर से लौटना

बहुत जरूरी है पहुँचना
सामान बाँधते बमुश्किल कहते पिता
बेटी जिद करती
एक दिन और रुक जाओ न पापा
एक दिन

पिता के वजूद को
जैसे आसमान में चाटती
कोई सूखी खुरदरी जुबान
बाहर हँसते हुए कहते कितने दिन तो हुए
सोचते कब तक चलेगा यह सब कुछ
सदियों से बेटियाँ रोकती होंगी पिता को
एक दिन और
और एक दिन डूब जाता होगा पिता का जहाज

वापस लौटते में
बादल बेटी के कहे के घुमड़ते
होती बारीश आँखो से टकराती नमी
भीतर कंठ रूँध जाता थके कबूतर का

सोचता पिता सर्दी और नम हवा से बचते
दुनिया में सबसे कठिन है शायद
बेटी के घर लौटना।


( चन्द्रकान्त देवताले की अन्य कविता )
 


सुजाता की कविता


पहाड़ी केक

मानो तो
मेरे लिए
पहाड़ सा ऊँचा केक बनवा दो
सजी हो फूल पत्तियाँ
पहाड़ी झरने
रंगीली मोमबत्तियों सी उम्मीदें
फूंक मारते ही
टपकें मौसमी आँख से
आषाढ़ की बून्दे रिमझिम
महक उठें चीड़ वनों की सांसे
तालियों में फ्रेम हो जाए
" हैप्पी बर्थ डे" की सौंधी गूंज
खुशनुमा केक का एक टुकड़ा
तुम्हें खिलाऊँ
तुम भी चख लो
पहाड़ी केक का स्वाद

(
सुजाता की अन्य कविताएँ )
 



रति सक्सेना की कविता

पहाड़ों के मरुस्थल में
              (लद्दाख)

#
सुना तुमने?
पाहुने आए हैं तुम्हारे दरवाजे
और तुम
निसंग, उचाट, निपाट
यूँ ही बैठे रहोगे ?
या फिर
तनिक पानी दोगे
देखो मेरे पाँव पड़पड़ा उठे हैं
धूल से


##

नहीं,
नहीं सुना
या फिर सुन कर
कर दिया अनसुना
उन्होंने॔
"निपट पाहन जो हो
यदि हरी होती एक भी शिरा
बैठे रहते क्यों इस तरह?"
मैंने गुस्से को नहीं रोका
फिर ?
आँधी का अट्टहास
कुछ बून्दें
" लेह में बरसात
वह भी इस मौसम में?"

अचंभित थे लोग
बस मैं नहीं!

###

(
रति सक्सेना की कविता... आगे )
 

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