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अय्यप्पा पणिक्कर की लम्बी कविताएँ-----

मृत्यु पूजा
मन्द गामिनी
हेमन्त यामिनी
घनश्याम रूपिणी
आ जा तू!
नर्म मृदु मर्मर
चारुता सरका
साँझ का राग बुझा
सह्यादि- तीर पर छाया अंधेरा
आ जा तू!
शीतल बयार के
झौंके पर चढ़ कर
दे दे तू
किसलय से अधर दलों पर
ताम्बूल माधुर्य
अंधेरे में झूलते
ब्रह्माण्ड कीट
छिपती मिटती स्मृतियाँ
चिरंजीवी
सप्त ऋषि भी
लीन हुए अंधकार में
आ जा तू , हे घन शैत्य!
आ जा तू , हे अंधकार!
आ जा तू , हे मरण का
अंध- अनुराग!
लिपटा ले तू
भुजंग सी भुजाओं में
चुआ दे मिठ- बोली कानों में
भविष्य, भूत में दिखता
ताल दे सुनेगा
उषा की नीति कथाएँ?
पुण्य जन गुजर गए
भूमि का पुण्य बना अब
मिथ्या पुराण

" मैंने कल के गीत गाए
दे दो मुझे धन"
यह है आजादी का गायक!
चाहे कहीं हो युद्ध
या फिर अकाल
हर किसी पर कविता रच
पैसा बनाता है वह
बहुजन हिताय!
विनय का दिखावा कर
उत्तरीय पर बुनता है
नन्ही सी मुस्कान
यह है धर्म प्रचारक!
" देहं इदं अनित्यं"
इसीलिए दे दो
अपना सुख भी मुझे
वह है प्रेम का पेगम्बर
जंजीरे जो पड़ी पहले पैरों में
वे सज रहीं हैं दिलों में
हे मन्द गामिनी!
हेमन्त यामिनी!
शरद स्वप्न यामिनी!
आ जा तू!
तेरे उग्र शैत्य
परिपाक कप ग्रसते
शीत के विषाणु
यूँ ही मिटते जाएँगे
ऐसे ही बीतेगा
कल्पन्त पुराण कथा का
फिर उपजेगा
एक बगीचा विष पुष्पों से
लदे पेड़ों से भरा
आदमी जिसे
देव ने छला
नाग ने छला
स्त्री ने छला
वेदों को फिर से
तली से निकाल
मत्स्यावतार कथा
अब लम्बी खिंचेगी
बीते काल की शक्ति
यदि फिर से लौटी तो
भोर की किरण नहीं
धूप नहीं , दिन नहीं

आजा, हमेशा के लिए
विश्व शिराओं में
विलीन होने वाली
हेमन्त यामिनी
आजा तू!
धरा चढ़ा रही है
नवरति बाण
थक कर छिपता चाँद
नहीं पिघलताबस मानव मनस
सहिष्णुता से
हर एक जीव की
बस यही चाह
परिपूर्ण श्रम का विराम
अब आ गया
मौन अभीराम
गोद के बच्चे को
राह में छोड़
गोपिका बेचती है कंचुकी
उससे लिपटा
दुखार्द्र विस्मृति विलास
वेद सभी समाएँगे
निर्वेद संधि में
विराट पुरुष का
संकल्प टूटेगा तब
शून्याकार कालिमा
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को निगल
करने लगेगी ताण्डव
कलेजा
करिया जाएगा
अंधकार में डूबेगा
निर्जन निशान्त
सागर मथते हैं
अफ्रीकी भूखण्ड
उस से उफनते जहर में
डूब जाएँगे सागर
एक बजा फिर दो बजे
फिर तीन बजे
मानव इतिहास क्रमेण
बढ़ता गया
क्या होगा इसका अन्त?
जिसे नमन कर
पीछे सरकती सागर लहरें
जिसे हाथ जोड़ती
पहाड़ियाँ
उसी का नाम ले
लड़ते हैं मानव पशु
तलवार घूमाता आएगा
एक कल्कि यहाँ
ब्रह्माण्ड के आरंभ में किए
अपने वायदे को याद कर, तो
घाटी में उतर जाएगा
जंगली हाथियों की तरह
अंधकार पुरातन सत्य
आँख के अस्पताल की
पर्ण कुटीर में
कण्व ऋषि ने

