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महादेवी वर् मा
कुछ नाम ऐसे होते है जो अपने आप के साथ- साथ अपनी भाषा , समाज और
संस्कृति के लिए प्रकाश स्तंभ बन जाते हैं। महदेवी नाम भी उनमें से
एक है। वे उन कवियों में से एक हैं , जिन्होंने कोई वाद या समूह का
सहारा लिए बिना अपने लिए एक ऐसी मीनार बना ली जिसे कोई भी इतने
वर्षों में विखण्डित नहीं कर पाया। मीडिया की अनुपस्थिति के काल
में भी यह एक ऐसा नाम रहा जो ना जाने कैसे कितने कविता प्रेमियों
की .जबान पर चढ़ गया। जिसे किसी भी तरह के प्रचार की जरूरत महसूस ही
नही हुई। महादेवी की कविता कवि के उस असीम विरह की कथाएँ हैं जो
उसके लिए वरदान है। अव्यक्त वेदना कवि के मानस का वह सूना पन है
जिसे भरने के लिए वह विभिन्न वाग्विलास रचता है। इस बार हम महादेवी
जी की कुछ कविताएँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
सूनापन
मिल जाता काले अंजन में
सन्ध्या की आँखों का राग,
जब तारे फैला फैला कर
सूने में गिनता आकाश,
उसकी खोई सी चाहों में
घुट कर मूक हुई आहों में!
झूम झूम कर मतवाली सी
पिये वेदनाओं का प्याला,
प्राणों में रुँधी निश्वासें
आती ले मेघों की माला,
उसके रह रह कर रोने में
मिल कर विद्युत के खोने में!
धीरे से सूने आँगन में
फैला कर जब जाती हैं रातें,
भर भर के ठंडी साँसों में
मोती के आँसू की पातें
उनकी सिरहाई कम्पन में
किरणों के प्यासे चुम्बन में!
जाने किस बीते जीवन का
संदेशा दे मन्द समीकरण,
छू देता अपने पंखों से
मुर्झाये फूलों के लोचन,
उनके फीके मुस्काने में
फिर अलसाकर गिर जाने में!
आँखों की नीरव भिक्षा में
आँसू के मिटते दागों में,
ओंठों की हँसती पीड़ा में
आहों के बिखरे त्यागों में,
कन कन में बिखरा है निर्मम!
मेरे मानस का सूनापन!
1929 सितम्बर
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यह मन्दिर का दीप इसे नीरव जलने दो!
रजत शंख घड़ियाल स्वर्ण वंशी वीणा स्वर
गये आरती वेला को शत शत लय से भर,
जब था कल कण्ठों का मेला
विहँसे उपल तिमिर था खेला
अब मन्दिर में इष्ट अकेला,
इसे अजिर का शून्य गलाने को गलने दो!
चरणो से चिह्नित अलिन्द की भूमि सुनहली
प्रणत शिरों के अंक लिए चन्दन की दहली
झरे सुमन बिखरे अक्षत सित
धूप अर्ध्य नैवेद्य अपरिमित
तम में सब होंगे अन्तर्हित,
सबकी अर्चित कथा इसी इसी लौ में पलने दो!
पल के मनके फेर पुजारी विश्व सो गया
प्रतिध्वनि का इतिहास प्रस्तरों बीच खो गया,
साँसों की समाधि सा जीवन,
मसि सागर का पंथ गया बन,
रुका मुखर कण कण का स्पन्दन,
इस ज्वाला में प्राण रूप फिर ढ़लने दो!
झंझा है दिग्भ्रान्त रात की मूर्च्छा गहरी,
आज पुजारी बने , ज्योति का यह लघु प्रहरी,
जब तक लौटे दिन की हलचल,
तब तक यह जागेगा प्रतिपल,
रेखाओं में भर आभा जल
दूत साँझ का इसे प्रभाती तक चलने दो!
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चाह
चाहता है यह पागल प्यार
अनोखा एक नया संसार !
कलियों के उच्छ्वास शून्य में ताने एक वितान,
तुहिनकणों पर मृदु कम्पन से सेज बिछा दें गान,
जहाँ सपने हों पहरेदार,
अनोखा एक नया संसार!
मिल जावें उस पार क्षितिज के सीमा सीमाहीन,
गर्वीले नक्षत्र धरा पर लोटें होकर दीन,
उदधि हो नभ का शयनगार,
अनोखा एक नया संसार !
जीवन की अनुभूति तुला पर अरमानों से तोल,
यह अबोध मन मूक व्यथा से ले पागलपन मोल,
करें दृग आँसू का व्यापार,
अनोखा एक नया संसार !
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1929 जुलाई
क्या पूजा क्या अर्चन रे?
