विजयदेवनारायण साही


7 अक्टुबर 1924 को वाराणसी में जन्मे,  स्व. विजयदेवनारायण साही एक समर्थ कवि, चिन्तक, प्रखर आलोचक और जुझारू राजनीतिज्ञ थे। इपने आलोचना, नई कविता जैसी पत्रिकाओं का सम्पादन किया, और अनेक पुस्तकें रचीं आपका निधन 5 नवम्बर , 1982 को इलाहाबाद में हुआ।

संध्या चित्र

रह रह कर छेड़ती सी हवा
      गुलाबी पतंग के पीछे
              भरे- भरे
                 गुदगुदे गुलाबी बादल।

कंगूरे के ऊपर हवा हवामुर्ग
      खिलाड़ी
          पेट के सहारे नाचता है
               चौंच से पूँछ पकड़ने को।


बाँझ कामधेनुएँ

बाँझ कामधेनुएँ
रंभाती हुई आईं
और मेरे चारों ओर आकर ठहर गईं
इस उम्मीद में कि मैं उनसे कुछ माँगूँगाः
मुझे सिर्फ घिर जाने की तकलीफ हुई
और मैं उनकी आँखों से आँखे मिलाए
घूरता रहा।

हर आँख में झाँकती हैं
वरदान के अचूक गृद्धों की तरह
कल्पवृक्ष की चबाई हुई पत्तियाँ
जिनसे एक बालिश्त नीचे
जबड़े जुगाली करते हैं।
तनाव की स्थिति में
रँभाना बन्द।

तीर्थ तो है वही….

आज मैने जीर्ण वसनों की तरह
तुम्हारे उन सुलभ मन्त्रोच्चारकों का कर दिया है त्याग
घोष करती नदी तट पर खड़ा हूँ चुपचाप
चमकती रेत
घुले रंगारंग पत्थर बिछे हैं अनमोल
और मन में किरकिराती है निरुत्तर शान्ति!

नहीं छूता है मुझे भैरवनाद
नहीं मन को बाँधता बेताब लहरों का उछलना
बह गये वसन धारा में न जाने कहाँ
लग रहा है आज फिर से लिया मैंने जन्म।

हुआ जो कुछ हुआ,
अब तो सत्य चाहे मिले
ढालों पर विकम्पित
घने वन की फुनगियों से झाँकता सा
चोटियों के मौन में
कुण्ड में चपचाप बहते हुए जल की आरसी में
बादलों से भरे नभ को देखते खामोश पक्षी में
गुजरते हुए राही में
अकेले फूल में
पर ओ नदी! अब तुम नहीं हो तीर्थ
तीर्थ तो है बर्फ का उजला सरोवर वही
जिसको छोड़ कर हम तुम
चले थे साथ

तुम्हे देकर विदा
फिर मैं लौट जाऊँगा वहीं..

 


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