पेरिया परसिया, सेतारह या पेरि, नाम कुछ भी हो, कहानी एक ही है। कुछ दिनों से, या कहिए कि करीब एक दो महिने से मेरी वेब पत्रिका के पते पर एक संवाद आरंभ हुआ, संवाद करने वाली ने अपना नाम सेतारह बताया, जो शायद परशियन भाषा का नाम है, शायद इसे ही हिन्दी उर्दू में हम सितारा कहते हैं। ई मेल की सबसे बड़ी दुविधा यह होती है कि हम ना तो पत्र लिखने वाले के बारे में जान पाते है और ना ही यह पता लगा पाते है कि यह किस देश का है, ( विशेष रूप से यदि पत्र yahoo से आया हो )
पत्र का आरंभ कृत्या की प्रशंसा से हुआ, लेकिन कुछ दिनों बाद एक बेहद घबराया सा पत्र मिला, जिसमें लेखिका ने अपनी एक मित्र की कहानी लिखी जिसने अभी अभी पागलखाने में आत्महत्या कर ली, और उसका कसूर यही था कि उस महिला ने जो कि एक अच्छी कवि थीं, एक ऐसे कवि से मुहब्बत की जिससे वे कभी मिली नहीं थीं। मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि ये कवि ऐसे समाज से ताल्लुक रखती हैं जहाँ औरतों के आजादी की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पत्र -लेखिका ने बताया कि मरने से पहले कवि मित्र ने कुछ पत्र पागलखाने की एक नर्स को कुछ पत्र दिए थे. जो काफी कुछ कविता से लगते हैं। उन्होंने मुझ से आग्रह किया कि मैं उन पत्रों को कृत्या में जगह दूँ, जिससे लोगों को पता लगे कि औरतों को आज भी कितना सहना पड़ता है। लेकिन सबसे बड़ा आग्रह यह था कि ना तो पत्र लेखिका का असली नाम दिया जाएगा, ना ही कवि का, नहीं तो कवि के परिवार को खतरा हो सकता है। मुझे लगा कि नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है कविता ‌और उस ‌औरत का दर्द, जो उसकी तरह ना जाने कितनी ‌औरतों के दर्द की व्याख्या कर रहा है। जब कविता मिलीं तो कुछ पलों के लिए मैं सन्न रह गई, क्यों कि उन खतों में जिस हद तक प्यार भरा था, उससे कहीं ज्यादा आक्रोश था। जितना पागलपन था तो उतनी ही समझदारी। समझ में नहीं आया कि यह पागलपन सच है या झूठ, मेरे भीतर के संपादक ने कहा कि सच औ‌‌र झूठ के परे यह एक पुकार है.. वही जो कभी हमारे देश में मीरा की थी, वही जो हब्बा खातून की थी, ना जाने कितनी स्त्रियों को जो अपने दीमाग को मर्दों की तरह इस्तेमाल करने लगती हैं, जो मर्दों के लिए निर्धारित सीमा रेखा के भीतर घुसने की कोशिश करती हैं। ये खत नुमा कविताएँ मुझे अंग्रेजी में मिलीं।

मेरे संपादक मंडल की एक सदस्या ने इसकी भाषा की ओर आपत्ति भी जताई, किन्तु मैंने सोचा कि आक्रोश की शब्दावली की समीक्षा करना समीचीन नहीं है। महत्वपूर्ण बात कविता का विषय भी नहीं है, क्यो कि प्रेम कविताओं की कहीं कोई कमी नहीं। फिर क्या बात है जो कविता को अलग बनाती है.. क्या सामाजिक प्रतारण..अरे नहीं यह बाते तो हम आए दिन टीवी में देखते रहतें हैं। यानी कोई बात है जो विषय, भाषा, समाज से परे रख कर भी कविता को पहचान देतीं हैं। मुझे लगता है कि इसी को कविता कहते हैं --जो अपने होने की या होने के कारणो की व्याख्या न करते हुए भी पाठकों को आकर्षित कर सके।
मुझे लगा कि हमारे देश के पाठकों को भी इस तरह की कविता को पढ़ना चाहिए. इसलिए मैं इन कविताओं का हिन्दी में अनुवाद करने लगी, और अनुवाद की प्रक्रिया में ही मेरे भीतर का आक्रोश शक्ल लेने लगा। बस यही पर कविता प्रतिक्रिया शुरु हो गई। ‌यही पर मेरा पेरि से संवाद स्थापित हुआ।
कविता के आरंभ में ही पेरि ने पाँचवी दीवार की बात की है‍ --

