मेरी बात 


एक बड़े साहित्यकार की बात करते हुए मैं अपनी बात से शुरुआत करूँ तो  मूर्खता लगेगी, किन्तु यही मूर्खता कृत्या के पाठकों को उस साहित्यकार के करीब ले जाएगी जिसके बारे में हम पूरे अंक में बात कर रहे हैं। इसलिए मैं अपने से ही बात शुरु करती हूँ। मेरा साहित्य में घुसना, किसी भी स्वप्न का हिस्सा नहीं था। न ही कोई प्रायोजित योजना।  साहित्य से लगाव था, स्वाभाविक तौर से, बचपन से बड़े होने तक जो कुछ मिला, उसे रेगिस्तानी प्यासे की तरह गटागट पी लिया, जो पान किया , वह साहित्य था, इसकी परिभाषा तो बड़े होकर ही समझ पाई। कौन सी प्यास थी यह? कैसी प्यास थी? इसे समझने की कोशिश ही नहीं की। ऐसे समाज में जन्म लिया, जहाँ सपने देखने तक की आजादी नहीं थी। साहित्य आसपास कहीं नहीं भटकता था। एक आग हमेशा धधकती रही मन मस्तिष्क में , युवाकाल में तो अनजाने ही किताबों और बहसों में बुझा लिया, कभी- कदार कुछ कागज काले भी कर दिए, किन्तु जब जिन्दगी के ऐसे मोड़ से गुजरना पड़ा जहाँ किताबें और बहसों से भी वंचित रह जाना पड़ा तो इस आग ने पूरे वजूद को जला कर राख कर दिया। समाज ने बड़ी कोशिश की कि घरेलू गाय की तरह आदर्शवादिता को सुई धागों से बेलबूटे काढ़ने, पकवानों की चाशनी बनाने और घर संवारने में लगा दे, किन्तु दीमाग ने सबके खिलाफ बगावत छेड़ दी। कागज अभी भी काले हो रहे थे, किन्तु बिना किसी योजना के। साहित्य के पीछे भागना मेरी वह मजबूरी थी, जो निरन्तर शब्दों से दोस्ती बनाने का आदेश दे रही थी, यह वह भटकन थी जो ऐसा कुछ  सीखने को बाध्य कर रही थी जिससे दीमाग में जलती प्रचंड धारा को आहुति मिल सके। इसी भटकन की गली में एक ऐसे देवदूत से मुलाकात हुई, जिसने अनजाने ही एक उद्देश्य थमा दिया।

1990 के दशक के आरंभ में कुछ लोगों ने सलाह दी कि मैं मलयालम से हिन्दी में अनुवाद भी करूँ। सलाह इस तरह से दी गई थी कि अनुवाद का मन भी बन गया, और भाषा जैसी अनुवाद प्रधान पत्रिका से किसी आधुनिक मलयालम कविता के अनुवाद का अनुरोध भी आ गया। मुझे मलयालम साहित्य का क, ख ग तक मालूम नहीं था, अतः लोगों से पूछ- पाछ कर एक आधुनिक कवि की तलाश में निकली और अय्यप्पा पणिक्कर के दफ्तर में जा पहुँची। कवि के कद और व्यक्तित्व का कोई आइडिया तो था नहीं, जो व्यक्ति सम्मुख आए, वे कवि कम किसान अधिक लग रहे थे। उन्होंने जो कविता अनुवाद के लिए दी वह भी पूर्णतया आधुनिक कविता नहीं मानी जा सकती थी। लोगों की सहायता से अनुवाद किया, छपा या नहीं छपा, उसकी चिन्ता तक नहीं की। समय फिर बीत रहा था, घर से बाहर निकली थी कि कुछ ताजी हवा मिले, किन्तु हवा का दूसरा नाम आँधी तूफान भी होता है, इसकी जानकारी तक नहीं थी। इन्ही दिनों न जाने कैसे वह किताब हाथ आ गई जो कवि ने दी थी, उसमें से कुरुक्षेत्र नामक कविता ने मन मे कुरुक्षेत्र को थाम लिया। कविता के साथ यही बात है कि वह रचना कर्ता की जगह रचना के पाठक से शीघ्रता से जुड़ती है। बस यूँ ही कभी- कभार, इधर- उधर कवि से नामुलाकात सी मुलाकात होती रही, मैंने बिना किसी उद्देश्य के कुरुक्षेत्र का अनुवाद करना शुरु कर दिया, हर शब्द , हर पंक्ति झंझोड़ के रख दे, दीमाग को भरपूर आहार मिला, और साहित्य एक नए अर्थ में सामने आने लगा।

