कवि अय्यप्पा पणिक्कर‍-- एक कविता साक्षी

रतन लाल शान्त

ध्यान से सुनो
तुम ज्यादा रोंमान्टिक बनोगे
तो सेंसर की कैंची लगेगी
बस अभी मुझे यह कहना है
जो कविताएँ जमीन से जुड़ी नहीं होंगी
वे ही लोकप्रिय रहेंगी
जो कुछ याद नहीं रख पाता
वह इतिहास होता है
जो कुछ भूलता नहीं
वह कवि होता है
और जो इन दोनो को
एक मानने की गल्ती करता है
और उलझन में पड़ता है
वह आलोचक का बाना पहन कर चलता है।


रोमांटिसिज्म के प्रति सावधानी , जो इस कविता के कवि के वक्तव्य की तरह पाई और बताई गई है, कवि अय्यप्पा पणिक्कर की कविता चेतना की द्योतक है क्योंकि वह शुरु से ही रोमान्टिसिज्म को भाववाद या भावुकता से बचा बचाकर अपनाता रहा है। सत्य और सौन्दर्य के प्रति सचेत यह मलयाली कवि, दुर्भाग्य से हिन्दी पाठक और भावक को शुरु से उपलब्ध नहीं रहा
( अय्यप्पा जी की कविता का अनुवाद शुरु से ही हुआ था, 1994 से तो मैंने ही अनुवाद   किया , साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ जैसे संगठनो ने प्रकाशित भी किया, तनाव का एक अंक कवि की कविता पर निकाला गया, और अब भी अनेक कविताओं का अनुवाद मेरे पास सुरक्षित है ये अनुवाद कवि के साथ विमर्श के साथ किया गया था, अतः काफी कुछ कविता के करीब है  हमारा दुर्भाग्य यह है कि हिन्दी आलोचना साहित्य ने इन पर कृपा नही की, इनकी चर्चाएँ नहीं हुई, इसी कारण अनेक पाठक इनसे लाभ नहीं उठा पाए। शान्त जी जैसे चिन्तक अध्येता को यदि यह अनुवाद नहीं मिलता है तो इसमे साहित्य का ही दोष है। दो किताबों का प्रकाशन तो स्वयं पणिक्कर जी ने अपनी मृत्यु से पहले अपने पैसों से किया था, जिससे अनुवादक की मेहनत बेकार ना जाए-- संपादक) और अब जो कुछ सम्मानों के बहाने खुल कर सामने आ रहा है तो हमारे सामने रचना और अभिव्यक्ति की संभावनाओं से जूझते एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कवि व्यल्तित्व का चित्र खुलता है।
हिन्दी में जब प्रगतिवाद और प्रयोगवाद की पुनः समीक्षा की जा रही थी तो अय्यप्पा की कविता एक कदम आगे निकल कर आलोचना के बदले कविता मात्र की अभिव्यंजना में तीव्रता तथा निर्णयात्मकता के सुर पैदा कर रही थी। उसकी कविता में जीवन तथा जीवन- मूल्यों के प्रति गहरे सरोकार अभिव्यक्त हो रहे थे जिससे यह न तो स्निग्धता हीन यथार्थवादी उपदेशवाद बन के रह जाती और न ही भावना के मृसण संसार में विचलन का शिकार हो रही थी। वह वास्तब में आँठवे दशक में अपने विकास ‌और भावबोष का विस्तार कर रही थी। "मृत्यु पूजा" कविता की ये पंक्तियाँ ऊपर उद्धृत भावबोध का अगला पड़ाव कहला सकती हैं:--

क्या मैंने कल का गीत नहीं गाया है?
तो मुझे मेरा भाग क्यों नहीं देते?
‍‍‍....यह "मुक्ति" का चारण बोलता है
यह वह कवि है जो जनहित को समर्पित है
और जो अब युद्ध और अकाल के खेल खेलने कूद पड़ा है
" रोकड़ मिल गया है" सोचकर यह दर्द की कविता लिख देता है
वह नेकी का उपदेशक है
और बड़ीं समझ-बूझ के साथ
अपने बेदाग धुले वस्त्र के किनारों पर
रेशमी मुस्कान की किनारी सिल देता है (1967)

