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स्मृति--
1
अय्यप्पा पणिक्कर
मैंने तुम्हें जिसके अनुवादों से जाना
वह कल फोन पर रो रही थी
मेरी आत्मा की सीपियों में
भर गए हैं तुम्हारे गीत
तुम जानते हो
कवि की सीपियाँ
मोहताज नहीं होतीं स्वाति नक्षत्र की
ओ! खुरदरे नारियल की तरह
भीतर से तरल कवि
मैंने तुम्हें तुम्हारी
अनुवादक के आँसुओं में
साफ- साफ देख लिया है
तुमने स्वयं भी बादलों के ऊपर से
किसी पंछी को उड़ते नहीं देखा होगा
पर मैंने तुम्हे देख लिया है
कल जब मैं भीग रहा था
तुम्हारी अजानी स्मृतियों से
हालाँकि " दस बजे " शीर्षक से
तुम्हारी कविताओं में मैंने
पहले ही चीन्ह लिया था तुम्हें
पर ये जो तुम
अपनी तरह के "कुरुक्षेत्र" के बीच छोड़ कर
चल दिए उसे
बिना बताए
शायद नाराज होकर
शायद किसी संदेह में पड़ कर
शायद टूट कर आखिरी पत्ते की तरह
शायद समय की विक्षिप्तता से तंग आकर
क्या कहूँ अय्यप्पा!
पहुँचने नहीं देते हो किसी नतीजे पर
तुम्हारी स्मृति में बहाए आँसू
मुझे विकल किए हैं
दुनिया में अभी कितना कुछ बाकी है
जो तय नहीं है
जैसे अजनबी सम्बन्धों के नाम
जैसे हर रात दस बजे फोन पर पूछना
"कैसी हो.."
और रिसीवर रख देना मुखर मौन में
कविता और अनुवाद के बीच
शब्द और भाव के बीच
सुर और लय के बीच
जो चीजें प्रायः छूट जाती हैं
उनका आँसुओं में ढल कर
मोतियों में बदलना
मैंने इससे पहले कभी नहीं जाना

अय्यप्पा !
मैं तुम्हारे इन बीजाक्षरों का क्या करूँ
अनुवाद से परे की दुनिया में
शायद अब तुम भी नहीं रहे
ठीक सुना मैंने कल रात फोन पर
" अब मैं किस से बात करूँ"
अग्निशेखर
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स्मृति-- 2
कई दिनों से एक विकट सी गंध बेहद आतुर कर रही है...इतनी तीव्रता से
कि नसे तड़का जाएँ.. किसी मीठी याद की गंध तो नही? ... या किसी
पूर्वजन्म की? नही ... यह तो बेहद विकट है, पुरातन भी ,
मत्स्यावतार के पहले की........क्या है यह पूर्वस्मृति की सुगन्ध?
... किसी कारण से हवाई अड्डे जाने का मौका मिला.....वही जानी
पहचानी गंध.... मछली की गंध लिए..समन्दर की गंध, उसके हरहराने की
गंध......पागल तो नहीं हो रही हूँ? ...........पास में समन्दर था।
फोन आया... कैसी हो? ...
ठीक हूँ , पर कोई गंध है जो जीने नहीं दे रही।
फोन के पीछे से मुस्कुराते होंठ साक्षात हो उठे। ... पता लगाया,
कौन सी गंध है?
हाँ पता तो लगाया... समन्दर के हरहराने की है।
तो फिर मिल आओ समन्दर से...
लेकिन कैसे, किस के साथ? कोई है जो मेरा पागलपन समझे?इसे पागलपन ही
तो कहेंगे ना?
अकेली चली जाओ, जब समन्दर बुलाता है तो ना नहीं करना चाहिए। ...चलो,,तैयार रहना.. मैं देखता हूँ कि क्या किया जा सकता है.. वह नाराज हो
जाता है, हम लोग तो समन्दर को माता मानते हैं......
चार बजे से कुछ पहले फिर फोन... टैक्सी लेकर आता हूँ..कैमरा भी रख
लेना......गली के बाहर ही मिलना..
टैक्सी आ गई... और कोई नही था... रास्ते भर हम एक शब्द भी नहीं
बोले.... टैक्सी कोवलम के किनारे ले आई.... हम दोनो चुपचाप उतरे और
रेत पर चलते हुए तट पर चले आए... तुम आगे जाओ, कैमरा ले कर.. मैं
यहीं पीछे खड़ा हूँ....
क्यों आप भी आइये..
.नहीं आज समन्दर सिर्फ तुम्हारा है.... मैं तुम्हारे और समन्दर के
बीच बाधा नहीं बनना चाहता हूँ...
