मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

         

अय्यप्पा पणिक्कर विशेषांक

 

 

 

 

   (1930-2006)

 

पणिक्कर जी ने अपने व्यक्तित्व और विचारों को अश्वत्थ की तरह बहुविभाजित कर लिया था। उनका कवि व्यक्तित्व, चिन्तक व्यक्तित्व से बिल्कुल भिन्न था। कवि के रूप में वे जिस श्याम हास्य का निर्माण करते थे, चिन्तक के रूप में वे बेहद सक्रिय तत्ववेत्ता थे। अध्यापक के रूप में वे जितने निर्मम थे, मित्र के रूप में वे उतने ही कोमल थे। इन सब के ऊपर , उन्होंने जिस तरह से अपने परिवार ही नहीं पूरे खानदान को अपनी छत्र-छाया में ले रखा था उसकी मिसाल मिलनी ही मुश्किल है। ......मैं उन सब बातों की चर्चा ही नहीं कर रही जिनके द्वारा वे जाने जाते थे, यानि कि उनकी मलयालम साहित्य को देन, दक्षिण में कविता की नई धारा का प्रवाह या फिर कविता में नित्य नवीन प्रयोंग। क्यों कि इन सब के लिए कृत्या में भिन्न भिन्न लेख प्रस्तुत किए जा रहे हैं। मैं तो बस उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की जरा सी झलक दे रहीं हूँ, जो हर चट्टान हर आँधी के सामने घुटना टेके बिना खड़ा रहा। मेरा परिचय उनके जीवन के अन्तिम प्रहर से ही रहा, फिर भी मैं सौभाग्य मानती हूँ कि इस काल पुरुष से परिचय हुआ।

रति सक्सेना
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गोद के बच्चे को
राह में छोड़
गोपिका बेचती है कंचुकी
उससे लिपटा
दुखार्द्र विस्मृति विलास
वेद सभी समाएँगे
निर्वेद संधि में
विराट पुरुष का
संकल्प टूटेगा तब
शून्याकार कालिमा
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को निगल
करने लगेगी ताण्डव

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पहाड़ों और नदियों ने
मुझसे क्या कहा?
" स्वार्थ ही दुख है।"

महायुद्ध ने भी यही कहाः
तेज अंधड़ और चीखों वाली
काली रातों में
असहनीय दुखभार से
मैं फूट- फूट कर रोया बच्चे

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मन उचाट और अनमना
चिंतन ही एक तंत्र

फिर भी
संध्याएँ बहती हैं जहाँ, ऐसे राजमार्गों पर
राते टटोलती है जिन्हें, ऐसी गन्दी गलियों में
आदमी का चिन्तन
अनथक अश्रान्त खौजती फिरती।

यह उचाटपन ही मिट जाए तो
जिन्दगी भी मिट जाए।

यह भी एक तन्त्र मन्त्र हो सकता है

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अय्यप्पा पणिक्कर की जिन्दगी रोज नए चेलेंज ले कर आती , कवि रोज उपादान खोजते। उन्हे लग रहा था कि समय भाग रहा है, वे लगातार- लगातार काम करते, मिडिवल इन्डियन लिट्रेचर पूरा हुआ, शेक्सपीयर के सम्पूर्ण साहित्य का अनुवाद पूरा हुआ। अन्तर्सन्निवेष थ्योरी को अंजाम दिया, मलयालम साहित्य को रूप रेखा दी। अधिकतर लोक साहित्य पर काम किया। सन 2000 तक वे बेहद व्यस्त रहे। धीमें धीमे उनकी शक्ति चुकती जा रही थी। ऐसा लगने लगा था कि वे अपना सामान बटोर कर यात्रा की तैयारी कर रहे हों। कवि जो जीवन भर मृत्यु की बात करता रहा, अचानक मृत्यु को सामने महसूस कर रहा था। कभी किसी कठिन समय में उन्होंने मुझ से कहा था कि हम लोग रोज मरते हैं, मौत हमारे पास हर क्षण आती है, किन्तु फिर एकाएक उस सहन नहीं कर पाते। ...............
मृत्यु से दोस्ती रखने वाले कवि को काफी हद तक विश्वास था कि वे मृत्यु को पछाड़ देंगे। बीमारी का पता चलने पर भी वे बार -बार कहते.. सब ठीक होगा, ... लेकिन एक अजीब सी हड़बड़ाहट स्वभाव में आ गई, वे सामान बटोरने लगे थे। वे अपना काम निपटाने लगे। शरीर थकता जा रहा था, लेकिन अय्यप्पा का काम नहीं खत्म हो रहा था।

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पणिक्कर इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाते है कि वे छोटी- छोटी चीजों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं, पर उन चीजों से इस जीवन तथा जगत में बड़ा फर्क पड़ता है। कवि के लिए जीवन बड़ा उमंगपूर्ण और उल्लासपूर्ण नही है पर वे इसकी छोटी- छोटी कामनाओं की कद्र करते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वे कभी भी निराधार दर्प का प्रदर्शन नहीं करते और जीवन की गहराइयों में पैठकर भी मासूम दर्शक की तरह उन्हें समझते और समझाते हैं।
भारतीय साहित्य में अय्यप्पा पणिक्कर एक स्तंभ और मील के पत्थर की तरह कविता कर्म की दशा और दिशा की सर्वोत्तम साक्षी देते हैं।
रतन लाल शान्
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पणिक्कर की कविता मुखर नहीं है, वह शब्दों और वाक्यों के संयोजक से जीवन के जटिल अर्थों को उद्घाटित करने में विश्वास करते थे, मलयाली साहित्य और खासकर मलयाली कविता से दूसरी भाषाओं के बीच संवाद विचार विनिमय में भी उनके महत्वपूर्ण भूमिका और योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा। सांस्कृतिक कट्टरतावाद के दौर में उन्होंने अपने अनेक निबन्धों में संस्कृति ‌और परम्परा को समकालीन परपेक्ष्य में पुनराविष्कार करके भारतीय अस्मिता को बहुलतावादी नई पहचान दी।
विनोद दास

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क्या कहूँ अय्यप्पा!
पहुँचने नहीं देते हो किसी नतीजे पर
तुम्हारी स्मृति में बहाए आँसू
मुझे विकल किए हैं
दुनिया में अभी कितना कुछ बाकी है
जो तय नहीं है
जैसे अजनबी सम्बन्धों के नाम
जैसे हर रात दस बजे फोन पर पूछना
"कैसी हो.."
और रिसीवर रख देना मुखर मौन में
अग्निशेखर

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उनका सवाल सुनते ही मेरे मन में उनकी एक कविता का स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने ऐसे समाज सेवकों का उपहास किया था जो स्वैच्छिक संस्थाएँ बना कर उसके लिए जुटाए गए संसाधनों का उपयोग अपनी सुविधा के लिए करते हैं। संस्था के उपयोग के लिए खरीदी गई मोटर कार में इठलाते हैं। पणिक्कर जी का आवास सभा के इतने निकट भी नहीं था कि हम लोग पैदल जा सकें। इसलिए सभा की गाड़ी से गए थे। और गाड़ी थोड़ी दूरी पर छोड़ कर हम पैदल चले गए थे। हमने सच्चाई छिपाना उचित नहीं समझा और बता दिया कि गाड़ी बाहर खड़ी है, किन्तु उनके सवाल ने मुझे जितनी जल्दी हो सके वहाँ से खिसक आने को प्रेरित किया।

के जी बालकृष्ण पिल्लै

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VOL -  II/ PART -V


 (अक्टूबर-
2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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