 |
|
|
हालांकि
कविता को शब्दों से अलग कर देखना लगभग असंभव सा ही है। सवाल यह
नहीं कि कविता में प्रतिरोध में लिए कितना स्थान है, सवाल यह है कि
शब्दों के अभाव को कविता कैसे माना जा सकता है? यह सवाल मेरे सामने
भी था , पर मैं इसे कविता मानने के अलावा और कुछ मान ही नहीं पा
रही थी। चित्र इसलिए नहीं कि ये पूरी तरह चित्रित नहीं थे,
इनमें काफी कुछ सामने चलता-
फिरता था, जैसे कि जंजीर से जकड़ी पुस्तक वस्तुतः पुस्तक थी, स्याह
साया जीती जागती लड़की थी, नेरुदा की कविता की भाषा बदल गई थी
किन्तु अर्थ नहीं। यानी जो कुछ था, वह सामने था। ऐसे में उसे मैं
चित्र कैसे मान लूँ, क्यों कि कुछ भी चित्रित होते ही वर्तमान से
भूत की ओर खिसक जाता है। यही नहीं यहाँ चित्रों के बीच जीवन भी धड़क
रहा था। मेरे लिए अब यही आसान था कि मैं उन सब स्थितियों को सीधे
सीधे कविता मान लूँ. जीती जागती कविता, शब्द रहित कविता, अभिनीत
कविता।
रति सक्सेना
और »
|
|
|
|
अपने हाथों से उठाकर तुम्हारा चिबुक
होंठों से होंठों को भींचकर
मैं तुम्हें वैसे ही चूम लूँगी
जैसे कि मुर्गा बीन लेता है
मुँह अँधेरे
धान की भूसी से चावल का दाना।
तसलीमा *****
प्रेम झरना है
झर झर कर भी खत्म नहीं होता
दीवारों के हिलने पर
छतों के दरकने पर
प्रेम दरीचों से झाँकने लगता है।
सरोज परमार
आज चारपाई के चौसठ इंच
हमारे जीवन की गति
बाँध गए हैं बंदीगृह से
और हर घड़ी हम तौलते समय
उठें, तोड़ें थकान तन मन की।
ममता कालिया
और »
|
|
|
|
जिन्दगी से जुड़ाव जिन्दगी के प्रति मोह या रागात्मकता है, जिसे
भारतीय दर्शन नकारता रहा है। माया महा ठगिनी हम जानी की बात करते
हुए ना जाने कितना सफर पार कर लिया गया। क्या यह जुड़ाव वही
मोहात्मकता है जो परिवेश को वैसे ही सलेटी, नीला पीला रंग दे देती
है जो उसकी जिन्दगी से काफी परे होता है। या फिर यह वह खुरदरापन
है, जिसे हम और अधिक खुरदुरा बना कर पेश कर सकते हैं। शब्दों में
इतनी शक्ति होती है कि सामान्य भावों को अधिक खुरदुरा या अधिक
चमकदार रूप दिया जा सके। ऐसे में जिन्दगी पार्श्व मे जाने की
संभावना को पूरी तरह से नकारा नहीं जा सकता है।
रति सक्सेनाpरति सक्सेना*जिस प्रकार एक कारीगर के लिए एक छोटे तार,
स्क्रू, पेंचकश, सूक्ष्म औजार या कील की उपादेयता होती है ठीक उसी
तरह कविता की कार्यशाला में एक छोटी से छोटी स्मृति भी कवि के लिए
जरूरी और मूल्यवान होती है। स्मृति में जाकर वर्तमान कुछ और निखर
उठता है--फिर चाहे उसका सौन्दर्य हो या उसकी विभीषिका । सब कुछ एक
नयी अर्थ दीप्ति में चमकने लगता है। कला में दूरी एक विशेष अर्थ
रखती है। कुछ दूर से एक वृक्ष को आपाद मस्तक देखा जा सकता है-एकान्त श्रीवास्तव
....और »
|
|
|
|
*
मिल जाता काले अंजन में
सन्ध्या की आँखों का राग,
जब तारे फैला फैला कर
सूने में गिनता आकाश,
उसकी खोई सी चाहों में
घुट कर मूक हुई आहों में!
झूम झूम कर मतवाली सी
पिये वेदनाओं का प्याला,
प्राणों में रुँधी निश्वासें
आती ले मेघों की माला,
*
चाहता है यह पागल प्यार
अनोखा एक नया संसार !
कलियों के उच्छ्वास शून्य में ताने एक वितान,
तुहिनकणों पर मृदु कम्पन से सेज बिछा दें गान,
जहाँ सपने हों पहरेदार,
अनोखा एक नया संसार!
**
मैं किसे संदेश भेजूँ?
एक सुधि अनजान उनकी
दूसरा पहचान मन की
पुलक का उपहार दूँ या अश्रु भार अशेष भेजूँ।
महादेवी वर्मा
और »
|
|
|
|
**
सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुले हैं इसकी ये गुलिस्तां हमारा
गुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमे भी, दिल हो जहाँ हमारा
परबत वो सबसे ऊँचा, हम साया आस्मां का
वो सन्तरी हमारा, वो पासबां हमारा
गोदी में खेलती हैं इसकी हजारों नदियाँ
गुलशन है जिनके दम से रश्के जनां हमारा
ऐ आबे रौदे गंगा! वो दिन है याद तुझको
उतरा तिरे किनारे जब कारवाँ हमारा
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी है हम, वतन है हिन्दोस्तां हमारा
***
एक भी पत्ती अगर कम हो तो वो गुल ही नहीं
जो खिंजां नादीदा हो बुलबुल, वो बुलबुल ही नहीं
आरजू के खून से रंगी है दिल की दास्तां
नग्मा ए इन्सानियत कामिल नहीं गैर अज फुगां
गम जवानी को जगा देता है लुफ्ते ख्वाब से
साज ये बेदार होता है इसी मिजराब7 से
शाम जिसकी आशना ए नाला ए या रब8 नहीं
जल्वा पैरा जिसकी शब में अश्क
के कौकब नही
मुहम्मद इकबालं
और »
|
|