सूरज क्षितिज के काफी ऊपर था, मैं चुपचाप फोटो लेती रही और सूरज और
समन्दर को मिलते देखती रही, पता नहीं कितना वक्त बीत गया।
.......कोई और भी है मुझे याद भी नहीं रहा, समन्दर नीला स्याह पड़
गया तो पीछे मुड़ कर देखा, वे खड़े थे, चुपचाप... बिना किसी शिकायत
या उलाहने के।
मैं थोड़ी सकुचाई और लौटने लगी तो उन्होंने कहा.. हो
गया तुम्हारा समन्दर से संवाद.... मैंन मुसकुरा कर कहा हाँ....
अभी तो समन्दर और रंग बदलेगा.... चलो सामने के रेस्टारेंट में चाय
पीते देखते हैं। हम सीढ़ियाँ चढ़ कर सामने रैंस्टारेंट मे गए जिसकी
छत समन्दर की तरफ खुलती थी और डेक पर से समन्दर का मजा लिया जा
सकता था.. हम जिस मेज पर गए उस में एक जने को समन्दर की ओर पीठ
करके बैठना था, उन्होंने समन्दर की ओर पीठ करती सीट को चुना.... अब
फिर मैं समन्दर के सामने थी.... यह क्या ... समन्दर एक दम दिपदिपा
उठा। मानों आसमान से तारे उतर आए हों...असंख्य छोटी-बड़ी नौकाएँ
तैरती हुई किनारे की ओर आ रहीं थीं, हर नौका पर लालटेन रखी थी....
समन्दर का यह नजारा मेरी कल्पना से परे थे। चाय के साथ श्रिम्प खा
कर हम लौट गए.. लौटते वक्त मैं बेहद चुप थी। उन्होंने भी एक शब्द भी
नहीं कहा... मुझे घर पर उतार कर वे अपने घर गए... फोन आया...मुझे
विश्वास है कि कल परसों में मुझे एक अच्छी सी कविता
सुनने को
मिलेगी.....
कल किसी ने कहा आपकी समन्दर पर रची कविता बेहद
छूती है मन को,
शायद मेरे मन को भी --------------मै सोचती
हूँ......
लेकिन क्या मैं अब समन्दर के पास जा सकती हूँ?
र.स.
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स्मृति-- 3
"सर बीमार हैं,
आपकों मालूम है ना, रति जी"-- राधिका ने
किसी कार्यक्रम में मुझे देखते ही पूछा।
"नहीं, मुझे तो मालूम नहीं, काफी लम्बे
वक्त से उनका फोन आना कम हो गया है, मैं तो यही सोच रही थी कि बेटी
की शादी और उसके आसपास की समस्याओं से जूझ रहे होंगे।"-
मैंने जवाब दिया, किन्तु आश्चर्य भी हुआ, क्यों कि आजकल पणिक्कर जी
ने मुझसे एक दो बार "पत्तमणि पूक्कल" के अनुवाद के लिए पूछा था, जो
उनके स्वाभाव के विरुद्ध था। वे अपनी कविताओं के अनुवाद को लेकर
स्वयं कभी भी उत्साह नहीं दिखाते थे। मुझे यह भी मालूम पड़ा था कि
उनका काफी बड़ा आपरेशन हुआ था। मैं यह भी सोच रही थी कि वे उसी की
थकावट से जूझ रहे हैं।
राधिका के कहने पर मैंने पणिक्कर जी से मिलने का वक्त माँगा,
किन्तु इतना आसान थोड़े ही था , उनसे मिलना। उन्होंने हमेशा की तरह
टाल दिया.."अभी रहने दो, मेरी तबियत कुछ
ठीक नहीं हैं, जब ठीक हो जाऊँ तब बात करूँगा।"
मन नहीं मान रहा था, किन्तु बिना पूछे घर जाया भी नहीं जा सकता।
अचानक मुझे आकाशवाणी में रिकार्डिंग के लिए जाना पड़ा। पणिक्कर जी
का घर आकाशवाणी के करीब ही था। मैंने काम खत्म होने पर देखा कि
बारह के आसपास का वक्त है तो पणिक्कर जी को फोन करके कहा कि मैं
आकाशवाणी तक आईं हूँ, आप से मिलने की इच्छा है। पणिक्कर जी ने
हमेशा की तरह टालने की कोशिश की, पर मैंने भरोसा दिया कि मैं बस
कुछ मिनिटों के लिए रुकूंगी। तो उन्होंने आने के लिए कह दिया।
जब मैं पणिक्कर जी के घर पहुँची तो वे करीब दस मिनिट के बाद
वे आए और
कहने लगे कि ऊपर के कमरे में था, सीढ़ियों से उतरने में वक्त लगता
है। मैंने काफी लम्बे अर्से के बाद उन्हें देखा था। उन्हें देख कर
बेहद आश्चर्य हुआ, क्यों कि वे बेहद
कमजोर लग रहे थे। एक बार बैठने के बाद वे काफी लम्बे वक्त तक बात करते
