मेरी बात,

कभी -कभी मुझे लगता है कि हम सब नीरो तो नहीं हो गए? रोम जल रहा है और हम बाँसुरी बजा रहे हैं। आजकल हम जिस सहजता से बड़ी से बड़ी दुर्घटना को झेल जाते हैं, मुझे डर लगता है। टी.वी. के सामने डटे लोग खाना खाते वक्त सब तरह के दृश्यों को जिस निर्विकार भाव से देखते रहते हैं, मुझे संवेदनाओं के खत्म होने का भय सता रहा है। भय तो बहुत से हैं, यानी कि जिस तरह कपड़े उतारे और लादे जा रहे हैं, जिस तरह से झूठी दार्शनिकता से अपनी संवेदनाओं को सुलाया जा रहा है, जिस तरह से शान्ति के नाम पर युद्ध हो रहे हैं, वह सब भयानक भविष्य का सूचक है।
और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि कविता इस बारे में कुछ अजीब सी चुप्पी धारण किए है। तभी मुझे अफ्रीका में रहने वाले कवि मित्र यूप बर्सी का खत मिलता है, उन्होंने कुछ लिखा है, जिसे वे कविता तो नहीं मानते पर कुछ जरूर है जो कविता में होना चाहिए।

"Why I Continue to Disbelieve in the War in Iraq"
Because innocent people are being killed.
Because fathers and mothers want their children to have a life.
Because fathers and mothers don't want their children to die a heroic death.
Because a friend lying dead in a coffin is not what your dear ones want to see.
Because war creates more war.
Because war creates extremism.
Because extremism kills.
Because killing is wrong.
Because being proud of the left leg and a few fingers of your son in a coffin killed in combat doesn't make sense.
Because killing to make this planet a safer place is a lie.
Because sending soldiers to a second Vietnam is a crime.
Bacause the wounds of Vietnam are still raw.
Because there are still dead soldiers in Vietnam waiting in vain for peace and affection.
Because some will never touch American soil again.
Because many of those killed were literally blasted to pieces by bombing.
Because people are still being killed today in Vietnam by unexploded ordinance, particularly cluster bomblets.

मुझे लगता है कि इस बार मैं बस हम चुप रहे, सोचे, आत्म मंथन करे बिना बड़ी- बड़ी बातें बघारे.....
इस अंक में मुक्तिबोध पर चन्द्रकान्त देवताले जी का चिन्तन और मुक्तिबोध की कविता इसी उद्देश्य से दी गई है। अग्रज में हम पाब्लों की प्रेम कविताओं को भी सोद्देश्य लाएँ हैं। पेरी की कविता पर चिन्तन जारी है। समकालीन कविता में, इस बार कुछ नए कवि फिर से हाजिर हैं।
हमारे युवा साथी विजेन्द्र ने खूबसूरत चित्र दिए हैं, और रेखांकन दिए हैं छत्तीसगढ़ के संगीतकार, चित्रकार अविनेस कोसे ने।
मित्रों हमे याद रखना है कि आत्ममंथन की प्रक्रिया जारी रहे।
शुभकामनाओं सहित
रति सक्सेना

Letters to editor
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