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रघुवीर सहाय की अप्रकाशित
कविताएँ

प्रेम नई मनः स्थिति
दुखी दुखी हम दोनों
आओ बैठें
अलग अलग देखें , आँखों में नहीं
हाथ में हाथ न लें
हम लिए हाथ में हाथ न बैठे रह जाएँ
बहुत दिनों बाद आज इतवार मिला है
ठहरी हुई दुपहरी ने यह इत्मीनान दिलाया है।
हम दुख में भी कुछ देर साथ रह सकते हैं।
झुँझलाए बिना , बिना ऊबे
अपने अपने में , एक दूसरे में, या
दुख में नहीं, सोच में नहीं
सोचने में डूबे।
क्या करें?
क्या हमें करना है?
क्या यही हमे करना होगा
क्या हम दोनो आपस ही में
निबटा लेंगे
झगड़ा जो हममे और
हमारे सुख में है।
24.3.1952
लम्बी सड़कें
लो मैं यह भूल गया
क्यों मैं उन दिनों रहा करता था अनमना।
इतना बस याद है कि रूखे रूखे दिन थे
कुछ धूप खुली सी थी
बगीचों में पेड़ तले रहता था चाँदना।
लम्बी लम्बी कई एक सड़के भी याद हैं
वे भारी भारी जूते
और आप ही आप दोनों ओर
मेरे लिए हटती भीड़
आसमान, साफ साफ, नीला नीला औ॔ घना घना
याद है कि दर्द घूम घूम करके आता था
सभी अंग दुखते थे अब यह तो याद नहीं कौन कौन
रस्ते पर उड़ती थी धूल गर्द
धुले धुले कपड़ों में जाता था मर्द एक
अन्दर से सादा, बाहर से बना ठना।
8.4.1952
(रघुवीर
सहाय की अन्य अप्रकाशित कविताएँ) .
तसलीमा की कविताएँ
कम्पन *
तीस पार कर चुके सूखे में यदि
आज तुम वर्षा होकर आओगे
तो निस्संकोच
एक गर्म गुनगुनी शैया मुझसे पाओगे।
कम्पन **

तुम्हें अपने आँचल में
अच्छी तरह लिया है बाँध
फिर भी बिना तुम्हारे
रोती रही हूँ दिन रात।
कम्पन **
अपने हाथों से उठाकर तुम्हारा चिबुक
होंठों से होंठों को भींचकर
मैं तुम्हें वैसे ही चूम लूँगी
जैसे कि मुर्गा बीन लेता है
मुँह अँधेरे
धान की भूसी से चावल का दाना।
( तसलीमा की अन्य कविताएँ
)
ममता कालिया की खाँटी घरेलू औरत से कुछ कविताएँ
**
मैंने तुम्हें चाहा
पर पाया नहीं
तुमने मुझे पाया
पर चाहा नहीं
इन्हीं प्यासों के बिम्ब
जब कभी अधर के कगार
या आँखों के कोर में
उमग उमग आने को चंचल हो उठते हैं
हम एक दूसरे को
बाँहों में बाँध
विवश हँस लेते हैं
" हम कितने सुखी हैं।"
***
एक साथ हम
अंतहीन आकाश लिए बाहों में
सोचा करते
कितना थोड़ा है यह भी बंधने को
आज चारपाई के चौसठ इंच
हमारे जीवन की गति
बाँध गए हैं बंदीगृह से
और हर घड़ी हम तौलते समय
उठें, तोड़ें थकान तन मन की।
( ममता कालिया की
अन्य कविताएँ )
अमिता शर्मा की कविता