रहे। मेरी कविताओं के लिए पूछा तो मैंने उनसे कहा कि आपने मुझे से
वायदा किया था कि मेरी कविताओं पर विस्तार से लिखेंगे, आप अपना
ख्याल रखिए, और जल्दी स्वस्थ होइये। ( मुझे पणिक्कर जी की बीमारी
की भयानकता के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं थी ) उन्होंने
मुस्कुरा के हामी भरी।

घर आने के बाद मैंने उनकी अन्तिम पुस्तक का अनुवाद शुरु कर दिया।
मैं सोचती थी कि इससे उन्हे कुछ खुशी मिलेगी। कुछ दिनों बाद मुझे
बेटी के पास दिल्ली जाना था, मैंने उनकी कविताओं के अनुवाद के साथ
अपनी कविताओं को भी पुस्तकाकार में
बाँध कर एक प्रति उनके पास पहुँचा दी। जब मैं दिल्ली से चल रही थी
तो मेरे मोबाइल पर एक फोन आया.--"वापिस
लौट आईं?" मैंने कहा
--"नहीं दिल्ली में
ही हूँ," तो फोन
कट गया। मुझे ज्यादा आश्चर्य नहीं हुआ, पणिक्कर जी का स्वभाव ही था
कि अपनी बात कहते ही फोन काट देते थे।
वापिस लौटी तो दूसरे दिन ही एक बेहद करीबी पारीवारिक मित्र का
देहान्त हो गया, वे कैंसर से जूझ रहे थे। उसी भागदौड़ में पणिक्कर
जी का फोन आया --" अपनी मेल चेक की
क्या,, मैने तुम्हारी पुस्तक के लिए फारवर्ड भेजा है।
"
मेल देखा, फारवर्ड था, किन्तु बेहद अव्यस्थित और अधूरा सा, जैसे कि
जल्दी- जल्दी में लिखा गया हो।
बाद में जब मैंने उनके घर में फोन किया तो बड़ीं बेटी ने बताया कि
पिताजी बेहद बीमार हो गए थे, उन्हे अस्पताल पहुँचाया गया। चार- छह
दिनों बाद जब घर आए तो उन्होंने बेटी से कह कर मेरी फाइल मंगवाई और
कुछ काम किया। लेकिन एक पेज टाइप करते ही वे पुनः बीमार हो गए
और
अस्पताल में भर्ती किए गए। मुझे बेहद ग्लानि हुई।
पणिक्कर जी के लिखे अन्तिम शब्द मेरे पास सहेज कर रखे गए हैं,
लेकिन क्या फिर कभी जीवन में मुझे कोई ऐसा व्यक्ति मिल सकता है जो मौत
से जूझते हुए भी अपने वचन का पालन करे?
र.स.
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स्मृति-- 4
एक बार केरल हिन्दी प्रचार सभा के कुछ
पदाधिकारियों के साथ मैं डा अय्यप्पा पणिक्कर जी से मिलने उनके घर
पहुँचा। उन्होंने बड़े स्नेह से हमारा स्वागत किया और पूछा....
.पैदल ही आए है क्या? सभा ने उस साल अपने दीक्षान्त समारोह में डा
पणिक्कर को मानद उपाधि " साहित्य कलानिधि " से सम्मानित करने का
निर्णय लिया था। लेकिन निर्णय की घोषणा से पहले उनकी सहमति प्राप्त
करना आवश्यक थी। इसलिए हम सब उनसे मिलने गए थे।
उनका सवाल सुनते ही मेरे मन में उनकी एक कविता का स्मरण हो आया,
जिसमें उन्होंने ऐसे समाज सेवकों का उपहास किया था जो स्वैच्छिक
संस्थाएँ बना कर उसके लिए जुटाए गए संसाधनों का उपयोग अपनी सुविधा
के लिए करते हैं। संस्था के उपयोग के लिए खरीदी गई मोटर कार में
इठलाते हैं। पणिक्कर जी का आवास सभा के इतने निकट भी नहीं था कि हम
लोग पैदल जा सकें। इसलिए सभा की गाड़ी से गए थे। और गाड़ी थोड़ी दूरी
पर छोड़ कर हम पैदल चले गए थे। हमने सच्चाई छिपाना उचित नहीं समझा
और बता दिया कि गाड़ी बाहर खड़ी है, किन्तु उनके सवाल ने मुझे जितनी
जल्दी हो सके वहाँ से खिसक आने को प्रेरित किया।
के जी बालकृष्ण पिल्लै
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स्मृति-- 5
कूडियाट्टम गुरु
वलियशाला मन्दिर के करीब देवासम
बोर्ड दो कमरे का घर, जिसकी छत बरसात के दिनों में बुरी तरह से चुआ
करती थीं, मैं घर के पिछवाड़े बने छप्पर
में जमीन पर सोया करता ।अलस सवेरे ही
कलरी की कठिन दिनचर्या में लग जाया करता। खुद खाना पकाना, और दिन
भर कलरी और कूडियाट्टम का अभ्यास, मेरे
