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दरख्त जो ढह गया

उत्तर केरल का नदियों और समुद्री
झीलों से घिरा, कावालम जिले का एक गाँव कूट्टनाडु, प्राकृतिक
सौन्दर्य की दृष्टि से तो अद्भुत है ही किन्तु बौद्धिक स्तर पर भी
इतना उर्वर होगा, शायद ही किसी ने सोचा होगा। इसी कूट्टनाडु गाँव
में ऐन चेलयार नदी के तट पर बने पारम्परिक नालकेट्टु*घर में बसे
ओलिक्कल तरवाट्टु ( खानदान ) में मीनाक्षीयम्मा के कोख से 12
सितम्बर 1930 को जन्मा उण्णीकुट्टा -अय्यप्पा पणिक्कर के नाम से
जगत प्रसिद्ध कवि- विचारक चिन्तक हुआ। तत्कालीन केरलीय परंपरा के
अनुसार पेरियमना इलम* के गौतम गौत्र के सामवेदीय ब्राह्मण ईश्वर
नारायण नम्बूदिरी सम्बन्ध* पिता थे। कहा जाता है कि यह तरवाट्टु
मूल रूप से परूष जिले में बसे चालै तरवाट्टु का एक अंग था।
तत्कालीन केरलीय परम्परा के अनुरूप पुत्रियाँ घर में रहती थी,
निसन्देह उनकी सन्ताने भी माँ के घर का हिस्सा बनती थीं। जब
कुटुम्ब में सदस्य बढ़ गए तो एक शाखा को घर सहित कूट्नाड्डु इलाके
में भेज दिया गया। यह शाखा अय्यप्पा की नानी की थी । पणिक्कर जी ने
कभी बताया था कि उनका मातृक घर कम से कम सौ साल पुराना है। तीन
पुत्रियों के बाद जन्में पुत्र अय्यप्पा के प्रति माँ का स्नेह
अनुराग अधिक होना स्वाभाविक ही था। तत्कालीन केरलीय जीवन परम्परा
के अनुरूप यद्धपि संम्पत्ति स्त्रियों की होती थी, किन्तु देख- रेख
का अधिकार भाइयों का था। भाइयों का दायित्व था कि वे बहनों के
परिवार का पालन- पोषण करते हुए उनकी जमीन जायदाद की रक्षा करें।
किन्तु इस परिवार में ऐसा नहीं हुआ, अय्यप्पा के नानी के भाई , कोच्चु कुंञ्ञ अम्मावन का झुकाव अपनी पत्नी के परिवार की तरफ था
, जो उस वक्त की मान्यता के अनुसार सही नहीं था। सम्बन्धों के प्रति
विराग और सन्देह का पहला बीज अय्यप्पा के बाल्यकाल में ही पड़ गया था जब उन्होंने यह पाया कि बीघों जमीन की मालकिन होते हुए भी माँ व
नानी अपनी जमीन पर गिरे हुए एक नारियल तक उठाने की अधिकारणी नहीं
थीं। केरलीय नायर परिवारों में उन दिनों पिता की कोई भूमिका नहीं
होती थी, क्यों कि केवल सम्बन्ध* के अधिकारी होते थे, ब्राह्मण होने
पर स्वयं अपनी संतान का स्पर्श तक नहीं करते थे। मामा ही घर परिवार
की देख-रेख करते और बहनों के बच्चों का लालन- पालन करते थे। मामा यदि
कर्तव्य विमुख हुए या फिर पत्नी के बहकावे में आकर पत्नी का घर भरने
लगे तो बहनों को कष्ट का सामना करना पड़ता था। लेकिन अय्यप्पा
पणिक्कर के पिता ने परिवार का कष्ट देखा तो अपने पास से धन लगवा कर
मुकदमा दाखिल करवाया। अय्यप्पा बड़े कष्ट के साथ याद किया करते थे
कि किस तरह वकील उनके घर आया और किस उनकी नानी और माँ ने
रोते हुए मामा के खिलाफ हस्ताक्षर किए। यह सब उस कुटुम्ब के लिए
बेहद कष्टकारक रहा होगा जो अपनी समृद्धता और भद्रता के लिए
प्रसिद्ध था। यही कारण था कि इतना सब कुछ होते
हुए भी अय्यप्पा के परिवार को लम्बे समय तक आर्थिक दृष्टि से
कठिनाई के दौर से गुजरना पड़ा। यही नहीं इस घटना का प्रभाव उन पर इतना पड़ा कि
उन्होंने जीवन भर किसी सम्बन्ध पर पूर्णतया भरोसा नहीं किया और
अजीब सी गोपनीयता को निभाते रहे। पणिक्कर जी ने कभी बड़े कष्ट के साथ
बताया था कि उन दिनों नायर परिवारों की समृद्धि इस बात पर निर्भर
करती थी कि कारणवार मुखिया सम्पत्ति का किस तरह से सदुपयोग करता
है। सरदार के एम. पणिक्कर और कावालाम नारायण पणिक्कर के परिवार के कारणवार
अम्मावन मामा सूझबूझ वाले एवं परिवार के प्रति स्नेह रखने वाले थे,