वे कहते हैं कि
वे हाथ बाँध देंगे मेरे
पलंग के सिरहाने से
यदि मैंने दीवारों पर
सिर पटका

उन्हें प्यार है दीवारों से

मैं बन्द हूँ
पांच दीवारों वाले
एक सफेद ठण्डे कमरे में
जहाँ कोई खिड़की नहीं
हवा के लिए

उन्हे नफरत है खिड़कियों से

छत और दीवार में अन्तर है, जहाँ छत सुरक्षा का अहसास दिलाती है, वहीं दीवार बन्धन का, खिड़की इस बन्धन को ढीला करने की कोशिश है, जबकि छत हुआ छेद सुरक्षा को भी तोड़ता है। लेकिन पेरि अपने को पाँच दीवारों वाले, बिना खिड़कियों वाले कमरे में कैद पाती है। यह उस घुटन की पराकाष्ठा को प्रतिबिम्बित करता है, जिसे आज भी कई महिलाएँ महसूस कर रहीं हैं। पेरि की छत उसके कंधे पर इस तरह टिक कि उसका बोझ कंधों पर नहीं दिल पर पड़ने लगा है। जब औरत सुरक्षा को बोझ समझने लगती है , तब उसकी चेतना पूरी तरह से चेतन होती है, लेकिन यह कविता पागलखाने से आई है, इसका मतलब क्रूरता की ओर एक ‌और कदम है।

कमरे की पाँचवी दीवार मेरी छत है
यह दीवार सरकाई जा सकती है
इसका बोझ मेरे कंधों पर टिका है
जिससे मेरे दिल और इसकी दूरी

पेरी को हवा साँस के लिए नहीं, बल्कि इसलिए चाहिए कि वह उसके बाल सहला सके। हवा में बाल लहरा ना पाने का कष्ट उस औरत के लिए कष्टकर है जो भावों की खूबसूरती को महसूसती है।

मैं अकेली पत्ती, पितलाई हरी
पत्तियों की तरह, मुझे दरकरार होती है
ताजी हवा की, यदि विश्वास नहीं उन्हें
मेरे क्लोरोफिल पर तो
एक पागल औरत को भी जरूरत है
हवा की, जो उसके बालों को सहला दे

वे परागकणो से युक्त हवा को प्रदूषित कहते हैं

हाँ पेरि की भाषा में औरत एक पत्ती की तरह है, जिसे क्लोफिल नहीं मिला तो पीली पर जाएगी, झड़ जाएगी। क्या है यह क्लोरोफिल? आजादी? .. आवारागर्दी.. नाजायज संबन्ध..... या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? जी हाँ पेरि बस एक चीज चाहती है, ‌और वह है..कागज और पैंन्सिल, लिखने की ताकत.. यानी कि बेबाक अभिव्यक्ति...

मुझे नहीं चाहिए सिगरेट
नहीं चाहिए सूरज की रोशनी
नहीं चाहिए मुझे आजादी

बस कह दो उन्हे कि
दें दे मुझे कागज और कलम
जिससे मैं बात कर सकूँ अपने आप से
..............................

कह दो उनसे कि वे दे दें मुझे बस एक कागज और कलम
जिससे मैं बुन सकूँ एक खूबसूरत प्रेम कविता
मेरे प्यार की आत्मा के लिए, सर्दियाँ करीब आ रहीं है।

सर्दियाँ करीब आ रहीं है।

प्यार औरत के लिए एक जीता- जागता साथी है, वह साथी जिसकी एक आत्मा भी होती है, और कागज वह देह है, जिसपर यह प्यार देह धारण करता है। कवि के लिए अकेलापन ही आजादी है। उसके लिए भीषण सर्दी से बचने के लिए एक प्रेम कविता ही काफी है । तभी तो पेरि अपने उस प्रेम से जीवन रस पाती रही जिसे उसने देखा तक नहीं था। लेकिन समाज का बन्धन मात्र देह पर हो तो चल सकता है, किन्तु वह तो आत्मा को भी बन्धन में रखना चाहता है ..

हूँ मैं यहाँ?

क्यों कि मैंने एक आदमी से प्यार किया
जिससे मैं कभी मिली तक नहीं?

क्यों कि मेरे और प्यार के बीच ऐसा कोई पुल नहीं
जो दिखाई दे, सिवाय कविता के?

क्या इसलिए कि मैं पक्की व्यभिचारिणी हूँ
स्वप्न युक्त सपनों को बुनती हुई?