न सच न झूठ
समूची बात को निचोड़ कर
निकली दो बून्द
ये न सच है न झूठ।
सोनमछली से
स्वप्न की धारा में
तिरते जो तरह तरह के रंग
असाध्य की आँच में
सरल हो जाते हैं
फर्क नहीं रहता
रंग और खाली जगह में।
शायद यही सही प्यार था
विसंगति को उत्कृष्ट सच में
बदलने की कोशिश में विरक्त
वीरान किसी भी
स्थाई भाव के विश्वास से।
जो खालीपन बटोरा था साथ
वहखालीपन होगी भेंट
एक दूसरे के लिए।
समझदार मन
सह लेंगे सब कुछ।
(अमिता शर्मा
की अन्य कविताएँ)
पाराशर गौड़ की
कविता
कलम
कलम
पहले तो आग उगलती नहीं
लेकिन जब उगलती है तो
राजनैतिक गलियारों में
बंबडर आ जाता है
सत्तायें पलट जाया करती हैं।
वो ...
आदमी समय इतिहास और राष्ट्र को
हाशियों में खड़ा करने में भी नहीं चूकती
वो माफ नहीं करती
तानाशाहों को चाटुकारों को।
उसका...
एक वार ही काफी होता है
किसको धराशायी करने के लिए
एक छोटी सी कलम
किसी के सर क़लम करने के लिए
बहुत बड़ी होती है।
( पाराशर गौड़ की अन्य कविताएँ
)
सरोज परमार
की
कविताएँ
......प्रेम झरना है
झर झर कर भी खत्म नहीं होता
दीवारों के हिलने पर
छतों के दरकने पर
प्रेम दरीचों से झाँकने लगता है।
कैसे बुहारूँ
बुहार दिया घर आँगन
पिछवाड़ा गलियारा
कैसे बुहारूँ?
पीठका कूबड़
गाल का मस्सा
हँसी का ठठ्ठा
अफवाहें
जो चिपक गई कई कानों से
कई होंठों तक।

आदमी
सागर को रौंदता
आकाश में कौंधता
आदमी
नक्षत्रों से जुड़ रहा है
पर
धरती से उखड़ रहा है।
( सरोज परमार की अन्य कविताएँ )
मधुकर भारती
की कविता
उजाड़ रास्ते का प्याऊ
शहर की ओर जाने वाले
पहाड़ी रास्ते पर
स्थित है एक प्याऊ
इसके मुख से निकलती है अमृत धारा।
पहाड़ का मीठा जल भाग्य से मिलता है
भाग्य से ऐसे मुहाने पर है प्याऊ
जहाँ लोग चाहें तो पसीना धो लें
फिर कंठ मे ताजगी भर
बीड़ी सुलगा लें
यहाँ विश्राम पाती है
एक पगडंडी
दूसरी शुरु होती है
यहाँ से नया पसीना
माथे पर चमकने की करता है तैयारी।
प्याऊ वाले रास्ते के समीप
बहते नाले के ऊपर
बन गया नया पुल
जहाँ घास , पत्थर पेड़ों के आलिंगन से
छूट गई है जमीन
छूटे हुए हिस्से को
नई सहस्राब्दि की सड़क कहने लगे हैं।
प्याऊ अपनी जगह है
मीठे जल की धार लिए
पर रास्ता छिटक गया है
उत्तर आधुनिक मोटर पकड़ने की हड़बड़ी में
लोग कंठ भिगोना भुला देते हैं
स्थगित कर देते हैं
बीड़ी पीना
पसीना मोटर में बैठकर सुखा देते है
फलांग जाते हैं नए रास्ते का पुल
उजाड़ हो गया है
प्याऊ वाला रास्ता।
पुल के नीचे बहते नाले को
समृद्ध करता हुआ मीठा जल
बहे जा रहा है

दरकिनार किया हुआ प्याऊ
बदस्तूर वहीं है
कभी कोई कंठ आ सकता है
हाँफता हुआ
जीवन की भीख माँगता हुआ।
( मधुकर भारती
की अन्य कविताएँ
)
श्याम बिहारी की कविता
पागल
पागल कहता है
अब यह तिरंगा मेरा नहीं
वह चक्र!!
बिल्कुल नहीं
हरियाली की आड़ में
किश्त दर किश्त
उगाता रहा चक्रों की फसल
सूद दर सूद
छिपी है कितनी घृणा
कितनी बारूद
हरियाली की आड़ में
फिर किसलिए करूँ
इस ध्वज को प्रणाम?
फि सोचता है वह
पर नहीं,
प्रणाम तो करना होगा !
प्रणाम तो करना होगा !
सुना है
कपड़े के इस टुकड़े के लिए
कटे थे लाखों

कहीं पागल तो नहीं थे वे?
(
श्याम बिहारी की अन्य कविताएँ
)
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