इसलिए उस परिवार के बच्चों को आगे बढ़ने का स्वतः मौका मिला। किन्तु
उनके अपने तरवाट्टु के कारणवार क्षुद्र बुद्धि के होने के कारण उनका
अपना परिवार हमेशा कष्टों से जूझता रहा। इसके अतिरिक्त दूसरा कष्ट
उस परिवार को यह था कि अय्यप्पा के अपने मामा के. माधवन पणिक्कर
बेहद कुशाग्र बुद्धि के थे। किन्तु सरदार के. एम. पणिक्कर की माता जो कि
अय्यप्पा की नानी की मौसेरी बहन थी ने यह जिद पकड़ ली कि केवल उनका
बेटा ही पढ़ाई के लिए विदेश जाएगा, जिद इतनी ही होती तो भी ठीक था,
उनकी शर्त यह भी थी कि माधवन पणिक्कर को उच्च शिक्षा के लिए भेजा
ना जाए। माधवन बेहद प्रतिभाशाली थे, वे मूक रह कर कष्ट झेलते रहे।
और 40 बरस की अल्पायु में ही उनका देहान्त हो गया। बचपन से
पारीवारिक कलह को झेलते अय्यप्पा के जीवन में सबसे बड़ा झटका तब लगा
जब उनकी माँ मीनाक्षी देवी का देहान्त हो गया, उस वक्त अय्यप्पा की
उम्र सिर्फ 13 बरस की थी। वे जब कभी भावुक होते तो यही कहते थे
कि-- मेरे सारे आँसू तभी खत्म हो गए जब माँ इस दुनिया से चलीं गईं,
माँ के बाद कोई भी दुख मेरे आँसुओं को जीवित नहीं कर पाया। यहीं से
अय्यप्पा की आँखों में एक विचित्र वैराग्य और दर्द समा गया। किशोर
अय्यप्पा के कंधे पर जिन्दगी का भार तो था ही, सात भाई - बहनों में
सबसे बड़े पुत्र होने के कारण परिवार का दायित्व भी उन पर आन पड़ा।
पारम्परिक रूप से तो अय्यप्पा का पिता से कोई सम्बन्ध रहना ही नहीं
चाहिए था, किन्तु उनके पिता, जिन्होंने कि अपने ब्राह्मण समाज में
भी विवाह कर लिया था , अपने सम्बन्ध से उत्पन्न सन्तानों का
आजीवन मार्गदर्शन किया। माँ की मृत्यु के बाद वे अपने पिता के साथ ही
काशी अस्थियाँ विसर्जन के लिए ले गए थे, पठन- पाठन में अय्यप्पा की
रुचि बचपन से ही कुशाग्र थे, अहाते में ही एक पठनमुरि यानी कि पढ़ने का कमरा
था, जहाँ बैठ कर कवि ने न जाने कितने लेखकों को पढ़ा। यही नहीं वे
भाई बहनों के साथ घरेलू नाटक भी रचा करते थे और अपनी माँ से भाषण
दिलवाते। सबसे पहले उन्हें घर की जमीन पर ही बनी कन्यापाठशाला में
भर्ती किया गया था, पणिक्कर जी ने कई बार एक घटना का उल्लेख किया
है कि जब वे आठवीं में थे, परीक्षा से ऐन पहले प्रधानाध्यापक ने उनसे
कहा कि वे परीक्षा नहीं दे सकते, क्यों कि उन्होंने फीस नहीं दी। स्कूल उनके खानदान के लिए दी गई जमीन पर बना था, इसलिए यह
सोच लिया गया था कि फीस देने की कोई आवश्यकता नहीं। बात इतनी ही नहीं,
घर में पैसों की किल्लत भी थी। प्रधानाध्यापक के स्कूल से निकाल
देने पर बालक अय्यप्पा रोते हुए घर आए और माँ को बात बताई़ माँ ने
ना जाने कितनी पेटियाँ , बक्से उलट पुलट कर 2 रुपये निकाल बच्चे की
हथेली पर रख दिए। अय्यप्पा जब स्कूल लौटे तो बाकी बच्चे परीक्षा
लिख कर लौट चुके थे, फीस पाकर अध्यापक ने परीक्षा लिखने की अनुमति
दे दी और अय्यप्पा आँसुओं से धुँधली आँखो से परीक्षा पत्र पढ़ने लगे।
अय्यप्पा ने जब भी इस घटना को याद किया, उनकी आँखों में काली परछाई
सी तैर गई।

बहनों के साथ पल खेल रहे बालक अय्यप्पा में एक विचित्र सी
स्त्रियोचित कोमलता, और सतत क्रियाशीलता बचपन से ही समा गई थी। उनके
आरंभिक चित्रों में आगे की झुके सिर के बावजूद आँखों में गहराई और
हौंठों पर गंभीर विषाद पाते हैं जिन्हें उन्होंने बाद में एक अजीब
सी खिलखिलाहट भरी हँसी और बड़ें चश्मे से ढक दिया था। बाल्यकाल की
पारीवारिक विषमताओं ने उन्हें यह भंगिमा दे दी थी। उनकी गरदन सीधी
हो , उसके लिए उन्हें अनेक कुरुक्षेत्रों से गुजरना पड़ा। अय्यप्पा
