गजानन माधव मुक्तिबोधः‍‍ एक ऐसा नाम है, जिसने हिन्दी कविता को एक चेहरा दिया। मुक्तिबोध  एक ऐसे कवि है  जिन्होंने कविता को दिशा दी ‌और कविता की  विकास- यात्रा को जारी रखा। मुक्तिबोध को पढ़ते हुए महसूस होता है कि समाज से जुड़े रह कर ही नहीं, उसका हिस्सा बन कर लिखना क्या होता है, मुक्तिबोध ने हमे सिखाया कि कविता करों तो दिल खोल कर करो, आज जब हम फिर से अपने- अपने दड़बे में पैठते जा रहे हैं तो मुक्तिबोध को पढ़ना जरूरी हो गया है। यूँ तो मुक्तिबोध की अनेक कविताएँ जिन्हे पढ़ना चाहिए, किन्तु मैं एक ऐसी कविता प्रस्तुत कर रही हूँ जो आज भी हमसे संवाद रखना चाह रही है।




भूल- गलती

भूल - गलती
आज बैठी है जिरहबख्त पहन कर
तख्त पर दिल के,
चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,
आँखे चिलकती हैं नुकीली तेज पत्थर सी,
खड़ी हैं सिर झुकाए
                 सब कतारें
                          बेजुबाँ बेबस सलाम में,
अनगिनत खम्भों व मेहराबों -थमे
                                     दरबारे आम में।

सामने
बेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटा
चेहरा
कि जिस पर काँप
दिल की भाप उठती है........
पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद
समूचे जिस्म पर लत्तर
झलकते लाल लम्बे दाग
बहते खून के।
वह कैद कर लाया ईमान...
सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,
बैखौफ नीली बिजलियों को फैंकता
खामोश!!

                                           सब खामोश

मनसबदार
शाइर और सूफी,
अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरुनी
आलिमी फाजिल सिपहसालार, सब सरदार
                                                 हैं खामोश!!
नामंजूर
उसको जिन्दगी की शर्म की सी शर्त
नामंजूर,
हठ इनकार का सिर तान..खुद-मुख्तार।
कोई सोचता उस वक्त-
छाये जा रहें हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,
सुलतानी जिरहबख्तर बना है सिर्फ मिट्टी का,
वो -रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,
शाही धाक का अबब सिर्फ सन्नाटा!!
( लेकिन, ना
जमाना साँप का काटा)
भूल (आलमगीर)
मेरी कमजोरियों के स्याह
लोहे का जिरहबख्तर पहन, खूँख्वार
हाँ खूँख्वार आलीजाह,
वो आँखे सच्चाई की निकाले डलता,
सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता
करता, हमें वह घेर
बेबुनियाद, बेसिर-पैर....
हम सब कैद हैं उसके चमकते तामझाम में
                                                      शाही मुकाम में!!
तने में,  हमीं में से
अजीब कराह सा कोई निकल भागा
भरे दरबारे-आम में मैं भी
सँभल जागा!!
कतारों में खड़े खुदगर्ज-बा-हथियार
बख्तरबन्द समझौते
वहमकर, रह गये,
दिल में अलग जबड़ा, अलग दाढ़ी लिए
दुमुँहपने के सौ तर्जुबों की बुर्जगी से भरे
दड़ियल सिपहसालार संजीदा
                                                          सहमकर रह गए!!

लेकिन, उधर उस ‌और
कोई, बुर्ज के उस तरफ जा पहुँचा,
अँधेरी घाटियों के गोल टीलों , घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया
महसूस होता है कि यह बेनाम
बेमालूम दरों के इलाके में
(सच्चाई के सुनहले तेज अक्सों के धुँधलके में)
मुहैया कर रहा लश्कर,
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,
हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट होकर विकट हो जाएगा!!
 

 

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