बतलाई एक पहेली
" कल्पान्त निद्रा का
समय आ गया "
अब क्या जरूरत है आँखों की
वे बन्द रहेंगी हमेशा
शंखमुखम के पश्चिमी तट पर
साँझ के बाद निकलता एक दिया
किसी भूमि की जड़े काट
नव आशाएँ झोली में भर
बैठा है वहाँ
किसी उड़न तश्तरी में
वह ये बीज बोयेगा
क्या फसल काटने की
करुणा लिए?
मैंने अपने तम्बूरे की
उच्च श्रुति की
प्रत्यंचा बनाई
शिरा तंन्त्र बजाने के लिए
जलते दीप को
फूँक कर बुझाते
फिर रोशनी के लिए
चिल्लाते
आदमी की आवाज
बुझ गई
आज बस सुनाई दे रहा है
यही निवेदन
सिसकती सीता छिपी थी
जिस जमीन में
उसी की गहराई से
उठता है प्रणव मन्त्र
"मृत्यु मृत्यु जय मृत्यु मृत्यु"
लेकिन
स्वर्ग जाते समय
दाशरथी ने
माँगा था बस इतना ही
" राक्षस राज ने
किया ताण्डव मेरे हृदय पर
शीघ्र लौटा दो
मेरी वैदेही अपने उदर से
(अय्यप्पा
पणिक्कर की अन्य लम्बी कविताएँ)

कवि की कुछ प्रसिद्ध
कविताएँ
( दिन - रात
और
पैसेज टू अमेरिका से )
पहाड़ों और नदियों ने
मुझसे क्या कहा?
" स्वार्थ ही दुख है।"
महायुद्ध ने भी यही कहाः
तेज अंधड़ और चीखों वाली
काली रातों में
असहनीय दुखभार से
मैं फूट- फूट कर रोया बच्चे
लेकिन
अतिशान्त नव प्रभात होने पर
संसार की सारी परछाइयाँ
मुझमें ही इकट्ठीं हो गईं
अपने को भूल कर लेटने पर
ही तो, बच्चों
मैंने जाना कि सुख क्या है।
यही तो वेदान्त है न प्राचीन?
इसके बारे में
इसके बारे में न जाने कितने शास्त्र लिखे मैंने
इससे ज्यादा इसका मूल्य ही क्या?
पहाड़ों , नदियों
और महासमुद्र ने
चुप्पी धारण की
जो सीखना चाहिए
उसे सिखलाया नहीं जा सकता
यह बात वे याद रखेंगे।
****************
रक्त मांस से बनाया गया वह गोपुर.......
कितनी जल्दी यादों की बाँबी बन गया।
कल, कल ही शरदकालीन
संध्या पैदा हुई और मर गई उसे देखने को
तेरी कार में पंख लगाकर उड़ेंगे हम दोनों
बड़े पर्वत की तलहटी में तालाब के किनारे
चिनार के पेड़ सुनहरी शोभा ओढ़ कर
हमें देखते हैं.........संसार नाच देखा
हाथ थाम कर चले हम, पेड़ों में
छिपे पंछी चहचहाए, हमने
एक निमिष को संध्या को टटोला
होंठों की चोंच मारमार कर बिखरा दिया
जब रस को घूँट घूँट कर पिया तो..
कबूतर बने हम, गिद्ध बने हम
उसे देखने को सारी प्रकृति का
सौन्दर्य ही सत्य बना हमारे लिए
वर्तमान के भीतर घुसे हम
भूत और भविष्य के बिना
बिना समय बिताए, बिना रुके
नित्यता को शरीर में लपेट कर
नृत्य किया हमने। प्रिये संध्ये, कहा मैंने
" भारत में काल अनन्त प्रवाह है
आज हमने देखा है महापर्वत
और महागंगा को एक साथ लिपटे हुए
जीवन दृष्य है उनमें
आनन्द केवल एक संगति
यह भूल कर मानव ने संध्या के
दिन और रात में टुकड़े कर दिए
व्चना बना दिया मानव जीवन के
संगीतानन्द को , चार आश्रमों को
चार हजार रूपों में देख कर
सबकों नानाविध बनाया, नई पीढ़ी
शायद पीछे मुड़ करबीते समय की
सुकृतियाँ ले लेगी...." तू मौन खड़ी रही
चौंक कर जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो
सब कुछ छिप गया गहरी छाया में
.....अंधकार ने डुबो दिया सबको।
सब कुछ भूलभाल कर माफ ही करना था
तो किसलिए अपने समृति चिह्न दिए मुझे।