के किशोर और युवा काल की तस्वीरों में यही अन्तर प्रमुख है कि युवा
अय्यप्पा अपनी पैनी निगाहों से जिन्दगी के सत्यों को समझ रहा है,
उसके ताप को महसूस कर रहा है, किन्तु प्रौढ़ अय्यप्पा पणिक्कर उन
सत्यों को समझ चुके हैं, और उसके हौंठ इन सत्यों की असत्यता पर हँस
रहे हैं, किन्तु आँखे गहरे विषाद में डूबी हैं।
अय्यप्पा ने 13 बरस की उम्र में पहली कविता लिखी जो बाद में
मातृभूमि में छपी। गाँव और जिले के अनेक स्कूलों में पढ़ते हुए
अय्यप्पा कोषिकोष के मालाबार क्रिश्चियन कालेज में इंटर की शिक्षा
के लिए पहुँचे। आर्थिक अभाव अभी तक पीछा नहीं छोड़ रहा था। पूरे दिन
के खाने पीने आदि सभी खर्चों के लिए उनके पास केवल एक रुपया हुआ
करता था। कोषिकोष प्रान्त छात्र जागरुकता और आन्दोलनों के लिए
सदैव प्रसिद्ध रहा है। युवा होते हुए अय्यप्पा को यहाँ अनेक मित्र
मिले, अनेक जलसों में जाने का मौका मिला। यह वह उम्र थी जब अय्यप्पा
का युवा मन समाज में पैठे अन्यायों को महसूस कर रहा था। वह उनके
खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश कर रहा था, वह अपनी गर्दन सीधी करने की
भी कोशिश कर रहा था। यहीं वह समय था जब वह विविध त्रासदियों से भी
गुजर रहा था। किसी वक्त जब लड़कियों पर बलात्कार की बात चल रही थी
तो अय्यप्पा पणिक्कर जी ने केवल इतना ही कहा था कि --.कभी- कभी इस
दर्द से बालकों को किशोरो को भी गुजरना पड़ जाता है, वह भी जाहिलों
के चंगुल में। कोषिकोष से कावालम जाने के लिए ना जाने कितनी दूर बस
में ना जाने कितना पैदल और अन्ततः नाव पर सवार होकर जाना पड़ता था।
पैदल जाने के रास्ते में किसी ट्रक का आसरा लेने पर किशोर अय्यप्पा
को किसी बर्बरता का सामना करना पड़ा । शायद यही कारण है कि वे स्त्री
के कष्टों को ज्यादा आसानी से समझते थे। ना जाने कब क्या हुआ, किन-
किन मोहभंगों से गुजरना पड़ा कि अय्यप्पा जिन्दगी भर के लिए राजनीतक
क्रियाकलापो से जुदा होते गए। 1948 में वे ट्रिवेन्द्रम के
यूनिवर्सिटी कालेज में बी ए आनर्स की शिक्षा प्राप्त करने आ पहुँचे।
युवा अय्यप्पा का अकेलापन गहन होता जा रहा था , वे कविता तो लिख ही
रहे थे, किन्तु इसी समय एक उपन्यास भी लिखना शुरु किया ,
किन्तु आधा लिखने के बाद पाण्डुलिपि ना जाने कैसे नष्ट हो गई, तब
अय्यप्पा ने अपने को कविता में ही केन्द्रित कर लिया। बाद में वे
इस बातपर सन्तोष जाहिर करते थे। अय्यप्पा ने एक घटना के बारे कई
बार बताया था बीए आनर्स की डिग्री लेकर वे अपने इलाके के किसी
स्टेशन मास्टर के पास पहुँचे जिससे उन्हें कोई नौकरी घर के पास ही
मिल जाए। लेकिन उन स्टेशन मास्टर ने उनका मखौल बनाते हुए कहा कि अरे
आप यहाँ क्या नौकरी करेंगे, आप तो ग्रेजुएट हैं, कहीं प्रोफेसर
बनिए। पणिक्कर हमेशा उस स्टेशन मास्टर के प्रति कृतज्ञ रहे, कहते
थे कि उसने मेरा मखौल बनाने के लिए ही कहा किन्तु जो कहा वह सच हो
गया। यही पणिक्कर का चरित्र था, अपने शत्रुओं को दया से देखों,
मखौल बनाने या विरोध करने वालो को अपना मित्र मानों। जिन्दगी
पणिक्कर ने यही किया। यहाँ तक कि उनकी कविता के विरोध मे किताबे कि
किताबे लिखीं गईं, अय्यप्पा चुप रहे, बाद में उन्हे गाली देने वाला
लेखक बीमार पड़ा तो वे उसे देखने पहुँच गए। उस विरोधी की क्या स्थिति
हुई होगी, देखने योग्य है। अभी एक दो बरस पहले ही एक पत्रिका बकायदा
घोषणा करके लोगों से प्रतिक्रिया माँगी थी कि " क्या अय्यप्पा
पणिक्कर चुक गए" पत्रिका को प्रतिक्रिया तो नहीं मिली किन्तु कुछ