कवि से पहले कविता से परिचय मिला। इस अनुवाद की कोई साहित्यिक वजह तो नहीं थी किन्तु मन में यह इच्छा हमेशा उठती रही कि कविता के अनुवाद की सूचना कवि को भी दी जाए, दी भी गई,  किसी समारोह में कवि दिखे तो रोक कर अपनी उपलब्धि बताई , किन्तु कवि बड़ीं सी मुस्कान के साथ सहज बने रहे। कुरुक्षेत्र मलयालम साहित्य में नई कविता का प्रवेश द्वार है, यह पूरे दक्षिण में नव चेतना ‌और नव- आन्दोलन की जनक है, इस बात से तो वाकिफ थी, यह भी जानकारी थी कि इस कविता को अनुदित करने की कई कोशिशें हो चुकीं हैं। अतः यही सोचा कि कवि को अनुवाद से क्या मतलब ? किन्तु कुछ दिनों में ही पणिक्कर जी का कुछ कहानियाँ अनूदित करने के लिए फोन आया। मैंने चुपचाप कहानियाँ ले लीं, और अनुवाद करके दे दीं। पुनः सन्देशा आया कविताओं के अनुवाद के लिए। इस बार फिर मैंने समय पर काम कर के दे दिया। ये कविताएँ समकालीन साहित्य में आईं और पाठकों द्वारा सराही गईं। कवि इस बीच मेरे काम को दूरी से परख रहे थे, कई लोगों से पूछताछ कर रहे थे। अतः जब कुछ कविताओं के अनुवाद देने गई तो आपने कुरुक्षेत्र के अनुवाद पर बात करने की सहमति जतलाई। कवि के साथ बैठकर फिर से अनुवाद को जाँचा परखा तो लगा कि काफी कुछ छूट गया, यही नहीं यह भी समझ में आ गया कि कुरुक्षेत्र का अनुवाद सतत प्रक्रिया है। सँभवतः मेरी मेहनत करने की प्रवृत्ति देखकर पणिक्कर जी ने मेरे सामने अपनी पुस्तक अनुदित करने का प्रस्ताव रखा। यह प्रस्ताव निसन्देह उत्साह वर्धक था। मैंने बिना सोचे- समझे लपक कर प्रस्ताव उठा लिया। मुझे जरा भी भान नहीं था कि पणिक्कर जी कविताएँ उन सब से अलग हैं जिन्हें मैं कविता के नाम पर पढ़ती चली आई हूँ। निसन्देह मुझे इस किताब से जूझते हुए आठ- दस महीने लग गए। इसके बाद जब भी कवि से वक्त माँगा, वे व्यस्त निकले। किसी तरह से वक्त मिला बेहद कंजूसी के साथ‍... यानी कि दोपहर में 2 से 4 बजे के बीच में उनके घर जाऊँ। जब मैं पणिक्कर जी के घर पहुँची तो सब कुछ सामान्य होते हुए भी असामान्य सा लग रहा था। लगता था कि न जाने कितने कैसे रहस्य हैं जो कोने- कोने में बुदबुदा रहे हैं। हालाँकि उन्होंने बड़े स्वाभाविक तौर पर अपनी पत्नी और बेटी से परिचय करवाया किन्तु कुछ ऐसा जरूर था जो असहज सा था। खैर पहले दिन ही मेरे हाथ पैर फूल गए , जब मैंने देखा कि पणिक्कर जी लगातार दो घण्टे तक बिना रुके, कविता सुनते और अर्थ समझाते रहे। मेरे जीवन में कविता के नाम पर इतना बड़ा सेशन पहली बात लगा था। शाम को वापिस लौटीं तो दीमाग का कोना- कोना खाली हो चुका था। वे हर कविता को सुन रहे थे, जहाँ पर उन्हें लगता कि गल्ती की संभावना है वहाँ पर समझाते जाते थे। इस तरह से हम कविता पर करीब 10 दिन से भी ज्यादा काम करते रहे। इन दस -पन्द्रह दिनों में जो बात घर के कोने- कोने से सामने आई, वह थी उनका घर- परिवार के प्रति गजब का समर्पण। मिनिट पर बेटी आती और कोई न कोई बात पूछती, बहुधा समस्याएँ बड़ी बेतुकी होतीं, जैसे नौकरानी को खाने पर क्या दिया जाए, कल के लिए क्या सब्जी ली जाएँ,धोबी को कितना पैसा दें, या फिर किस कमीज के साथ कौन सा दुप्पट्टा पहना जाए। बेटी उम्र में इतनी छोटी भी नहीं थी कि इस तरह की बातों का खुद निर्णय न कर सके, लेकिन पणिक्कर जी बिना झल्लाये हर सवाल का जवाब देते थे। फिर ऐसा लगा कि उनकी पत्नी पास के कमरे में ही है। पानी बहने की लगातार आवाजों के बीच वे चिल्ला का कुछ ना कुछ ना कुछ कहा करतीं, कभी कुछ मांगती जैसे पिन, अखबार आदि, और पणिक्कर जी बिना झल्लाये उनकी बात पर हुंकारा भरते या फिर कुछ माँगने पर सामान भी दे देते। यह सब इस तरह होता कि ना तो अनुवाद कार्य में बाधा आती, ना ही किसी दूसरे का काम रुकता। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके चिन्तन का सिरा कभी नहीं टूटता था। इस घटना ने मुझे आत्मचिन्तन के लिए प्रेरित किया, और इसी बैठक से मेरी पणिक्कर जी के प्रति श्रद्धा बन गई।
पणिक्कर जी परफेक्शन के प्रति बेहद जागरुक थे। उन्होंने मुझे सलाह दी कि जब मैं अपनी माँ के पास दिल्ली जाऊँ तो केदारनाथ सिंह के पास जाकर अपना किया अनुवाद दिखलाऊँ। उन दिनों मैं मानों जंगल से निकलकर आई थी। समकालीन साहित्यकार से परिचय तो मैं क्या नाम तक नहीं जानती थी। अतः बड़े कवियों से परिचय पाना मेरे लेखन को विस्तार दे गया। केदार जी ने बड़ी सावधानी से अनुवाद को पुनः परखा। तीसरी बार जब मैं पणिक्कर जी के पास पहुँची तो उन्होंने कहा कि अगली दिल्ली यात्रा में मुझे के सच्चिदानन्दन से मिलना है। क्यों कि वे ना केवल पणिक्कर जी की कविताओं से परिचित हैं बल्कि दिल्ली में रहने के कारण हिन्दी भी जानते हैं। अन्त में सब कुछ तैयार होने पर उन्होने कहा कि अब आप अनुवाद को अलमारी में रख कर भूल जाइए, और दो तीन महिने बाद पढ़िये। किसी भी काम के प्रति इतनी लगन मैंने कही और नहीं देखी। यह तो एक उदाहरण है, मैंने पणिक्कर जी को सदैव ही इसी लगन से काम करते देखा। जब वे शैक्सपीयर का अनुवाद कर रहे थे तो रोजाना दो- चार घण्टे अनुवादकों के साथ बैठ कर एक एक अक्षर पढ़ते थे।