और पिता के अन्य शिष्यों के लिए बेहद कठिन दिनचर्या थी । यदि कहीं कुछ प्राप्ति थी तो बस नामी-
गिरामी विद्वानों से मिली प्रशंसा। डा अय्यप्पा पणिक्कर, जो मार्गी
के निदेशक अप्पूकुटन जी के मित्र थे, हमारी कला के नियमित दर्शक
थे। हमारी टूटी- फूटी इमारत को देख कर
अय्यप्पा पणिक्कर संदीपनी ऋषि के आश्रम को याद किया करते थे। वे
लोगों से कहते कि यदि आपको यह देखना है कि संदीपनी ऋषि का आश्रम
कैसा था तो कोच्चुकुट्टन चाक्यार के घर कर देख आओ।
मेरा संबन्ध मात्र कला से था फिर भी मैने सुन रखा था कि अय्यप्पा
पणिक्कर जी आधुनिक कविता के प्रणेता हैं। ज्यादातर आधुनिकता का
दावा करने वाले कवि कथाकलि और कूडियाट्टम जैसी पारंपरिक कलाओं पर
ध्यान नहीं देते, किन्तु जी पणिक्कर जी इन कलाओं के ना केवल
नियमित दर्शक बने रहे, बल्कि इनके विकास में भी सहयोंग दिया। वे
कला और कलाकार की स्थिति के लिए पूरी तरह जागरुक थे। जब मैंने
कूडियाट्टम में
मुख्य भूमिका निभानी शुरु कर दी और कूडियाट्टम के बारे में विचार
प्रकट करना शुरु किया तो आपने मुझ से कहा कि "मधु, तुम्हे लिखना
शुरु करना चाहिए, एक कलाकार को कला के बारे में अवश्य लिखना
चाहिए।" उनकी प्रेरणा से
"केरल कविता" में
निरन्तर कूडियाट्टम पर लेख लिखता रहा। यहीं से मैंने कला के बारे
में तात्विक गवेषणा आरंभ की। उन्ही की प्रेरणा से कला की भाषा में
पाश्चात्य परंपरा का खण्डन करते हुए नवीन कलात्मक भाषा- तकनीक का आरंभ
कर सका। कला के क्षेत्र में भी वे अपने हास्य-
व्यंग्य से बाज नहीं आते थे। कहावत है कि--कलाकार
के भाग्य के अनुरूप दिन विशेष की कला- प्रस्तुति होती है,
किन्तु वे कहा करते थे कि -"कलाकार तो
रोज ही प्रस्तुति देता है, हर दिन वैविध्यता लिए कला-
प्रस्तुति होती है। यह तो
दर्शक के भाग्य पर निर्भर है कि उसे किस स्तर की कला देखने को
मिली।"
यूँ
तो पणिक्कर जी जब भी मार्गी आया करते, तो सामान्य दर्शक की कला के
हर कोण पर विचार- विनिमय करते, अपने
विचार भी प्रदर्शित करते थे। किन्तु एक बार जब कूडियाट्टम पर फिल्म
बन रही थी तो मैंने उनसे अनेक बार प्रार्थना की कि वे भी फिल्म में
कूडियाट्टम के बारे में कुछ बोलें, किन्तु उन्होंने साफ टाल दिया।
मैंने अपनी जिन्दगी में अनेक लोगों को देखा है जो केवल किताबी
ज्ञान के भरोसे कला पर बड़ी- बड़ी
चर्चाएँ कर लेते हैं किन्तु पणिक्कर जी तो जानते-
बूझते हुए भी कुछ नहीं बोले, यह इस सन्त की विनम्रता ही थी। आज जब
वे नहीं रहे तो इन कलाओं और कलाकारों की बड़ी हानी हुई है, क्यों कि
कला के बारे में उनकी जानकारी बहुमूल्य थी, वह मौखिक रूप में ही रह
गई, कहीं भी अंकन नहीं हो पाई।
मार्गी मधु---
कूडियाट्टम का विश्वस्तरीय कलाकार
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स्मृति-- 6
डा अय्यप्पा पणिक्कर के
1966 में एक अध्यापक
के रूप में इन्स्टीट्यूट आफ इंगलिश ज्वाइन किया था। उस वक्त मैं एम
ए प्रथम वर्ष की छात्रा थी। उन दिनों अय्यप्पा पणिक्कर अच्छे खासे
खुबसूरत युवक थे, जो साफसुथरी वेषभूषा में कालेज में आया करते थे।
वे अपने विषय के अतिरिक्त बहुत कम बोला करते थे। लेकिन
वे छात्रों से
एक दूरी बनाए
हुए आत्मीय भाव रखते थे। यद्यपि इस वक्त तक वे प्रसिद्ध हो चुके थे
किन्तु विनम्रता उनके चेहरे पर सदा विराजमान रहती थी। उनके भाषण
सारगर्भित किन्तु आडम्बर रहित हुआ करते थे। मुझे उनका शैक्सपीयर
पढ़ाना आज भी याद है। यहीं नहीं शेक्सपीयर की प्रसिद्ध उक्ति उन पर