पत्र इस आशय के जरूर मिले कि .. पणिक्कर तो सदैव ही प्रयोग करते रहे
हैं, उनके प्रयोग कुछ वक्त के बाद ही प्रतिफलित होते रहे हैं।
इसलिए यह उनकी कविता पर अभी से विवाद उछालना व्यर्थ है।
बी ए आनर्स की परीक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने एक बरस तक
कोट्टायम सी. एस कालेज में पढ़ाया फिर एम जी कालेज त्रिवेन्द्रम में
पढ़ाने चले आए। यहाँ घर किराये पर लेकर कुछ युवा शिक्षकों
के साथ रहते थे। ये सब प्रखर चिन्तक थे। इनमें से एक शैणाय जी
हिन्दी के कहानीकार हुए और अय्यप्पा के जीवन भर प्रशंसक बने रहे।
ये सब अध्यापक थे, किन्तु युवा थे, जिन्दगी के प्रति अपना अपना
नजरिया लिए हुए। इनमें से वेलायुधन का विवाह प्रसिद्ध कवयित्री
सुगतकुमारी जी के साथ हुआ। सुगत कुमारी जी ने बताया था कि उन्होंने
अपने पति की एक फोटों देखी जिसमें वे अनेक मित्रों के साथ थे। बाकी
सब तो खड़े थे किन्तु अय्यप्पा टहनी पर उलटे लटके हँस रहे थे।
सुगतकुमारी ने कभी अय्यप्पा से पूछा---पणिक्कर , आप ही इस तरह से
उलटे क्यों लटके हैं, पणिक्कर ने बड़े भोलेपन से कहा कि-- टीचर !मैं
तो जन्मा ही उलटा था। गंभीर युवा अय्यप्पा चुहुल और हँसी का मुखौटा
तैयार करने लगे थे जो उनके मृत्यु पर्यन्त काम आया।
यही वह समय था जब युवा अय्यप्पा अनेक सवालों से जूझ रहे थे मसलन हम
इस धरती पर आए ही क्यों? आए हैं तो क्या कर रहे हैं आदि-आदि। कभी
मकान के अहाते मे किसी दरख्त के नीचे लेटे आसमान की ओर ताका करते
तो कभी एम जी कालेज के परसर में किसी छाँह मे बैठे ताका करते। यहीं
उनके मन का कुरुक्षेत्र एक आकार लेने लगा,मामकाः अपने और पाण्डवाः
परायों के भेद को समझने की कोशिश होने लगी। गवाह बना क्षितिज से
उभरता तारा...
क्षितिज के पार के ताप!
स्फोटन से जन्मे ओ तारे!
तू चढ़ , ऊपर चढ़, जिससे
जमीन की रगें तड़कें
खूँ चूने लगे आस्मान से!
उनके पास वह सब था उस तारे को दिखलाने को जिसे वे खुद देख रहे थे।
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इसी राह पर देखेगा तू
मनुष्यों की कल्पना से सजी
विशिष्ट सृष्टि, भीड़ भड़क्के वाली
बड़ी सी हाट है दुनिया
माल ढोकर सौदागर आते हैं
मौलभाव करते
आँसू , शिराएँ सुड़कती उबला खून
मज्जा चूसती है , कंकाल कुतरता खाल
जड़े खींच लेतीं हैं फूल
माटी निगल लेती है पैदावार
हम मर्त्यों की हँसती खेलती
दुनिया को देखेगा तू नीचे...
(
कुरुक्षेत्र)
कोई सन्देह नहीं इन भावों को सान्द्र बनाते, चिन्तन करते, उच्चारते
अय्यप्पा को छह साल लगे। यही इस अनुपम कविता रचना का समय है। किन्तु
करीब चार साल तक यह कविता संपादक की मेज में बन्द रही। सम्पादक का
विचार था कि अभी मलयाली पाठक इस कविता के लिए तैयार नहीं हैं। यह
कविता मलयालम साहित्य का मील का पत्थर नहीं बल्कि मेरु पर्वत बनी।
कुरुक्षेत्र प्रकाशित होते ही पाठकीय समाज में हलचल मच गई, एक
परम्परवादी मत था जो इस तरह की कविता को मलयालम साहित्य के
लिए घातक बता रहा था, दूसरी तरफ एक ऐसा युवा वर्ग था जो इसे अपनी
आवाज मान रहा था। लोगों का आक्षेप था कि इसमें कवि का अंग्रेजी
ज्ञान और वेस्ट लैण्ड का प्रभाव है। कुरुक्षेत्र की गूंज तमिल नाडु
में भी पड़ीं, वहाँ तो कुरुक्षेत्र के नाम पर युवा क्लब खुल गए जो
अपने आक्रोश की अभिव्यक्ति को आजादी देते थे। युवा अय्यप्पा इन सब
से बेखबर अपनी यात्रा में चलायमान थे। उन्होंने केरल विश्वविद्यालय
से एम.ए की परीक्षा उत्तीर्ण की और यूनिवर्सिटी कालेज
त्रिवेन्द्रम में अंग्रेजी पढ़ाने चले आए। यहीं पर मुझे एक बात याद