यह न निरा व्यंग्य है न कुंठित प्रतिक्रया की अभिव्यक्ति। इसमें हल्का हास्य भी मौजूद है। बल्कि यह कवि की अपने विषय के साथ "प्रेम घृणा" के रिश्तों का विस्फोट प्रस्तुत करता है।
पणिक्कर के व्यंग्य में प्रतिबद्धता का सरोकार मौजूद रहता है। वह यों ही चिढ़ाने के लिए हास्य का रेखांकन नहीं करता।

1960 में आए पणिक्कर के कुरुक्षेत्र ने इतिहास ‌और समकालीनता को दो समान्तर सत्यों की तरह आकालित किया जिसे आलोचकों ने आत्मा की खोज में जुटे आधुनिक मनुष्य का महाकाव्य कहा। इसी तरह "गोत्रायन" में हमें महाकाव्यों सी वार्ता की झलक मिलती हैः--

जब हम तीर से छिद जाते हैं
और छटपटाते हैं
करुणा हमारे हृदयों को कोमल करेगी
और हम उस शिकारी को
आशीर्वाद देना नहीं भूलेंगे
जिसने हम पर बाण चलाया हो
घाव जितना गहराता जाएगा
दया का सोता बनता जाएगा।

पणिक्कर जी के काव्य के काव्य की चरम स्थिति उनकी अनेक कृतियों में मिलती है जिनमें कवि जीवन्त और मृत स्थितियो की पीड़ा से जनित अव्यक्ति बौद्धिक संगतियों को समझने में प्रवृत्ति दिखाई देता है। अतएव इसमें सदा की तरह अतीत गरिमामयता के बावजूद संशय के कठघरे में खड़ा किया गया है। नरसिंह , पायल के गीत, कृष्ण और बलभद्र का भूमिका परिवर्तन " जैसी कविताएँ अतीत को नई व्याख्याओं के प्रति खुला छोड़ देती हैं। कुछ उदाहरण देखे --

भगवान में नौ के नौ रस होते हैं
दिव्यता हीन मनुष्य में बस एक ही
कौन जाने हिरण्य भी शायद भक्त था?
जो यह नहीं जानता
क्या वह स्वयं भगवान होगा कि भक्त?

या " कोलकत्ता- तिरुवनन्तपुम् का यह अंशः--

यदि सन्यासी की बेटी को सौन्दर्य खो देने तथा कोलकाता बन जाने
का शाप  मिला था
तो मुझे शाप की वह कहानी बताओ
और यह भी कि यह कैसे हटाया जा सकता है
ए गांगुली महोदय, या
कोई बैनर्जी, चटर्जी या अलर्जी
यदि कोई एक बार गलत शब्द बोलता है
तो बाद में कोई शब्द किसी काम का नहीं रहेगा.....

पणिकर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते है कि वे छोटी- छोटी चीजों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं, पर उन चीजों से इस जीवन तथा जगत में बड़ा फर्क पड़ता है। कवि के लिए जीवन बड़ा उमंगपूर्ण और उल्लासपूर्ण नही है पर वे इसकी छोटी- छोटी कामनाओं की कद्र करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे कभी भी निराधार दर्प का प्रदर्शन नहीं करते और जीवन की गहराइयों में पैठकर भी मासूम दर्शक की तरह उन्हें समझते और समझाते हैं।
भारतीय साहित्य में अय्यप्पा पणिक्कर एक स्तंभ और मील के पत्थर की तरह कविता कर्म की दशा और दिशा की सर्वोत्तम साक्षी देते हैं।


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परंपरा और आधुनिकता की मूर्ति.. डा के अय्पपा पणिक्कर

