तेके जी शंकर पिल्लै



के. जी शंकर पिल्लै आधुनिक मलयालम साहित्य के विशेष हस्ताक्षर हैं। आपकी कविताएँ अपने बिम्ब और प्रतीकों द्वारा एक विशिष्ठ अर्थ की सृष्टि करती हुई अपने काल और स्थान के हर रूप रंग को प्रस्तुति देती हैं। प्रस्तुत कविताओं का अनुवाद डा. अरविन्दाक्षन द्वारा किया गया है जो स्वयं एक कवि आलोचक हैं।


वापसी

म्यूजियम पार्क में पेंशनी धूप
शाम की सैर करके वापस आते वक्त
भूतपूर्व मन्त्री महोदाय ने भूतपूर्व जज साहब से कहाः

यह पार्क मैंने बनाया था
लो, यह देखोः संगमरमर पर मेरा नाम,
कुछ कुछ लाल दिखने वाले फूलों से लदा यह पेड़
इसे मैं समतापुरी से लाया था
जहाँ देश भर, शहर भर, दिन भर
खिले हुए फूलदार पेड़ हैं।
लाते समय यह एकदम लाल था
सभी ने कहा-- ये रक्तिम हैं पुष्प।

देवालयों से भरे इस अन्तरीप की सफेद हवा में
ये हल्के होते गए
गेरुए तथा केसरिया रंगो की इस धरती पर
अब यह भी एक रामनामी है

अर्थ

दुनिया को
भाषा की रस्सी में पिरोकर
घड़ी की तरह
मैं लिए ले चलता हूँ
कहीं भी जाते समय
कुछ भी करते समय।

इसलिए
किसी दूरी का
किसी काम का
किसी शब्द का
किसी ताल का
किसी समय का
एक ही अर्थः काल

ऊँट

"आना मत"
उसने कहा
भविष्य, गहराई और नृत्य की जुगलबन्दी के साथ
जीवन का अनादि प्रवाह
पैरों में गति का ताल बाँध न सका
उसके पैर
शिला के खम्बे बन गए
उसके कावाडीस जूते का चमड़ा
उसकी जिन्दगी ने जितनी वसन्त दूरियाँ तय की थीं
याद करके आनन्दित होने लगा।

" छूना मत"
उसने कहा
सुगन्ध मन्त्रणा और चिकनाई के साथ
स्पर्श की अनादि भाषा की हवा
उँगलियों में प्रेम की तरंगे न बन सकीं
उसकी उंगलियाँ
खुर में तब्दील हुईं
हाथ शिलावत हो गए
उसमें बँधी
क्वार्ट्ज घड़ी पर
मृत्यु की पतंग
निरन्तर उड़ती फिरती रही

"बाते मत कर"
किसी भी नम्बर पर बुलाया नहीं
उसने कहा
फलफूल और ठण्डे झरनों के साथ
भाषा की अनादि वनस्पतियाँ
जीभ पर अंकुरित न हो सकीं
कैक्टस
चबाते-चबाते
उसकी जीभ
शिला रूपी पत्थर बन गई।
उसकी अरुचि और अनर्थ को ढँककर
प्रखर गन्ध और धूमधाम से आए
गैरजुबान वाल ताम्बूल ने
रास्तों में
आरती का दाग डाल दिया।
पहचान और सूचना की ऋतुओं के बाहर
तिरस्कृत हर प्रेमी जन के अन्दर
एक- एक ऊँट बड़ा होने लगा

जीवन ऊसर बन गया
रूप विरूप हो गया
गीत, कविता, उपन्यास में
सिनेमा में
सुहानी हिमवत धरती की खोज में
पैरों पर मरुस्थलीय बोझ के साथ
वह
महाव्रती
त्रासद नायक
कम रफ्तार वाला
बेसुरा
जिसे छूने का मन नहीं करता
गन्दा
कई नामों के साथ
निर्वेद काम से
सूखा- सूखा भटकता रहा।

उसकी यादें
जड़ हुई बिना रहीं
प्रेमार्दता का पवित्र अवशेष
उसके शिलासम शरीर पर

वह शीत जल स्रोत बन बह निकला
अन्धकार में भी वह दृष्टियुक्त
भीतरी आँख में परिणत हुआ।

 


मेरी बात | समकालीन कविता | कविता के बारे में | मेरी पसन्द | कवि अग्रज
हमसे मिलिए | पुराने अंक | रचनाएँ भेजिए | पत्र लिखिए | मुख्य पृष्ठ