वे ना केवल अपने समय का बल्कि दूसरों के समय का भी बखूबी से उपयोग किया करते थे। जब उन्हे लगा कि मैं केरल साहित्य के लिए अनुवादक के रूप में ठीक हूँ तो उन्होंने मुझे विभिन्न साहित्यिक कृतियों के अनुवाद के लिए प्रेरित किया, या फिर यूँ कहा जा सकता है कि बाध्य किया। उन्होंने मेरे सामने विभिन्न साहित्यिक कृतियों के अंबार लगा दिए, जैसे कि बालामणियम्मा , कारूर नील कण्ठ पिल्लै, तकषि आदि आदि। स्वाभाविक था कि ये सब श्रेष्ठ साहित्यकार थे, अतः इनकी रचनाओं का अनुवाद मेरे लिए कभी भी सहज या सरल नहीं रहा। पणिक्कर जी बड़ी प्रसन्नता से इन महान साहित्यकारों के अनुवाद में मदद करते। दरअसल उनका उद्देश्य एक ऐसा अनुवादक तैयार करना था, जो उनकी मलयालम भाषा को अनुवाद के माध्यम से अन्य भाषा के पाठकों तक ले जाए। और उन्होंने इस काम के लिए मुझे चुना, और मुझे कभी यह भान तक नहीं होने दिया कि मैं एक माध्यम के रूप में प्रयुक्त की जा रही हूँ। अपनी भाषा और साहित्य ‌और समाज के प्रति इतना समर्पित व्यक्ति कभी नहीं देखा।

