मैं कृत्या हूँ
कृत्या - मारक शब्द शक्ति,
कृत्या - जो केवल सच के साथ चलती हो,
कृत्या - जो पूरी तरह सही का साथ देती हो ।

 
 
 

कभी -कभी मुझे लगता है कि हम सब नीरो तो नहीं हो गए? रोम जल रहा है और हम बाँसुरी बजा रहे हैं। आजकल हम जिस सहजता से बड़ी बड़ी दुर्घटना को झेल जाते हैं, मुझे डर लगता है कि हम किधर जा रहे हैं। टी.वी. के सामने डटे लोग खाना खाते वक्त सब तरह के दृश्यों को जिस निर्विकार भाव से देखते रहते हैं, मुझे संवेदनाओं के खत्म होने का भय सता रहा है। भय तो बहुत से हैं, यानी कि जिस तरह कपड़े उतारे और लादे जा रहे हैं ,जिस तरह से झूठी दार्शनिकता से अपनी संवेदनाओं को सुलाया जा रहा है, जिस तरह से शान्ति के नाम पर युद्ध हो रहे हैं, वह सब भयानक भविष्य का सूचक है।
और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि कविता इस बारे में कुछ अजीब सी चुप्पी धारण किए है। तभी मुझे अफ्रीका में रहने वाले कवि मित्र यूप बर्सी का खत मिलता है, उन्होंने कुछ लिखा है, जिसे वे कविता तो नहीं मानते पर कुछ जरूर है जो कविता में होना चाहिए।

रति सक्सेना
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औरते रोती हैं
 बच्चे होने पर भी
बच्चे खोने पर भी
बिछुड़ने पर भी रोती हैं
तो मिलने पर भी
गाने की रस्म है इनके जिम्मे
तो रोने की भी
कोई भी जिए या मरे
ये गाएंगी ही
ये रोएंगी ही
औरते रोती हैं
अपनों पर
सपनों पर
जिन से नहीं कोई नाता
ऐसे बैगानों पर

सुदर्शन वशिष्ट

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इस पीठ पर हाथ फेरों
तो कोई भी सुन सकता है
दबी हुई सिसकियाँ।

इतना सब कुछ होने के बावजूद
यह पीठ बड़ी हो रही है
यह पीठ चौड़ी हो रही है
यह पीठ ज्यादा बोझा उठाना सीख रही है।


सुरेश सेन निशान्त

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कालिदास के बाद यदि किसी ज्ञात कवि की सृजन- प्रक्रिया से उज्जयिनी को काव्यात्मक गरिमा और महत्व है तो वे एक मात्र मुक्तिबोध ही है। यह मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ और सृजन प्रक्रिया के सन्दर्भ में ही कह रहा हूँ। मुक्तिबोध ने उज्जैन पर कोई कविता नहीं लिखी है। जबकि महाकवि रवीन्द्र से लेकर सुमनजी, श्रीकान्त वर्मा सहित कई ख्यात प्राप्त कवियों ने अवन्तिका पर कविताएँ लिखीं हैं।
जब भी मुक्तिबोध की प्रामाणिक जीवनी उनके साहित्य के सन्दर्भों सहित लिखी जाएगी तो उसमें दोनों उज्जैनों का बहुत बड़ा हिस्सा होगा। एक उज्जैन वह जिसमें रहते हुर तरह से वयस्क होते मुक्तिबोध ने न केवल अपने सृजनात्मक पंख फैलाए बल्कि देखने- सोचने को गहरा करते हुए अपने तर्कों को भी पैना करना प्रारंभ किया। दूसरा उज्जैन जिसमें मुक्तिबोध पर मंडराता रहा और नागपुर राजनान्दगाँव से मुक्तिबोध की कविताएँ जिस पर झपट्टे मारतीं रहीं ।

चन्द्रकान्त देवताले
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*सामने
बेचैन घावों की अजब तिरछी लकीरों से कटा
चेहरा
कि जिस पर काँप
दिल की भाप उठती है........
पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा कद
समूचे जिस्म पर लत्तर
झलकते लाल लम्बे दाग
बहते खून के।
वह कैद कर लाया ईमान...
सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,
बैखौफ नीली बिजलियों को फैंकता
खामोश!!
सब खामोश

मनसबदार
शाइर और सूफी,
अल गजाली, इब्ने सिन्ना, अलबरुनी
आलिमी फाजिल सिपहसालार, सब
सरदार
हैं खामोश!!
नामंजूर
जिन्दगी की शर्म की सी शर्त
नामंजूर,
हठ इनकार का सिर तान..खुद-मुख्तार।
कोई सोचता उस वक्त-


गजानन माधव मुक्तिबोध

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महासागर

देह ज्यादा पवित्र है, लहर से
नमक किनारों को धोता है
और चमकीला पक्षी
अपनी जड़ों के बिना उड़ रहा है

( Oceano)

सागर

एक अकेला प्राणी, परन्तु लहु नहीं है
एक अकेला प्यार, मृत्यु या एक गुलाब
सागर आ कर जोड़ देता है आपस में हमारे जीवन
और वह अकेला प्रहार करता है एवं विस्तृत हो जाता है
रात भर और दिन भर, मनुष्य व जीव
सारः अग्नि एवं शीतः गतिशीलता


पाब्लो नेरुदा

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VOL -  II/ PART -VII


 (दिसम्बर-
2006 )

संपादक :  रति सक्सेना


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