( कवि
की कुछ प्रसिद्ध अन्य कविताएँ )
कुरुक्षेत्र
एक --(कुछ अंश)
क्षितिज के पार के ताप!
स्फोटन से जन्मे ओ तारे!
तू चढ़, ऊपर चढ़ , जिससे
जमीन की रगे तड़कें
खूँ चूने लगे आसमान से!
ओ मेरी जिन्दगी के प्रेम तारे!
देख नीचे देख, यही है
मेरी दुनिया, हम मृत्यों का
रंगमंच, क्या तू सुन सकता है
हँसते गाते हम लोगों की
पीड़ाओं के मौन गीत?
तू देख, धलका अपनी आँखों से
आँसुओं के कतरे, रोशनी की बून्दें
इसी राह पर देखेगा तू
मनुष्यों की कल्पना से सजी
विशिष्ट सृष्टि भीड़- भड़क्के वाली
बड़ी सी हाट है दुनिया
माल ढ़ोकर सौदागर आते हैं
मोल लगाते खुद को
मौल-भाव करते, आँखें पीती
आँसू, शिराएँ सुड़कतीं उबला खून
मज्जा चूसती है कंकाल कुतरता खाल
जड़े खींच लेती हैं फूल
माटी निगल लेती है पैदावार
हम मर्त्यों की हँसती खेलती
दुनिया को देखेगा तू नीचे से,
मंत्रोच्चारण से पवित्र
आधार दीप की जलती शीतल लौ में
उभरते पिघलते, वेदि पर स्थित
वेदना का विलाप, तू सुन!
सुखं देहि ऋषिकेश
सुखं देहि जनार्दन!
मन्दिर मस्जिद महल और गिरजाघर
अपने पैने सिरों से चीरते
आदमी का सीना, खेलते दिलों से
खिलखिलाते खुश होते
इसी आस्मां के नीचे
आँखे फोड़ पकड़ा देते
वेद चश्मा, मंत्र बुदबुदाते हुए
निगाहों की नोकों से
सूलियाँ घोंपते जाते।
गिरजाघर में लबालब भरा
आस्तिकता का जल, उबल उबल
बहता हुआ शुद्ध कर रहा है कारखाना
जिन्दगी की शस्त्र क्रिया जारी है,
तरह- तरह से।
(कुरुक्षेत्र के कुछ अंश)
दिन - रात
सितम्बर --4
मन उचाट और अनमना
चिंतन ही एक तंत्र
फिर भी
संध्याएँ बहती हैं जहाँ, ऐसे राजमार्गों पर
राते टटोलती है जिन्हें, ऐसी गन्दी गलियों में
आदमी का चिन्तन
अनथक अश्रान्त खोजती फिरती।
यह उचाटपन ही मिट जाए तो
जिन्दगी भी मिट जाए।
यह भी एक तन्त्र मन्त्र हो सकता है
सितम्बर --5
कल गली के
मुहाने पर, धुँधली पड़ती
साँझ की चमक वाले चौराहे पर
चिंता के जाल में
फँसे हुओ को
देखा मैंने..... "इण्डियन्स" को।
ये ही असली इण्डियन्स
आजकल आतिथेया
बोली, होंठों पर स्त्री सुलभ
फेनिल चंचलता थिरकी,
गोरे ने लाल को
या लाल ने गोरे को
किसने मारा? किसको?
भूत ने वर्तमान को मारा।
दो लोक, दो काल दुख के
दो द्वीप, दो दीप, परकटे
दो पंछी, दो रंग..आज की यह
संध्या टपका रही है उनका लहू!
( दिन रात से कुछ अंश आगे )