विनोद दास


मलयालम के वरिष्ठ और प्रख्यात आलोचक डा अय्यप्पा पणिक्कर को दिल्ली की कई संगोष्ठियों में सुनने- जानने का सुअवसर मुझे मिला है, चश्मे के पीछे उनकी चमकती विचारशील आँखों की जिज्ञासु प्रवृत्ति सहज ही सबको आकर्षित करती थी। भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य में वह ऐसे विरल रचनाकार थे जिनके वहाँ  परम्परा और आधुनिक दृष्टि के बीच एक अटूट संबन्ध दिखता था। अय्यप्पा पणिक्कर के रहन- सहन और वेषभूषा से कोई दिग्भ्रमित हो सकता था कि कोई जड़ किस्म के संकीर्ण परम्परावादी होंगे, लेकिन परम्परा उनके यहाँ कोई अलंकार नहीं था। उनसे संवाद करके यह भी लगता था कि परम्परा गुजरे हुए समय या स्मृति का अंश भर नहीं है, बल्कि वह समकालीन द्वन्दों और अन्तर्द्वन्दों में अन्तश्चेतना की आवाज बनकर भी हस्तक्षेप कर सकती है। यह अकारण नहीं है कि अय्यप्प पणिक्कर मलयालम साहित्य में आधुनिक बोध के एक महत्वपूर्ण कवि आलोचक तथा विमर्शकर्ता के रूप में जाने जाते है। पणिक्कर की कविता मुखर नहीं है, वह शब्दों और वाक्यों के संयोजक से जीवन के जटिल अर्थों को उद्घाटित करने में विश्वास करते थे, मलयाली साहित्य और खासकर मलयाली कविता से दूसरी भाषाओं के बीच संवाद विचार- विनिमय में भी उनके महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। सांस्कृतिक कट्टरतावाद के दौर में उन्होंने अपने अनेक निबन्धों में संस्कृति ‌और परम्परा को समकालीन परपेक्ष्य में पुनराविष्कार करके भारतीय अस्मिता को बहुलतावादी नई पहचान दी। कवि आलोचक, पेशे से अध्यापक , शेक्सपीयर के गंभीर अध्येता ‌और अनुवादक के अय्यप्पा पणिक्कर का हमारे बीच से चले जाना हमारे सांस्कृतिक क्षेत्र के एक विविधवर्णी ‌और फक्कड़ व्यक्तित्व की क्षति है। मैं उनकी निर्भीक ‌और दुर्दम रचनाशीलता के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।

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कवि के स्मरण में लिखे गए मलयालम लेखों में से कुछ का हिन्दी में सारांश‍‍ ------प्रस्तुति ------------श्री बालकृष्ण पिल्लै


विश्व संवादी

पूर्वी दर्शन की रोशनी से परिचित होने के बाद अरविन्द पश्चिमी संस्कृति के निकट आए । होमर, वेरजिल, दान्ते, शेक्सपीयर, मिल्टन और वेर्ड्सवर्थ इन सभी ने अरविन्द की आन्तरिक प्रवृत्ति को नवीकृत किया था। कवि के रूप में अय्यप्पा पणिक्कर ने भी यही किया। उनके साहित्यिक परिचयों की कोई सीमा नहीं। पश्चिमी और पूर्वी नहीं, द्रविड़ सौन्दर्य- धारा का भी आपने आश्लेषण किया। वस्तुतः यह आपकी साधना थी, कवि- धर्मी साधना। .....
संपादक के रूप में भी पणिक्कर की देन महत्वपूर्ण है। वे ताउम्र "केरल कविता" के संपादक रहे। उन्होने अनेक कालजयी रचनाओं का संपादन किया और प्रकाशन में योगदान दिया। डी सी बुक्स ने विश्व साहित्य में प्रतिष्ठा प्राप्त एक सौ बीस ग्रन्थों का संक्षिप्त पुनराख्यान "विश्व साहित्य माला" के नाम से उन्हीं के मुख्य संपादन में प्रकाशित किया। यहीं नहीं शैक्सपीयर की सम्पूर्ण के मलयालम साहित्य में अनुवाद में भी उन्हीं का योगदान था। वे मिशिगन विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित "जरनल आफ साउथ एशियन लिट्रेचर" के एसोसिएट एडिटर भी रहे। मैकमिलन कंपनी की " केरल राइटर्स इन इंगलिश " ग्रन्थमाला के महासंपादक भी रहे।
अंग्रेजी में भी आपने काफी काम किया। इण्डियन्स रेनायन्स, के एम पणिक्कर , मलयालम एन्थालोजी, मलयालम शोर्ट स्टोरीज, ए परस्पेक्टिव आफ मलयालम लिट्रेचर, वी के कृष्ण मेनोन, तकषि शिव शंकर पिल्लै आदि उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं। आपकी प्रसिद्ध कविता कुरुक्षेत्र का अंग्रेजी, हिन्दी, तमिल, फ्रेंच, स्पेनिश भाषाओं में हुआ है। उनकी कविता "बिन खिले कैसे रह सकता हुँ" विश्व से संवाद कर रही है।

द्वारा --------
संतोषकुमार


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सरस्वती सम्मान के विजेयता...