खरी बैठती थी " एक आँख सोच में लीन, दूसरी मुस्कुराती हुई।"शब्द
उनके लिए खिलौनों के समान थे, जिनका वे बड़ा धारदार प्रयोग किया
करते थे। उनके व्यंग्य को झेलना अच्छो- अच्छो के लिए मुश्किल होता
था। हम लोगों के लिए वे सम्माननीय गुरु थे। हम लोग उनकी क्लास कभी
नहीं छोड़ते थे, दरअसल ऐसा करने की हमारी हिम्मत ही नहीं थी।
अपने समय का प्रसिद्ध नाटककार और फिल्मकार नरेन्द्र प्रसाद पणिक्कर
जी का सबसे ज्यादा प्रिय छात्र था। लेकिन वह भी उनसे सीधे बात करने
में घबराया करता था। पणिक्कर जी के 70 वें जन्मदिन पर नरेन्द्र प्रसाद
ने बेहद प्रभावशाली भाषण दिया था ।
पणिक्कर जी भी
नरेन्द्र प्रसाद को पुत्रवत मानते थे। प्रसाद की असमय मृत्यु ने
निश्चय ही पणिक्कर जी को झकझोर दिया । नरेन्द्र प्रसाद की पहली
बरसी पर पणिक्कर जी ने जो भाषण दिया था, उससे हमे उनके शिष्य प्रेम का
भान होता है।
वे न किसी राजनीतिक गुट से जुड़े थे और ना ही किसी साहित्यिक वाद से।
वे अकेले ही परिश्रम करते रहे, मलयालम को देश- विदेश में पहुँचाने
की कोशिश करते रहे। उनके कार्य पर ना तो अधिक चर्चा हुई और ना ही
कुछ ज्यादा लिखा गया।
ऐसे प्रतिभाशाली साहित्यकार को मलयालम समाज से ज्यादा कुछ नहीं मिल
पाया, किन्तु मैं सोचती हूँ कि अपने शिष्यों को जो उन्होंने
परम्परा दी, उसका पालन हर शिष्य को करना चाहिए।
प्रो राधामणि कुञ्जम्मा
रिटायर्ड प्रिंसपल एन एस एस कालेज
तिरुवनन्तपुम
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स्मृति-- 7
मैं पणिक्कर सर के बारे में जो कुछ बता
रही हूँ वह कोई परम्परागत श्रद्धांजलि नहीं है, यह तो सीधे दिल सी
निकली बात है, मुझे विश्वास है कि पणिक्कर सर इसे पसन्द भी करेंगे,
मेरे लिए उनका आशीर्वाद ही काफी है। उस अधमुंदी बाई आँख ने मुझे
हमेशा ही चीजों को सही ढंग से देखना सिखलाया था। एम फिल के गाइड के
रूप में उन्होंने मुझे दो चीजे सिखलाईं----तुम
किसी भी लेखक को उससे बड़ा या छोटा नहीं बना सकते जो वह वास्तब में
है। इसलिए हमेशा बिना किसी भी पूर्वाग्रह के लिखना चाहिए। दूसरा
उपदेश तब मिला जब मैं किसी अजीब से पाठ से जूझ रही थी। सर ने पूछा-----तुम
कहाँ की हो? आळपुषा से ना? जानती हो
वहाँ की खासियत क्या है? मुझे उलझता देख उन्होंने स्वयं कहा.----वहाँ
के बदबूदार नाले। कहते हुए उनके चेहरे पर व्यंग्यपूर्ण मुस्कान फैल
गई। विश्वास कीजिए इसी सीख ने मुझे एम फिल ए ग्रेड पाने में मदद
की। लेकिन यदि आप यह सोचते हैं कि मैं अपने बेहद खूबसूरत रिश्ते की
बातकर रही हूँ आप गलत हैं।
मैंने पणिक्कर सर से मिलने से पहले ही उनके बारे में काफी कुछ सुन
रखा था। वे हमारे कालेज में भाषण देने आए थे, उनके साथ दो वक्ता और
थे, उनमें से एक ने काफी लच्छेदार भाषा में भाषण दिया। जब पणिक्कर
जी की बारी आई तो उन्होंने सीधे - सपाट
शब्दों में ,बिना किसी भाव- भंगिमा के
बात कही। 17-18 की उम्र में
वक्ता की भाषा और लहजा काफी महत्वपूर्ण होता है। अतः मुझे
उनके भाषण से काफी निराशा हुई, लेकिन जयश्री जो हम सबमें ज्यादा
पढ़ाकू थी कहने लगी.--"ही इस गुड,
" मैं पलट कर जवाब देने ही वाली थी ,
लेकिन सब्र कर लिया। मुझे तब पता नहीं था कि पणिक्कर जी उलझे
व्यक्तित्व के एक हिस्से से परिचित हो रही हूँ। पणिक्कर जी को
दिखावे से नफरत थी। वे सहज व सरल रूप में बात कहना पसन्द करते थे।
हाँ कभी- कभी वे कटु व्यंग्य का प्रयोग
भी कर जाते थे। एक बार हमारी एक मित्र सर के साथ हवाई सफर कर रही