कोई भी विश्वास नहीं करता मुझ पर
सिवाय इस गुलाबी गोली के

जो उनके कानून और धर्म के अनुरूप
मेरे दिल की क्रूर धड़कनों को वश में रखती है

कौन सा कानून है जो दिल की धड़कनों को भी वश में रखना चाहता है? कौन सा कानून है जो कवि को कवि बने रहने से रोकता है। पेरि की कविताएँ ऐसे तमाम सवालों को रखती हैं जिनका सम्बन्ध मात्र व्यक्तिगत सामाजिकता से नहीं, बल्कि कविता से भी है। क्या एक कवि को प्रेम महसूस कर, उसे शब्दों में ढालने की मनाही हो सकती है, सिर्फ इसलिए कि वह स्त्री है?

पेरी की कविता में जो बात अद्भुत है, वह है चींटी की मौत पर  उसका विलाप, यह विलाप हमे उस लोक में ले जाता है जो आज की युद्ध विभीषिका के सामने सवाल रखते हैं। मौत किसी की भी हो, चाहे चींटी की या फिर बच्चे की, मौत कैसे भी हो, नर्स के सैन्डल की एड़ी, या फिर अमेरिकन बमवर्षक विमान.... हत्या हत्या ही होती है। पेरी चींटी की मौत के द्वारा हत्या पर नये सवाल रखना चाहती हैं, मौत किसी की भी, उसका महत्व उसके पद से नहीं बढ़ता है। दरअसल सामान्यतया मौत को जितना आसानी से झेल लिया जाता है, उतनी आसान वह होती नहीं है, कम से कम उन लोगों के लिए जो उसके काफी करीब रहे हों। मौत और हत्या मात्र युद्ध तक ही सीमित नहीं है..

मैं इस वक्त बस मरी चींटी के बारे में सोच रही हूँ
सारे मीडिया वाले इस बात पर खामोश हैं
यह चींटी अमेरिका की प्रेसीडेंट जो नहीं थी
न ही कोई धार्मिक गुरु
दुनिया की आखिरी चींटी भी नहीं
उसकी जिन्दगी और मौत कोई खास मायने नहीं रखती
यहाँ तक की कविता पत्रिका का चीफ एडिटर
जो सताई गई औरतों की कविता छापता है
उसके लिए भी वह केवल एक चींटी थी, और कुछ नहीं
उसे तो नर्स के कदमों मे कुचल कर मरना ही था
 उसका

इस कविता का सबसे ज्यादा थर्राने वाला भाग वह है जहाँ पेरि पागलखानों में महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार के बारे में बताती है। यूँ तो हम आए दिन रेप की खबरों को अखबार में पढ़ते हैं, कई बार हम इस को औरतों के व्यवहार पर भी मड़ देते हैं। लेकिन संवेदनशील औरत के लिए यह कितना तकलीफदायक होगा, यह एक पंक्ति काफी है.---  उसका

शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है
शाक थेरोपी इससे बेहतर है

पेरि यह बात को पाँच बार कहती है, यानी कि इस की पीड़ा शाक थेरोपी से पाँच गुना ज्यादा है। मुझे नहीं लगता है कि किसी और स्त्री ने इतनी बखूबी से रेप की पीड़ा का वर्णन किया हो, कविता में यह प्रस्तुति एक और मन मन को दहलाती है तो दूसरी ओर कवि चातुर्य को भी बखानती है.-

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आधी रात को
एक बिना सिर वाला आदमी
सफेद चोगे में
आता है कमरे में
बोलता है सफेद आवाज में..
" तुम अभी भी खूबसूरत हो"
मेरे इंकार करने पर कहता है..
"मै तुम्हारा पति हूँ"

वह झूठ बोल रहा है, मैं जानती हूँ
लेकिन वह मेरे पति जैसा लगता जरूर है
वह शुरु होता है बिना चुम्बन के
बिल्कुल मेरे पति जैसे ही
उसे अन्तर मालूम नहीं हैं
प्यार और यौन सम्बन्ध में

शाक थेरोपी इससे बेहतर है


मेरे पास कुछ पाठकों के पत्र आए हैं जिसमें तरह तरह की शंकाएँ है जैसे कि पेरि मरी नहीं है, या फिर पेरि नाम ही छद्म है, या फिर कोई और है जो पेरि के नाम पर लिख रहा है। मैं बस एक बात जानती हूँ कि यह कविता उस औरत की तकलीफ बयान करती है जो मन के साथ दीमाग भी रखती है, यह कविता उस तकलीफ को बयान करती है जिसे सामान्यतया स्त्रियाँ छिपाना चाहती है। बस यही कारण है कि मैं इस कविता को अपने देश की भाषा में अपने लोंगो के साथ भी बाँटना चाहती हूँ।


रति सक्सेना
26.11..2006


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