जीवन को हास्य- बोध से देखने वाले कवि हैं अय्यप्पा पणिक्कर। लेकिन यह हास्य- बोध मात्र सहज हास्य- व्यंग्य नहीं है , बल्कि ऐसा सिरफिरा हास्य- बोध है जो जीवन त्रासदियों में भी हँसने का कुछ मसाला खोजता है। इसके पीछे जीवन की फलशून्यता के सम्बन्ध में प्राप्त किया गया दार्शनिक ज्ञान है। परम्परा की लीक से हट कर अपने ही पथ पर भटक रहे इस कवि ने कुरुक्षेत्र, पकळुकळ- रात्रिकळ (दिन और रातें) जैसी कविता के माध्यम से काव्य दर्शन और चिन्तन को अभिव्यक्त किया। डा पणिक्कर जीवन में वह अर्थ नहीं पा सके जिसके होने की कल्पना पहले कइयों ने की थी। इस असमर्थता को पणिक्कर जी ने बड़ी सच्चाई से प्रकट किया। नव मानव की इस संकल्पना के वर्णन में कवि के मन की निराशा के साथ- साथ हमारे मन का

कष्ट भी उद्भासित होता है।
हम करें स्तुति उस नर की
जिसने पड़ोस की युवती का
पेट भर दिया
जो आधा भी नहीं भर पाता था

इस तरह के बुलन्द प्रयोगों ने मलयालम कविता को मरने से बचाया। छन्द के मार्ग से हट कर गद्य में, और गद्य- पद्य मिश्रित शैली में आपने लिखा है। वस्तुतः आपने गद्य के ताल- लय को अच्छी तरह से समझ लिया। अध्यापक, अनुवादक, वक्ता, गद्य लेखक की भूमिका में भी आपने साहित्य बोध को विकसित किया। आपकी एक और विशेषता है, वह है वैश्विक साहित्य अवधारणा। नई प्रवृत्तियों का अध्ययन करके उनके समुचित अंशों को मलयालम कविता में आत्मसात किया।

द्वारा -----
एम के हरि कुमार

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आदर्श अध्यापक

सातवें दशक के प्रारंभ में केरल में आधुनिक कविताओं के नवयुग श्री गणेश मुख्यतः डा अय्यप्पा पणिक्कर ने किया था। आलोचना और नाटक के क्षेत्र में भीं आपने नए पथ निर्मित किए। जब वे केरल विश्वविद्यालय में अंग्रेजी संस्थान के अध्यक्ष थे तब मुझे उनके अध्यापन का स्वाद चखने का सौभाग्य मिला था। इसके उपरान्त जब कभी अध्यापक के रोल माडल पर चर्चा होती तो उनका चित्र ही मन में उभरता। वे जिस किसी क्षेत्र में प्रवेश करते, उस में परफेक्ट बनने की कोशिश करते। यही उनकी उन्नत्ति का राज था। चाहे वे अंग्रेजी भाषा के इतिहास का विवेचन कर रहे हों, शैक्सपीयर के नाटकों के अविस्मरणीय दृष्यों का बड़े मनोयोग से वाचन कर रहे हों, या फिर टी एस एलियट के बेस्ट लैण्ड का एक बहते झरने की तरह अवबोधन करा रहे हों, वे इस बात का ध्यान रखते थे कि विषय की सीमा रेखा को लाँघ ना जाएँ। अध्यापन विषय से संबन्धित कोई भी सवाल क्यों ना उठे, उनका पंडितोचित जवाब हाजिर। किसी भी दुर्ग्राह्य समस्या की पूर्ति सरल व सरस शैली में कर लेने की असामान्य दक्षता उनमें थी। अपने अतिव्यस्त कार्यक्रम में भी अपने कर्तव्य का पालन करने वाले अध्यापक उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अधिक नहीं हैं। वे क्लास में भी सबसे पहले पहुँचने वाले अध्यापक थे।