आई कि तमिलनाडु की एक फिल्म निदेशिका ने कुरुक्षेत्र कविता को अपनी
फिल्म में लेने की इच्छा जाहिर की थी, और मैंने उसे हिन्दी में उसे
कविता का भाव भी समझाया था। वह इतनी भावविभोर थी कि उसने कूट्टनाडु
की यात्रा भी की थी। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता कमलाहसन तो
कुरुक्षेत्र के लेखक से घर आकर मिलना चाहते थे, किन्तु अय्यप्पा
पणिक्कर ने कोई रुचि जाहिर ना की , और एक तरह से उस आगमन को विराम
लगा दिया। मैं उनकी इस बात को कभी नहीं समझ पाई, कभी तो वे एक
पोस्टकार्ड में लिखी प्रशंसा से बेहद पुलकित हो जाते तो कभी बड़े से
बड़े सम्मान को यूँ ही टाल देते थे।
1960 में पणिक्कर जी का विवाह हरिप्पाट्टु के नामी खानदान से
ताल्लुक रखने वाली कायमकुलम निवासिनी श्रीपार्वती से हुआ। विवाह के
बारे में पणिक्कर जी विचित्र रूप में मौन रहे, इतना जरूर बताया कि
यह युवती एक नामी घराने की थीं, उनकी माँ बेहद दबंग महिला जमीदार
थीं। मैंने उनके घर में पणिक्कर जी की माँ का चित्र तो नहीं देखा, संभवतः उन
दिनों चित्र खींचने की परंपरा नहीं थी, किन्तु उनकी सास का चित्र उनके
कमरे में सदैव रहा। वे अपनी सास को बड़े आदर से याद किया करते थे।
पिता का चित्र भी उनकी दीवार पर हमेशा लगा रहा। इसके अतिरिक्त वे
अपनी सबसे बड़ी बहन पार्वतीयम्मा के बेहद करीब रहे। पणिक्कर जी ने
कभी अपने पारीवारिक जीवन के बारे में कुछ नहीं कहा, लेकिन हर देखने
वाले को मालूम पड़ जाता था कि वे किस कष्ट का सामना करते रहे होंगे।
जब भी लोग उनके घर गए, उनकी पत्नी हमेशा बाथरूम में नहाती मिलतीं,
एक बार मैंने ऐसे ही कह दिया कि इतना नहाना उनके स्वास्थ्य के लिए
ठीक नहीं है तो पणिक्कर जी ने तुरन्त प्रतिवाद करते हुए कहा-- नहीं
दरअसल मेरी पत्नी की नानी भी सफाई के लिए विशेष जागरुक थीं, वही
प्रभाव पत्नी पर आया है। पणिक्कर जी ने अपनी पत्नी की हर जरूरत का
ख्याल रखा और विशेष प्रेम से उनकी देखभाल की। वे उन्हे अपने हाथ से
परोस कर भोजन करवाते थे। स्वयं भोजन पकाते थे। पणिक्कर जी अपने
परिवार के हर सदस्य के प्रति बेहद प्रेम रखते थे।
विवाह से पहले उन्होंने पेरुकडा के एकान्त इलाके में पहाड़ी की चोटी
पर बने मकान को खरीद लिया था। पणिक्कर जी की कविता इस मकान में काफी
फली, वे कहा करते थे, कि उस मकान के बड़े- बड़े कमरों में चाँदनी आराम
से फैल जाती थी , और वे रात- रात उस सौन्दर्य से अभिभूत होते रहते।
किन्तु बाद में पत्नी का अकेलापन और समस्याएँ देख कर उस मकान को
बेच कर वेलयाम्बलम में दूसरा मकान खरीदा।
1065 तक यूनीवर्सिटी कालेज में पढ़ाने के बाद उन्होंने इन्स्टीट्यूट
इंगलिश ज्वाइन कर लिया अब तक वे एक पुत्री के पिता बन चुके थे।
पत्नी की बीमारी के चलते उन्होंने अपनी पुत्रियों को स्वयं पाला
है। एक बार उन्होंने कहा था कि बच्ची के दूध की बोतल तैयार करते
हुए, उसे तैयार करते हुए उन्हें वही आनन्द मिला था जो किसी माँ को
मिलता होगा। जब नन्हीं बच्ची उंगली पकड़ कर चलती तो पिता को लगता कि
कोई तोता उनकी उंगलियों पर आ कर बैठ गया है। दरअसल उन्होंने हर
सम्बन्ध को बड़ी शिद्दत से निभाया। चाहे माँ हो, बहने हों, पत्नी हो
या दोस्त हों। परिवार की हर समस्या के वक्त वे सबके सामने उपस्थित
रहते थे।
1969-70 में अय्यप्पा पणिक्कर आगे की शिक्षा प्राप्त करने इंडाना
यूनीवर्सिटी अमेरिका गए, यहाँ अय्यप्पा की जिन्दगी का दूसरा फेजं
शुरु हुआ। गाँव से , परम्परा से बेहद मुहब्बत करने वाले इस चालीस
वर्ष के युवक को विदेश में काफी मानसिक कष्ट हुआ। परदेश में स्वदेश