उस असीम का सुन्दर मन्दिर मेरा लघुतम जीवन रे!
मेरी श्वासें करती रहतीं नित प्रिय का अभिनन्दन रे!
पदरज को धोने उमड़े आते लोचन में जलकण रे!
अक्षत पुलकित रोम , मधुर मेरी पीड़ा का चन्दन रे!
स्नेह भरा जलता है झिलमिल मेरा यह दीपक मन रे!
मेरे दृग के तारक में नव उत्पल का उन्मीलन रे!
धूप बने उड़ते जाते हैं प्रतिपल मेरे स्पन्दन रे!
प्रिय प्रिय जपते अधर, ताल देता पलकों का नर्तन रे!
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धीरे- धीरे उतर क्षितिज से
आ वसन्त रजनी!
तारकमय नव वेणीबन्धन,
शीश फूल कर शशि का नूतन,
रश्मि वलय सित घन अवगुण्ठन,
मुक्ताहल अभिराम बिछा दे
चितवन से अपनी!
पुलकती आ वसन्त रजनी!
मर्मर की , सुमधुर नूपुर ध्वनि,
अलि गुंजित पद्मों की किंकिणि
भर पद गति में अलस तरंगिणि,
तरल रजत की धार बहा दे
मृदु स्मित से रजनी!
विहँसती आ वसन्त रजनी !
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जो तुम आ जाते एक बार
कितनी करुणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग,
गाता प्राणो का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग,
आँसू लेते वे पद निखार!
हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता हौंठों से निषाद,
छा जाता जीवन में वसन्त,
लुट जाता चिरसंचित विराग,
आँखे देती सर्वस्व वार!
1929
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प्रिय इन नयनों का अश्रु नीर!
दुख से आविल, सुख से पंकिल,
बुदबुद से स्वप्नों से फेनिल,
बहता है युग युग से अधीर!
जीवन पथ का दुर्गमतम तल
अपनी गति से कर सजल सरल
शीतल करता युग तृषित तीर!
इसमें उपजा यह नीरज सित,
कोमल कोमल लज्जित मीलित,
सौरभ सी लेकर मधुर पीर!
इसमें न पंक का चिह्न शेष,
इसमें न ठहरता सलिल लेश,
इसको न जगाती मधुप- भीर!
तेरे करुणा कण से विलसित,
हो तेरी चितवन से विकसित,
छू तेरी श्वासों का समीर!
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अलि
कहाँ सन्देश भेजूँ?
मैं किसे संदेश भेजूँ?
एक सुधि अनजान उनकी
दूसरा पहचान मन की
पुलक का उपहार दूँ या अश्रु भार अशेष भेजूँ।
चरण चिर पथ के विधाता
उर अथक गति नाम पाता
अमर अपनी खोज का अब पूछने क्या शेष भेजूँ?
नयन पथ से स्वप्न में मिल,
प्यास में घुल साध में खिल,
प्रिय मुझी में खुल गया अब दूत को किस देश भेजूँ?
जो गया छवि रूप का घन,
उड़ गया घनसार कण बन,
उस मिलन के देश में अब प्राण को किस वेष भेजूँ?
उड़ रहे यह पृष्ठ पल के
अंक मिटते श्वास चल के,
किस तरह लिख सहज करुणा की कथा साविशेष भेजूँ!
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आँसुओं के देश में!
जो कहा रुक रुक पवन ने
जो सुना झुक झुक गगन ने
साँस जो लिखती अधूरा,
प्रात रंग पाता न पूरा,
आँक डाला वह दृगों ने सजल निमेष में!
अतल सागर में जली जो,
मुक्त झंझा पर चली जो,
जो गरजती मेघ स्वर में,
जो कसकती तड़ित उर में,
प्यास वह पानी हुई इस पुलक के उन्मेष में!

दिश नहीं प्राचीर जिसकों,
पथ नहीं जंजीर जिसको,
द्वार हर क्षण को बनाता,
सिहर आता बिखर
जाता,
स्वप्न वह हठकर बसा इस साँस के परदेश में!
मरण का उत्सव अजर है
गीत जीवन का अमर है,
मुखर कण का संग मेला,
पर चला पंथी अकेला,
मिल गया गन्तव्य, पग को कंटको के वेष में!
यह बताया झर सुमन ने
वह सुनाया मूक तृण ने,
वह कहा बेसुध पिकी ने,
चिर पिपासित चातकी ने,
सत्य जो दिव कह न पाया था अमिट संदेश में!
खोज ही चिर प्राप्ति का वर,
साधना ही सिद्धी सुन्दर
रुदन में सुख की कथा है,
विरह मिलने की प्रथा है,
शलभ जल कर दीप बन जाता निशा के शेष में!
आँसुओं के देश में!
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