थी, उसने बताया कि जब दिल्ली हवाई अड्डे पर जहाज पहुँचा तो एयर
होस्टेज ने बड़े अफसोस के लहजे में कहा--हम
केवल एक ही सीढी का इंतजाम कर पाए हैं। अतः आप को आगे से ही उतरना
पड़ेगा। पणिक्कर जी तपाक से कहा, आपका बस चले तो आप आधी सीढी से भी
काम चला लें। पणिक्कर जी शब्द शक्ति से पूर्णतया परिचित थे, उनके
व्यंग्य का आधार इस शब्द शक्ति का विविध प्रयोग ही था। मैं कावालाम
पणिक्कर की इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शब्द उनसे डरते थे। बात यह
थी कि वे शब्दों को किसी भी रूप या अर्थ में प्रयुक्त करने क्षमता
रखते थे। लेकिन जब वह यह देखते कि सामने वाले में इतनी क्षमता ही
नहीं कि उनके शब्द प्रभाव डाल सकें तो वे चुप्पी साध लेते।
एक बार कावालाम पणिक्कर का ट्रुप भास के
नाटकों की प्रस्तुति कर रहा था। किसी मिनिस्टर को आकर उद्घाटन करना
था, और इसके बाद अय्यप्पा पणिक्कर को भास पर बोलना था। मिनिस्टर ने
अपनी बुद्धिमत्ता दिखाने के चक्कर में भास पर आधे घण्टे का भाषण दे
दिया। पणिक्कर जी बारी आई तो वे उठे , बोले----
भास.--कुछ सैकण्ड के लिए दर्शकों को
देखा और फिर कहा.----बिगिन्स------सभागार
में हँसी गूँज उठी। दरअसल पणिक्कर जी कला और कलाकार के वक्त की
इज्जत करते थे, साथ ही शब्द शक्ति की भी।

हालाँकि मुझे पणिक्कर जी की कविताएँ पसन्द थी,किन्तु इससे मेरा
उनके प्रति भय कम नहीं हुआ। सर के गुस्से के बारे में अनेक
कहानियाँ प्रचलित थीं। जब मैंने एम फिल में प्रवेश लिया तो पणिक्कर
जी मेथोलोजी पढ़ा रहे थे, उनके पढ़ाने का तरीका बड़ा विचित्र था।
एक बार वे विषय की सही अवतारणा के बारे में बता रहे थे , तो
उन्होंने कहा---- एक शब्द लो.---,
अब इसके सही हिज्जे बताओ। हममे से एक छात्र अध्यापक ने जल्दबाजी
में उस शब्द के गलत हिज्जे बता दिया, सर रुके, उनके चेहरे पर
अज्ञानता का भाव आया, उन्होंने अबोध भाव से पूछा.... डबल एन आयेगा,
पूरा विश्वास है ना?, उस छात्र ने सिर हिलाया। अब सर ने बड़े सरल
भाव से कहा.. हमे सही जानकारी होनी चाहिये, ऐसा करो कि तुम जा कर
लाइब्रेरी में देख कर आओ। अब तक उस छात्र- अध्यापक को संकट का भान
होने लगा था। वह आनाकानी करने लगा। लेकिन सर ने बात
नहीं सुनी। जब वह लाइब्रेरी की ओर गया तो सर ने बड़े
इत्मीनान और हँसी के साथ कहा कि -अब वह जिन्दगी भर यह पाठ नहीं
भूलेगा। सर की आँखों में चंचल हँसी थी। इस घटना ने उस छात्र को
सिखाया या ना सिखाया, यह तो नहीं मालूम, किन्तु हमें शिक्षा दे दी
कि जल्दबाजी में कोई बात मत कहो। एक बार तो मैं भी उनकी हँसी का
शिकार बन गई।
उन दिनों मैं गर्भवती थी, रिसर्च स्कालर्स के कमरे के पास ही
टीचर्स का बाथरूम था। मैंने सर से जा कर पूछाः----
सर केन आई यूज युअर बाथरूम? सर ने तपाक से जवाब दियाः----
आफकोर्स.. और उनकी आँखों में शैतानी चमकने लगीं। मुझे अपनी गलती का
भान हुआ। मुझे मालूम था कि अब कभी ना कभी मुझे व्यंग्य का निशाना
बनाएंगे। बाद में रिसर्च छात्रों से सर
ने मेरी बात कही, मैं बिना देखे ही कह सकती हूँ कि यह बात बताते
हुए सर की आँखों में कितनी चमक रही होगी।
अध्यापक के रूप में वे बड़े कठोर थे। एम फिल के दौरान ही मेरी दूसरी
बेटी आपरेशन से पैदा हुई। मुझे दस दिन अस्पताल में रहना पड़ा। तभी
एम फिल की परीक्षाएँ थीं, मेरे पति ने डिपार्टमेन्ट में जाकर सर को
सारी बात बताईं। सर ने कहा कि कैथरीन जो दो परीक्षाएँ नहीं दे पाई
है, उनके लिए मैं अध्यापक को निर्देश दे दूँगा कि वे दोबारा पेपर दे
