सर्वेश्वरदयाल सक्सेना



सर्वेश्वरदयाल सक्सेना समकालीन कविता की प्रखर आवाज हैं, आपकी कविताएँ सामान्य से प्रतीक के सहारे भी सामाजिक ‍राजनैतिक यथार्थ से जूझने का दम रखती हैं। प्रतीकों और बिम्बों का इतना सहज प्रयोग दुर्लभ है। आपने एक ऐसी पहचान बनाई है जो कालातीत है।

रिश्ते

खुद कपड़े पहने
दूसरे को कपड़े पहने देखना
खुद कपड़े पहने
दूसरे को कपड़े न पहने देखना
खुद कपड़े न पहने
दूसरे को कपड़े न पहने देखना
तीन अलग- अलग रिश्ते बनाना है

इनमें से
पहले से तुम्हें मन बहलाना है
दूसरे को खोजने जाना है
तीसरे के साथ मिलकर

क्रान्ति और सृजन का परचम उठाना है।

फसल

हल की तरह
कुदाल की तरह
या खुरपी की तरह
पकड़ भी लूँ कलम को
तो फसल काटने को
मिलेगी नहीं हमको।

हम तो जमीन ही तैयार कर पाएँगे
क्रान्ति बीज बोने कुछ बिरले ही आएँगे
हरा भरा वही करेगे मेरे श्रम को
सिलसिला मिलेगा आगे मेरे क्रम को

कल जब फसल उगेगी लहलायेगी
मेरे न रहने पर भी हवा से इठलायेगी
तब मेरी आत्मा सुनहरी धूप बन बरसेगी
जिन्होने बीज बोया था उन्हीं के चरन परसेगी।

काटेंगे उसे जो, फिर वही उसे बोएंगे
हम तो कहीं धरती के नीचे दबे सोएंगे

शब्दों का ठेला

मेरे पिता ने
मुझे एक नोटबुक दी
जिसके पचास पेज
मैं भर चुका हूँ।

जितना लिखा था मैंने
उससे अधिक काटा है
कुछ पृष्ठ आधे कोरे छूट गये हैं
कुछ पर थोड़ी स्याही गिरी है
हाशिये पर कहीं
सूरतें बन गईं हैं
आदमी और जानवरों की एक साथ
कहीं धब्बे हैं गन्दे हाथों के
कहीं किसी एक शब्द पर
इतनी बार स्याही फिरी है
कि वह सलीब जैसा हो गया है।
इस तरह
मैं पचास पेज भर चुका हूँ।

इसमें मेरा कसूर नहीं है
मैंने हमेशा कोशिश की
कि हाथ काँपे नहीं
इबारत साफ सुथरी हो
कुछ लिखकर काटना न पड़े
लेकिन अशक्त बीमार क्षणों में
सफेद पृष्ठ काला दीखने लगा है
और शब्द सतरों से लुढ़क गये
कुछ देर के लिए जैसे
यात्रा रुक गयी।

अभी आगे पृष्ठ खाली हैं
निचाट मैदान
या काले जंगल की तरह।
बरफ गिर रही है।
मुझे सतरों पर से उसे हटा हटाकर
शब्दों का यह ठेला खींचना है
जिसमें वह सब है
जिसे मैं तुममे से हर एक को
देना चाहता हूँ
पर तुम्हारी बस्ती तक पहुँचू तो।

मजबूत है सीवन इस नोटबुक की
पसीने या आँसुओं से
कुछ नहीं बिगड़ा!
यदि शब्दों की तरह कभी
यह हाथ भी लुड़क गया
तो इस वीराने में
तुम इसके जिल्द की
टिमटिमाती रोशनी टटोलते
ठेले तक आना
और यह नोट बुक ले जाना
जिसे मेरे बाप ने मुझे दी थी
और जिसके पचास पेज
मैं भर चुका हूँ।  
लेकिन प्रार्थना है
अपने झबरे जंगली कुत्ते मत लाना
जो वह सूँघेगे
जो उन्हें सिखाया गया हो,
वह नहीं
जो है।

( अपनी पचासवीं वर्षगाँठ पर )

 


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