तेचन्द्रकान्त देवताले



चन्द्रकान्त देवताले न केवल कवि ,बल्कि एक अच्छे आलोचक, चिन्तक और अनुवादक भी हैं। आपकी कविता जिन्दगी से जुड़ कर जीवन की बाते करती है। जमीन से जुड़ कर जगत से जुड़ना ही संभवतः उनका ध्येय है।

पत्थर की बैंच


पत्थर की बैंच
जिस पर रोता हुआ बच्चा
बिस्कुट कुतरते चुप हो रहा है

जिस पर एक थका युवक
अपने कुचले हुए सपनों को सहला रहा है

जिस पर हाथों से आँखे ढाँप
एक रिटायर्ड बूढ़ा भर दोपहरी सो रहा है

जिस पर वे दोनों
जिन्दगी के सपने बुन रहे हैं

पत्थर की बैंच
जिस पर अंकित है आँसू, थकान
विश्राम और प्रेम की स्मृतियाँ

इस पत्थर की बैंच के लिए भी
शुरु हो सकता है किसी दिन
हत्याओं का सिलसिला
इसे उखाड़ कर ले जाया
अथवा तोड़ा भी जा सकता है
पता नहीं सबसे पहले कौन आसीन हुआ होगा
इस पत्थर की बैंच पर!


और अन्त में

दिखाई दे रही है कई कई चीजें
देख रहा हूँ बेशुमार चीजों के बीच एक चाकू
अदृश्य हो गई अकस्मात तमाम चीजें
दिखाई पड़रहा सिर्फ चमकता चाकू
देखते के देखते गायब हो गया वह भी
रह गई आँखों में सिर्फ उसकी चमक
और अब अँधेरे में वह भी नहीं
और यह कैसा चमत्कार
कि अदृश्य हो गया अँधेरा तक
सिर्फ आँखें हैं कुछ नहीं देखती हुई

और अन्त में
कुछ नहीं देखना भी नहीं बचा
बेशुमार चीजों से कुछ नहीं तक को
देखने वाली आँखे भी नहीं बचीं।

 


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