दें, बाकी परीक्षाएँ वह अन्य छात्रों के साथ लिख सकती है। डिलीवरी
के ग्यारहवें दिन मैं अन्य छात्रों के साथ परीक्षा लिख रही थी। सर
को भी थियेटर में काफी रुचि थी,इसलिए वे
ही मेरे शोध - पत्र का निदेशन कर रहे थे। मै अपनी तीन महिने की
बिटिया को छोड़ कर सामग्री इकट्ठी करने हैदराबाद
गई। वापिस लौट कर
मैंने सर को रिसर्च कार्ड का एक बंडल थमाया। सर ने शुरु के
4-6 कार्ड
देखे, हर में कोई ना कोई गलती थी। सर ने यह कहते हुए कार्ड
फैंक दिए कि पहले सब ठीक कर के लाओ, उसी वक्त चौकीदार कमरे में
घुसा। मुझे बेहद अपमान महसूस हुआ। मैं
घर जा कर फूट- फूट कर रोती रही और सर
को भला- बुरा
कहती रही। मेरे पति मुझे बड़ी सहानुभूति से चुप करवाते रहे। इस सब
का परिणाम यह हुआ कि मैं शोध पत्र प्रस्तुत करने वालों में प्रथम
थी। उन दिनों बैंक में नया- नया
कम्प्यूटर आया था, मेरी पति उस पर मेरे शोध को टाइप करते रहते।
लोगो ने उन्हे घरघुस्सा कह कर चिढ़ाना भी शुरु कर दिया। मै खुशी-
खुशी अपनी थीसिस लेकर सर के कमरे में पहुँची तो देखा वे अकेले नहीं
थे। मैं चुपचाप उलटे पाँव लौट आई। सर की छटी इन्द्रीय से कुछ भान
हो गया था। उन्होने मुझे आवाज देकर बुलाया। मैंने चुपचाप थीसिस
उनके हाथ में दे दी। वे थीसिस के पन्नों पर हाथ फेराकर मधुरता से
बोले----- इट इस नाइस, इसिन्ट? आई विल
टेक इट। चन्द्रिका बालन ने मेरी और सान्त्वना की दृष्टि से देखा।
इस के बाद मैं सर के घर कुछ पेपेर साइन करवाने गई तो मेरी छोटी
बेटी भी मेरे साथ थी। उसकी उम्र वह थी कि हर चीज उसे खिलौना लगती
थी। उसने सर की दाड़ी से खेलना शुरु कर दिया। सर उसे बड़े दुलार से
कहा----तुमने मेरी आवाज कई बार सुनी
होगी, भीतर से । मैंने तुम्हे
काफी परेशान किया. है ना? उनकी आँखों में वात्सल्य झलक रहा था। तब
मैं समझ पाई कि सर ने मुझे ढील क्यों नहीं दी। जरा सी ढील मिलते ही
मैं आलस दिखा सकती थी, जो मेरे हित में नहीं होता।

मैं पणिक्कर जी को एक साहित्यकार के रूप में याद नहीं कर रहीं हूँ,
मैं उस इंसान की बात कर रही हूँ जिसने छात्रों के हित के लिए अपने
आप को अकेलेपन के आइसबर्ग पर कैद कर लिया था, लेकिन जैसे ही वे
किसी की योग्यता को परख लेते, किसी भी सीमा में जाकर सहायता कर
सकते थे। जो कोई उनके मन को नहीं समझ पाया, उनसे घृणा करता रहा।
यही कारण है कि उन्होंने अपने अन्तिम वक्त में भी अकेलेपन की इच्छा
जताई थी, लेकिन राजनेताओं ने उनकी बात को सम्मान नहीं दिया, यह कहते हुए कि वे जनता के थे,
अतः जनता को अपनी मर्जी से उनका सम्मान करने का अधिकार है।
जो उन्हे जानते हैं उन्होंने इस नाटक में भाग नहीं लिया यह सोचते
हुए कि चलो करने दो इन्हें मनमर्जी।
मेरी खुशकिस्मत है कि मैंने सर को उनके अन्तिम दिनों में नहीं
देखा। मैं उन्हे उसी चुस्त- दुरुस्त व्यंग्यात्मक मुस्कान लिए
याद करना चाहती हूँ। एक बार मैं और मेरी दोस्त नीरदा नसरुद्दीन का
एक नाटक देख रहे थे जिसमें वह टायर के ढेर पर बैठा
भगवान बना हर जीव पर व्यंग्य कस रहा था। उसकी आँखों में वही
चमक थी जो सर की आँखों में होती थी। हम दोनों एक साथ एक दूसरे की
तरफ मुड़े," पणिक्कर सर
"---कहते हुए खिलखिला उठे। जब मैं
यह लिख रही हूँ तो मुझे लग रहा है कि सर मुझे पीछे से देख रहे हैं
और पूछ रहे --- "कैथरीन यह मेरे लिए है या
तुम्हारे लिए?"यदि स्वर्ग की परिकल्पना
सत्य है तो सर अवश्य इस बात को अपने व्यंग्यात्मक लहजे में सेन्ट
पीटर और ईश्वर को सुना रहे होंगे और सब खिलखिला रहे होंगे।
अलविदा सर! अलविदा!