पणिक्कर जी ने अपने व्यक्तित्व और विचारों को अश्वत्थ की तरह बहुविभाजित कर लिया था। उनका कवि व्यक्तित्व, चिन्तक व्यक्तित्व से बिल्कुल भिन्न था। कवि के रूप में वे जिस श्याम हास्य का निर्माण करते थे, चिन्तक के रूप में वे बेहद सक्रिय तत्ववेत्ता थे। अध्यापक के रूप में वे जितने निर्मम थे, मित्र के रूप में वे उतने ही कोमल थे। इन सब के ऊपर , उन्होंने जिस तरह से अपने परिवार ही नहीं पूरे खानदान को अपनी छत्र छाया में ले रखा था उसकी मिसाल मिलनी ही मुश्किल है। वे साहित्य ही नहीं , कलाओं में भी विशिष्ट रुचि रखते थे। कूटियाट्टम जैसी लुप्तप्रायः कला के पुनर्जीविन के किए अय्यप्पा पणिक्कर जी का श्रम था। वे सामान्य साहित्यकारों की तरह गप्पबाजी या सुरापान करने की अपेक्षा विभिन्न कलात्मक कार्यों में रुचि रखते थे। कावालम पणिक्कर का कोई भी नाटक अय्यप्पा पणिक्कर की सलाह के बिना पूरा नहीं होता था। नरेन्द्र प्रसाद जै जैसे प्रसिद्ध नाटककार और फिल्मकारों पर अय्यप्पा का प्रभाव था।
विश्व में अनेक सम्मान प्राप्त करने वाला यह व्यक्ति जिस सहजता से केरोसिन का तेल लेने, सौदा- सुलुफ लेने बाजार जाता था, वह अनिवर्चनीय है। मैं उन सब बातों की चर्चा ही नहीं कर रही जिनके द्वारा वे जाने जाते थे, यानि कि उनकी मलयालम साहित्य को देन, दक्षिण में कविता की नई धारा का प्रवाह या फिर कविता में नित्य नवीन प्रयोंग। क्यों कि इन सब के लिए कृत्या में भिन्न- भिन्न लेख प्रस्तुत किए जा रहे हैं। मैं तो बस उस व्यक्ति के व्यक्तित्व की जरा सी झलक दे रहीं हूँ, जो  चट्टान सा हर आँधी के सामने घुटना टेके बिना खड़ा रहा। मेरा परिचय उनके जीवन के अन्तिम प्रहर से ही रहा, फिर भी मैं सौभाग्य मानती हूँ कि इस काल पुरुष से परिचय हुआ।
इस अंक में प्रस्तुत कविताओं में गोत्रायन के अतिरिक्त अन्य सभी कविताओं का अनुवाद रति सक्सेना द्वारा किया गया है, गोत्रायन का अनुवाद तंकमणियम्मा, गिरधर राठी और सच्चिदानन्द ने किया है। यूँ तो संपादक रति सक्सेना अय्यप्पा पणिक्कर की अनेक कविताओं का अनुवाद किया है किन्तु समय की सीमा को ख्याल में रख कर चुनी हुई कविताओं को ही प्रस्तुत अंक में लिया गया है।

अय्यप्पा पणिक्कर की कविताओं के समान उनके रेखांकन भी अर्थवान हुआ करते थे। इस अंक में हम पणिक्कर जी के रेखांकनों और उनके चित्रात्मक प्रयोंगों को प्रस्तुत कर रहे हैं।  आशा है कि हिन्दी जगत एक महान साहित्यकार से काफी कुछ सीखेगा।

रति सक्सेना
 

अय्यप्प पणिक्कर के कुछ चित्र

 

 


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