मेरी दीवार पर
इन तस्वीर को देख, जो मैंने अपनी दीवार पर
अपने हाथों खींची हैं
घूर क्यों रहा है?
मूर्ख! ध्यान दे,
नाभि से नैनो से
खिचती नाड़ियाँ
खोपड़ी में प्यास से तड़कती हैं
सुलगती है
मरे हुए ज्वालामुखी सुलग उठते हैं
ताम्र स्वप्न जल जल कर बहते हैं
चारों ओर
जमे हुए आँसुओं के बिना
कान बन्द किए बिना
चमक रही है रक्त वाहिनियाँ
यह सृष्टि है या संहार?
इन तस्वीरों को देख , जो मैंने अपनी दीवार पर
अपने हाथों से खीची हैं
घूर क्यो रहा है?
मूर्ख ! ध्यान दे।
(मेरी
दीवार पर पुस्तक से अन्य कविताएँ)
दस
बजे
मौज मस्ती

वहाँ दूर एक जंगल है,
दूर, काफी दूर
हम चले वहाँ?
एक झोपड़ी छा
वही क्यों नहीं बस जाएँ !
बाँट लेंगे हम
धूप और छाँव
तेरी देह पर चढ़गी
जंगल की हरियाली
मैं देखूँगा
पंछियों के गीतों को
टहनियों से छन नीचे
आते देखेंगे
हम दोनो
नदियों की लहरें
तलवों के नीचे
सनसनाते देखेंगे
चलों, हम चले दोस्त!
मौज मस्ती में?
प्रगतिशील हँसी बनाएँगे
कहेंगे कि
पुराना पलायन वाद है
कोई बात नहीं
हम उन्हें भी साथ ले लेंगे
रहेंगे मौज मस्ती से
ठीक है न?
अन्तिम
जब भी हम रूठेंगे
आपस में
हमे जरूरत पड़ेगी
तीसरे कमरे की
सोने के लिए
किस तरह सजाएँगे हम उसे?
मुझे याद है सारी कहानियाँ
जो तुमने सुनाईं थीं
अन्तरंग पलों में
आज भी याद हैं
आखिर वक्त शायद
विदा कहने का वक्त ना मिले
इसीलिए
अभी ही शुभयात्रा

(दस
बजे
से कुछ अंश आगे)
गोत्रयान से कुछ अंश
कल सूरज उगते ही
निष्क्रमण करेंगे उस ओर हम
बाँया पग भूले बगैर
दाया पग आगे कर
पूरब में रख दीठ
मन को बढ़ना होगा आगे
विकसते दुखों को
अपनी पूंजी समझते हुए
डगमगाएँ नहीं डग हमारे
यहाँ से निकलते हुए
दूर बहुत दूर जा पहुँचने पर
लेंगे विश्राम हम
घबराना नहीं
पक्के कलेजे हैं हमारे
वृक्ष छाल अजछाल फिर
लेनी होगी मृग छाल भी
उसमें है जो अक्षर ज्ञान
आशा वही है भविष्य की।
( तृष्णा)

(गोत्रयान से कुछ अंश
आगे)
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