खोजने की कोशिश में उनका परिचय कोलीन से हुआ, जो पढ़ाई में उनसे
जूनियर थी, किन्तु भारतीय संगीत विशेषकर रविशंकर के सितार वादन से
बड़ी प्रभावित थी। यूनिवर्सिटी की परम्परा के अनुसार स्थानीय छात्र
किसी भी विदेशी छात्र को अतिथि के रूप में स्वीकार करते थे, जो इन
विदेशी छात्रों को छुट्टियों के दिनों में घर सा माहौल देने की कोशिश करते। कोलीन ने किसी
भारतीय छात्र का होस्ट बनने में रुचि प्रगट की, जिससे अय्यप्पा
पणिक्कर का कोलीन के घर आना- जाना शुरु हुआ। इससे आपके के जीवन में
एक नया अध्याय शुरु हुआ। उनके जीवन ने कोमल भावनाओं ने धीमे- धीमे
पाँव जमाए, इसी वक्त उन्होंने अपनी बेहद प्रसिद्ध कविता---“ नी
तन्ने जीवितमं सन्ध्ये" लिखी। “यह कविता डायरी के अन्दाज में लिखी
गई है,इसमे एक अजीब अन्दाज में प्रेम और अध्यात्म को जोड़ा गया है।
हर सप्ताह पणिक्कर कविता को भारत भेजते और उनके पाठक बड़ी उत्सुकता
से अगली कड़ी का इंतजार करते। अय्यप्पा पणिक्कर को सबसे अधिक
पापुलरिटी इसी कविता से मिली। इसमें निजी भावनाओं के अतिरिक्त देश
और समाज से जुड़ी अनेक विचारधाराएँ भी हैं। संध्या चाहे कविता हो या
कवि के जीवन का अनुभव, महत्व की बात यह है कि यहाँ कवि के मन का एक
परदा हट गया, खुल कर बोलना , हर विषय पर बोलना कवि की कविता का
हिस्सा बन गया। यहीं कवि ने एक पूरी कि पूरी युवा पीढ़ी को अपना लिया।
कवि के रूप में अय्यप्पा पणिक्कर ने एक नियम का पालन किया कि दस
साल में एक कविता की पुस्तक निकालना। वे अधिक लिखने में विश्वास नहीं
करते थे। अय्यप्पा ने जिस गति से कविता लिखीं उससे कहीं अधिक गति
से गद्य लिखा, पूरे विश्व में केवल मलयालम ही एक ऐसी भाषा है जिसने
शेक्सपीयर के समग्र साहित्य को अपनी भाषा में उतार लिया है, यह
पणिक्कर जी के प्रयत्न का ही परिणाम है। हालाँकि यह अनुवाद अलग अलग
लोगों ने किया किन्तु पणिक्कर जी करीब 2-3 महीने तक रोजाना अनुवादकों
के साथ बैठ कर एक-एक पंक्ति को पढ़ते थे, और सुधार करते थे।
1970 के बाद की यात्रा में पणिक्कर जी बेहद कर्मठ रहे। कोलीन
अय्यप्पा की जिन्दगी में संध्या बन कर आई, संध्या जो कि रात का पहला
पहर होती है, चान्दनी के आगमन की सूचना होती है। यहीं पर अय्यप्पा को जिन्दगी
के तापों से पहली बार विश्राम मिला, मोह व राग से तादात्म्य बैठा।
उन्हे यह भी मालूम था कि यह सम्बन्ध क्षणिक है, फिर भी पल भर के इस
विश्राम ने उन्हें उर्जा से भर दिया। बाद में कोलीन या सन्ध्या से
उनके सम्बन्ध औपचारिक ही रहे किन्तु सम्बन्धों की गाढ़ता को जो
उन्होंने स्वर दिए वे अमर बन गए। वे जीवन भर कोलीन को सन्ध्या नाम
से ही सम्बोधित करते रहे। अय्यप्पा पणिक्कर अपनी मित्रता और
सम्बन्धों के प्रति सदैव से संवेदनशील रहे थे, किन्तु मित्रता के
नाम पर जितना कुछ कर सकने की क्षमता अय्यप्पा पणिक्कर में थी, उतनी
शायद ही किसी में होगी। मित्र ही नहीं अपने विरोधियों के प्रति भी
वे बड़ा सहज व आत्मीय भाव रखा करते थे।
अय्यप्पा के आरम्भिक विषाद ने कुछ समय उपरान्त कविता में एक
विचित्र व्यंग्य का स्थान ले लिया। उनके तीखे व्यंग्य की मार को
समझना इतना आसान भी नहीं, वे जितनी सहजता से राजनीति समाज आदि पर
कस कर व्यंग्य का चाबुक मारते उसकी तुलना में कुछ मिलना संभव ही नहीं
है। तत्कालीन प्रधान मंन्त्री जवाहर नेहरू पर व्यग्य कसते हुए
उन्होंने कहा..
इण्डन चाचा ने बाएँ पाँव पर लगी कीचड़ को
अपने दाएँ पाँव से पौछा
फिर बाएँ पाँव से दाँया पाँव पौछा
फिर दायें से बायाँ पाँव पौछा
फिर बायें से दायाँ पाँव पौछा
फिर..........