केथरीन तंकम्मा
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श्रद्धांजलि -1
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एक फूल
खिलने के क्षण में
जितना बड़ा सच
झरने के क्षण में
उतना बड़ा झूठ!
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एक झूठ
जो अच्छा लगता है
एक सच
जो दुख देता है
एक झूठा सच
जो सुख- दुख में साथ देता है
जब साथ चाहिए होता है
और नहीं देता है
जब नहीं चाहिए होता है।
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एक चाहत
अन्ततः
जिसके सहारे पहुँचा जात है
मृत्यु तक
अकेले!
अजेय केलांग
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श्रद्धांजलि -2
दस बजे पढ़ते हुए
रात दस बजे खुली होती है पलकें
कि मैं पढ़ रही होती हूँ " दस बजे"
उतरने लगती हैं कल्पनाएँ
बादलों की डोली पर सवार
खुशबू बरसती है
सावन की बून्दों सी
हर शब्द होने लगता है जीवन्त
फैलता है संवाद होकर कविता
मेरे ही आसपास
और जुगनुओं की आँख मिचौनी
पाकर विस्तार
होती है एकशहर
पता नहीं कब
स्याह आसमान की चादर पर
जलते- बुझते वहीं जुगनू
तारे हो टंग जाते हैं अनगिन
शब्द जाल में
गुँथा है
कोई
ब्रह्माण्ड
कोई शहर
या
कोई दोस्त
जिसकी कोई भाषा -
परिभाषा नहीं
वहीं सड़क पर
मरे हिरन को देख
लिखते हो कविता
और दोस्त
चिड़िया का महसूसते
ही दर्द
डूबते उतरते आनन्द में
बरसाती बून्द बन
धूल में बिखर जाते हो
cliकि
तुम जानते हो
अच्छी कविता क्या होती है
शोर होता है इसमें कितना
कि डूबता है दर्द
समूचे समुद्र का
मिल जाते हैं सारे
आरोह - अवरोह के गीत

ओस से भीगी पंक्तियों की नमी
और
फूलों के कंपन को बसा
हर कलम की नोक में
जागते रहे तुम
बैचेन रहा शहर, तुम्हारे साथ, ये उम्र भर!
अरुणा शर्मा
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श्रद्धांजलि -3
* कवि की चिता पर
मेरे ही अविकसित राग से
विकसित होगा बन्धु दिगन्त
अभी न होगा मेरा अन्त!
निराला
यह पहली कविता नहीं है
जिसे अभी- अभी धूल से सनी फाइल से निकाला है मैंने
और भी थीं, जिनकी कोर अभी तक खुली नहीं
मिट्टी की गंध लिए कोरापन बाकी है जिनमें अभी तक
मैंने पहली कविता उठा ली
" अग्नये स्वाहा"
प्रथम आहुति तुम्हारी चिता पर
होने से ना होने की यात्रा इतनी जटिल तो नहीं है?
कल तक तुम यहीं थे
पत्तियों के किनारों पर झाँकती पीलेपन में
मेरी उंगलियों में फँसी कलम में
कागज पर खिंची लकीरों में
पंखे की चक्रवाती हवा में
रसोई में मसाले के डिब्बे में
तुम आज भी यही हो
किन्तु
कलमदान खाली है
रसोई से मसालों की खुशबू खत्म हो गई है
**
" अग्नये स्वाहा"
मैंने दूसरी कविता उठा ली
दूसरी आहुति तुम्हारी चिता पर
समन्दर में किश्ती
किश्ती में जाल
जाल में मछली
एक हत्या, एक मौन
समन्दर के बीचों बीच
तुम्हारा नीला रंग फीका पड़ गया
किश्ती डूब गई
मैं मछली तुम्हारे जाल में
***
यह तीसरी कविता
अन्तिम आहुति अपनी चिता पर
तुम रहोगे यहीं
शब्दों में, ध्वनियों में
साँसों के संगीत में
मेरी यादों के धागों में
अनन्त निरन्तरता में
" अग्नये स्वाहा"

तुम रहोंगे
कविता की पंक्तियों में
जो साथ- साथ लिखीं हमने
यह कविता कृत्या के नवें अंक में
छपी एक लम्बी कविता का अंश है, कविता लिखते वक्तसोचा भी नही था कि
यह श्रद्धांजलि का पुष्प भी बन सकेगी।
रति सक्सेना
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