सुजाता


सुजाता की कविताएँ सहज रूप से अपने आसपास घूमतीं हैं और एक ऐसे लोक की परिक्रमा कराती हैं जो है तो हमारे करीब पर हम उससे वाकिफ नहीं हो पाते हैं। छोटी छोटी सी बाते किस तरह कविता बन जाती है, हम सुजाता की कविताओं में देख पाते हैं।

विवशता

पंखा उड़ रहा है
वक्त उड़ रहा है
और हम
न उड़ते पर गिन सके
न पतों से धूल झाड़ सके

लेटरबाक्स

लेटरबाक्स में ढेरों चिट्ठियाँ थीं॔
बेतरतीब
ठसाठस भरी हुई
लेटर बाक्स
रास्ते की धूल, मिट्टी निगलता
धूप को चुनौती देता
आँधी , बारीश को ललकारता
किसी से मिलाता हाथ
किसी की फटी जेबे सीता
ताश के पत्ते बाँटता
खुले हाथों सबका स्वागत करता हुआ
खड़ा था
और अन्दर
साजिश चल रही थी

किसी एक दिन
चिट्ठियों ने बगावत कर दी
सारे ताले तोड़ बाहर आ गईं
चिट्ठियों की हड़ताल से
पूरा देश परेशान है
उधर लेटर बाक्स
जख्मी , लहुलुहान है

मौसम

जब भी बाहर निकलो
अपनी छतरी और दुशाला ले कर निकलो
बदलते मौसम की तरह
बरसने लगे हैं लोग


 


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