राजनीति की कीचड़ की अनश्वरता को जताने के लिए इससे ज्यादा क्या कहा
जा सकता है। हर कविता एक प्रयोग , हर विचार एक नवीनता, कवि अय्यप्पा
में नवीनता मानों सहस्र धाराएँ बन कर फूट पड़ीं थी। यह शिव हर निमिष
अपने जटाजूट से सहस्रधारा गंगा बहा रहा था। युवा काल का विषाद भरा
चेहरा अजीब व्यंग्य भर हौंठों के पीछे जा दुबका था। अब कवि धड़ल्ले
से व्यंग्य की चाबुक बरसा रहा था। आपात्काल में कवि ने कार्टून
कविताएँ रची, उनकी तुलना में कोई कविता पूरे भारत वर्ष में नजर नहीं
आई। ..
काटों मत पीटों मत, जोरसे पकड़ों मत
हर्र का काढ़ा मैं पी लूँगा अम्मा जी
हर्र मैं पी लूँगा
कड़वा है कहूँगा नहीं, कसैला है कहूँगा नहीं
हर्र का काढ़ा मैं पी लूँगा प्यारी अम्मा
हर्र मैं ले लूँगा
या फिर ..
मेरी अंगूठी राजकुमारी
किसके लिए तूने चुरा ली
ओस से भीगी दुर्वा को मोड़ कर बनाई गई
मेरी अंगूठी
पितृ श्राद्ध के लिए बनाई गई पवित्र अंगूठी
किसके लिए तूने छिपा ली?

कवि का कार्य क्षेत्र बढ़ता गया। 1981-82 में वे पोस्ट डाक्ट्रेट
करने के लिए पुनः अमेरिका गए , जहाँ वे पाँच महिने येले और चार
महिने हारवर्ड यूनिवर्सिटी में रहे। इस काल में उन्होंने करीब 25
यूनिवर्सिटियों का भ्रमण किया और जेम्स डिके, जान हालन्डर, एलेन्स
गिल्नसबर्ग, चिस्लोव आदि नामी गिरामी कवियों से मिले, उनका
इन्टर्व्यू लिया। एक तरह से वे मलयालम साहित्य के वाहक बन कर देश
विदेश में घूमे और मित्रता का दायरा बढ़ाया। कवि अय्यप्पा कभी भी
अपनी जमीन को नहीं भूले। उन दिनों जब वे केरल में रहते थे, तो वे पूरे केरल प्रान्त में कविता
का पारायण करते हुए भ्रमण किया करते थे। उन्होंने कविता के साथ अनेक
प्रयोग भी किए जैसे कि अभिनय और लोक संगीत को कविता से जोड़ना ,
वाचन , पारायण और अभिनय को एक सूत्र में पिरोना आदि। आपकी रुचि पारंपरिक कलाओं और थियेटर में भी थी। अय्यप्पा के व्यक्तित्व में
जितनी कलाएँ प्रफुल्लित हुई हैं, बिरले ही किसी में होती होंगी।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि अय्यप्पा स्वयं में एक संस्था बन गए। ऐसा
नहीं कि यह वक्त उनके लिए आरामदायक था, बल्कि उनका पारीवारिक
दायित्व बढ़ता जा रहा था। इसी
बीच उनके व्यक्तिगत सम्बन्धों में भी एक नए अध्याय खुला , यहाँ आपने व्यंग्य के साथ स्नेह और कातर
प्रेम से परिपूर्ण रचनाएं जैसे कि “गोपिका दण्डं” , “ओषिवकाल संवाद”
आदि प्रेम -पगी रचनाएँ मिलीं। दरअसल अय्यप्पा की जिन्दगी में प्रेम
प्रसंग उस रोशनदान की तरह थे, जहाँ से ताजी हवा का झौंका पा लेते
थे। किन्तु अय्यप्पा के जीवन में आराम का कोई
समय नहीं था। प्रोफेसर के पद से सेवा मुक्त होने के साथ ही उन्होंने
मिडीवल इन्डियन लिट्रेचर के काम को अपने हाथ में ले लिया था।
अय्यप्पा पणिक्कर का सबसे बड़ा गुण था, नई पीढ़ी पर बेहद विश्वास, वे
हमेशा कुछ ऐसा करते कि युवाओं सम्बल मिले। वे कई कविता सभाओं के
आश्रय दाता बने रहे, वे वहाँ एक शब्द भी नहीं बोलते, बस चुपचाप बैठे
सुनते रहते। युवाओं को अधिक से अधिक बोलने का मौका देते। युवक मौके
का इस्तेमाल करते, खूब चर्चा करते, क्यों कि उनका प्रिय कवि श्रोता
बना बैठा है। वे हर किसी अनजाने की सहायता के लिए तैयार रहते, यदि
उसमे कोई गुण देखते तो शिफारिश जरूर करते। वे हर किसी के सामने छोटा
बनने की कोशिश करते, लेकिन जैसे ही उन्हें लगता कि सामने वाला उनका
नाजायज फायदा उठा रहाहै, तो वे फुफकार भी उठते।
अपने छात्रों मे पणिक्कर सर अपने गुस्से के लिए बेहद प्रसिद्ध थे।
उनके शब्दों की तीखी धार को सहना हर किसी के वश में नहीं था। एक