द्वारा-----
हसन चेरुप्पा


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विस्तृत परिचय

अंग्रेजी साहित्य में नोबल पुरस्कार प्राप्त विलियम गोल्डिंग ने तिरुवनन्तपुरम् में छात्रों को संबोधित किया, इसका कारण केरल विश्वविद्यालय का महत्व नहीं था। बात बस ऐसी थी कि वे अय्यप्पा पणिक्कर जैसी महान प्रतिभा का निमंत्रण नहीं ठुकरा सकते थे। कक्षा में हैमलेट पढ़ाना है तो संदेह निवारण के लिए वे सीधे सम्पर्क करते हैं आंगस विल्सन जैसे यूरोपीय आलोचकों से। पणिक्कर जी का अन्य देशों से शतकों पुराना सम्बन्ध है। आपने 1971 में ही अमेरिका के इंडियाना डिपार्टमेन्ट से पी. एच. डी की उपाधि प्राप्त की थी। फिर येल विश्वविद्यालय में पोस्ट डाक्टरेट और शोध किया । अमेरिका के करीब पच्चीस विश्वविद्यालयों से सम्पर्क रहा। यही नहीं अलेन गिन्स, चेस्लो मिलोष जैसे कवियों और फेड्रिक जेम्स जैसे विचारकों से निकट सम्बन्ध रहा।

द्वारा ---पद्मनाभन नम्पूतिरि

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नई कविता के सूत्रधार

मेरा मानना है कि एषुत्तच्छन और कुमारनाशान के बाद मलयालम में नवीन कविता का जिसने अनुमोदन किया है वह अय्यप्पा पणिक्कर हैं। वे लगभग पच्चीस वर्ष तक रचनाएँ रचते रहे, उसके बाद ही अपना पहला कविता संकलन प्रकाशित किया। इसी सतर्कता और सम्पूर्णता को उन्होंने जिन्दगी भर बनाए रखा। वे उन कवियों में से नहीं थे जो किसी भी घटना से प्रभावित होकर तुरन्त कुछ रच डालें, चाहे युद्ध होया अकाल, वे कविता को पचा कर लिखने में विश्वास रखते थे। तभी उन्होंने कहा है---

भूमि का पुण्य बना अब
मिथ्या पुराण
" मैंने कल के गीत गाए
दे दो मुझे धन" 
यह है आजादी का गायक!
चाहे कहीं युद्ध हो
या फिर अकाल
हर किसी पर कविता रच
पैसा बनाता है वह
बहुजन हिताय! ( मृत्यु पूजा )

अय्यप्प पणिक्कर सहज व सरल भाव से आधुनिकता के सर्वोत्तम रूप आगे बढ़ी है। सामाजिकता से ऊपर उठ कर कविता को सर्वोत्तम प्रतिष्ठित करते आपने कविता को एक माध्यम बनाया है।

द्वारा --- डा जी पद्मराव

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आधुनिक मलयालम कविता के क्रमेता

आधुनिक मलयालम कविता के क्रमेता -पुरुष अय्यप्पा पणिक्कर से मेरी पहली भेंट तब हुई जब मैं महाराजा कालेज में एम ए का छात्र था। हालाँकि पत्रव्यवहार काफी पहले से था। मैं उनकी कवताओं कुरुक्षेत्र , हे गगारिन, प्रियतमे प्रभातमे, अग्निपूजा, पुरुरवस जैसी कविताओं का प्रशंसक बन चुका था। मैं उन्हे नई कविता के पथ प्रदर्शक के रूप में आदर दिया करता था। उस प्रथम भेंट के उपरान्त न जाने कितनी बार उनसे भेंट हुई, ना जाने कितना पत्र व्यवहार हुआ और ना जाने कार्यक्रमों में साथ- साथ काम किया। इस तरह हमारी मित्रता परवान चढ़ती गई। कुरुक्षेत्र, मृत्यु पूजा, पकळुगळ्- रात्रिकळ आदि कविताओं का अध्ययन मेरे काव्यास्वादन प्रशिक्षण का अंग बना। कविता और आलोचना को गंभीरता से लेने की प्रेरणा मुझे अय्यप्पा पणिक्कर से मिली। उन्होंने ही मुझे केन्द्र साहित्य के प्रतिनिधि मंडल में शामिल किया, भारत भवन से परिचय करवाया, अनेक भारतीय एवं विश्व कवियों की उपस्थिति में विचार प्रकट करने का अवसर दिया, तथा साहित्य अकादमी की द्वैमासिक " इण्डियन लिट्रेचर " के संपादकत्व को ग्रहण करने को प्रेरित किया। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे खामियाँ निकाले बिना ही कविता सम्बन्धी  समस्याओं की ओर संकेत कर देते थे।

द्वारा --- के सच्चिदानन्दन


 

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