बार उनकी शिष्या ने पणिक्कर जी के बारे में हँसते हुए कहा कि ---सर
के व्यग्य और गुस्से को झेलना हर किसी के वश की बात नहीं होती। उनकी
प्रशंसकों में स्त्रियों की संख्या इसलिए अधिक है कि स्त्रियाँ
स्वभाविक तौर से इस तरह के व्यवहार को झेल लेती हैं, किन्तु पुरुषों
का अहम उन्हें तोड़ देता है।
अय्यप्पा पणिक्कर की जिन्दगी रोज नए चेलेंज ले कर आती , कवि रोज
उपादान खोजते। उन्हे लग रहा था कि समय भाग रहा है, वे लगातार
लगातार काम करते, मिडिवल इन्डियन लिट्रेचर पूरा हुआ, शेक्सपीयर के
सम्पूर्ण साहित्य का अनुवाद पूरा हुआ। अन्तर्सन्निवेष थ्योरी को
अंजाम दिया, मलयालम साहित्य को रूप रेखा दी। अधिकतर लोक साहित्य पर
काम किया। सन 2000 तक वे बेहद व्यस्त रहे। धीमें- धीमे उनकी शक्ति
चुकती जा रही थी। ऐसा लगने लगा था कि वे अपना सामान बटोर कर यात्रा
की तैयारी कर रहे हों। कवि जो जीवन भर मृत्यु की बात करता रहा,
अचानक मृत्यु को सामने महसूस कर रहा था। कभी किसी कठिन समय में
उन्होंने मुझ से कहा था कि हम लोग रोज मरते हैं, मौत हमारे पास हर
क्षण आती है, किन्तु फिर एकाएक उस सहन नहीं कर पाते। मृत्यु पूजा
से पहले कभी किसी खास मानसिक कष्ट के चलते वे रात गहराने तक समुद्र
तट पर टहलते रहे, सिगरेट फूंकते हुए ( हालांकि वे सामान्यजीवन में
न शराब पीते, ना माँस खाते, और ना ही सिगरेट पीते) हर क्षण कवि
सागर में छलांग लगाने का सोचते रहे किन्तु न जाने कौन उन्हें
बार -बार रोकता रहा। सुबह पौ फटने पर वे वापिस घर में थे।
मृत्यु से दोस्ती रखने वाले कवि को काफी हद तक विश्वास था कि वे
मृत्यु को पछाड़ देंगे। बीमारी का पता चलने पर भी वे बार -बार कहते..
सब ठीक होगा, ... लेकिन एक अजीब सी हड़बड़ाहट स्वभाव में आ गई, वे
सामान बटोरने लगे थे। वे अपना काम निपटाने लगे। शरीर थकता जा रहा
था, लेकिन अय्यप्पा का काम नहीं खत्म हो रहा था। उन्हें मालूम था
कि उनकी कई अनूदित कविताएँ बिना छपे रखी हैं, बीमारी में अंधाधुंध
पैसा लग रहा था, फिर भी उन्होंने कुरुक्षेत्र उन कविताओं को
पुस्तकाकार मे निकलवाया, जिससे अनुवादक का काम बेकार ना जाए। मृत्यु
से संवाद रखने वाला कवि, अपने अन्तिम समय में बेहद अकेला पड़ गया।
जिन से मन मिलता, उनसे मिलने नहीं दिया जा रहा था, एक यात्रा के
लिए विदा लेने जब मैं गई, वे व्यथित मन से बोले सब कुछ खत्म हो गया,
अब बस भूत काल बचा है। दुबारा मिलने गई तो वे कुछ संभले लगे--- मैने
पूछा कैसे वक्त बिताते हैं, कहने लगे.. सोचता हूँ , चिन्तित होता
हुँ , समय के साथ ढलने की कोशिश करता हूँ । अन्तिम दिनों मे भी वे
अपने बारे में नहीं बल्कि देश की समस्याओं के बारे में बात करना
चाहते थे।
अय्यप्पा चले गए, एक शापित आत्मा बन्धन तोड़ कर उड़ गई। अय्यप्पा नहीं
रहे, एक दरख्त ढह गया। अय्यप्पा चले गए, एक पूरी कि पूरी पीढ़ी अनाथ
हो गई जिसे अय्यप्पा बड़े प्रेम से संवारते थे। सालो सालो पहले लिखी
कविता याद आ रही है...
दरख्तों को ढहना पसन्द नहीं
वे उठते हैं , ऊँचे और ऊँचे
वे फैलते हैं पूरे फैलाव में
वे पाँव पसारते हैं पूरी जमीन में
भरपूर जमीन
भरपूर आसमान
भरपूर आसपास
पूरी तरह भरपूर
जब कभी जमीन करवट बदलती है
आसमान आखिरी बून्द तक पिघल जाता है
आसपास बेगाना बन जाता है
दरख्तों को ढहना पड़ता है
ढहने से पहले

वे पखेरुओं को आशीष देते हैं
लताओं से विदा कहते हैं
पत्तियों को झड़ जाने देते हैं
जड़ों में बिल बनाये साँपों का सिर
हौले से सहला देते हैं
अपने मौन धमाके से
वर्तमान को थर्राते हुए
मुट्ठी भर माटी हाथ में भर
भविष्य में ढह जाते हैं.......
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