कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन

चन्द्रकान्त देवताले

अपनी कविता "अंधेरे में" में मुक्तिबोध वैचारिक द्वन्द्व के व्यूह में फँसे कहते हैं" निजत्व माफ है बैचेन/ क्या करूँ, किससे कहूँ, कहाँ जाऊँ, दिल्ली या उज्जैन?" मुक्तिबोध अपने महाप्रयाण के लिए चक्रतीर्थवाले उज्जैन तो नहीं आ पाए, पहुँचे दिल्ली।
कालिदास के बाद यदि किसी ज्ञात कवि की सृजन- प्रक्रिया से उज्जयिनी को काव्यात्मक गरिमा और महत्व है तो वे एक मात्र मुक्तिबोध ही है। यह मैं पूरी जिम्मेदारी के साथ और सृजन- प्रक्रिया के सन्दर्भ में ही कह रहा हूँ। मुक्तिबोध ने उज्जैन पर कोई कविता नहीं लिखी है। जबकि महाकवि रवीन्द्र से लेकर सुमन जी, श्रीकान्त वर्मा सहित कई ख्याति  प्राप्त कवियों ने अवन्तिका पर कविताएँ लिखीं हैं। जब भी मुक्तिबोध की प्रामाणिक जीवनी उनके साहित्य के सन्दर्भों सहित लिखी जाएगी तो उसमें दोनों उज्जैनों का बहुत बड़ा हिस्सा होगा। एक उज्जैन वह जिसमें रहते हुर तरह से वयस्क होते मुक्तिबोध ने न केवल अपने सृजनात्मक पंख फैलाए बल्कि देखने- सोचने को गहरा करते हुए अपने तर्कों को भी पैना करना प्रारंभ किया। दूसरा उज्जैन जिसमें मुक्तिबोध पर मंडराता रहा और नागपुर राजनान्दगाँव से मुक्तिबोध की कविताएँ जिस पर झपट्टे मारतीं रहीं । मुक्तिबोध की जीवनी का सांगोपंग और सूक्ष्म डाक्यूमेन्टेशन करने वाले ही के बूते की बात होगी कि वह उज्जैन की विभिन्न छवियों और सोच को गढ़ने वाली छायाओं को उनके साहित्य में चिन्हित करता जाए।

सभी लेखकों ‌और कवियों पर स्थानिकता का प्रभाव पड़ता है। उनके लिए छोटे शहर‍- स्थान स्मृति का हिस्सा बन जाते हैँ, जो लिखते नहीं उनके साथ भी होता है ऐसा, धीरे- धीरे यह स्मृति दूसरी स्मृति की छाया तले आ जाती है। मुक्तिबोध ने उज्जैन के पहले भी शहर छोड़ा था पर शायद वह कुछ खोने की तरह नहीं था। उज्जैन के बाद भी वे किसी एक दूसरे शहर में नहीं बसे। वाराणसी, जबलपुर, नागपुर, नांनदगाँव एक के बाद एक आते गए और भी शहर कस्बे आते हैं बीच में- शुजालपुर, इन्दौर, खण्डवा, बड़नगर आदि। पर उनके शहर बदलने वाले ग्राफ का शिखर चाहे नान्दगाँव रहा हो -‍ पर इस ग्राफ को जिस शहर ने काबू किया वह उज्जैन ही रहा।  दरअसल मुक्तिबोध की कल्पनाशीलता ने जिस कदर हदें तोड़ी हैं वह आश्चर्यजनक है। सौन्दर्य - दृष्टि-, इतिहास-बोध, सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनैतिक सोच की सीमाएँ सबका मुक्तिबोष ने अतिक्रमण किया है। इसी के साथ उनके पास समुद्र के ज्वार- भाटे वाला छटपटाता बैचेन मन था। अपनी इन्हीं दोनों विशेषताओं के कारण वे महाकाव्यात्मक पन्नों वाली कविता के कवि हुए और उज्जैन की टोपोग्राफी ले साथ विराट किस्म का इम्प्रोवाइजेशन भी करते गए। गुहा के भीतर गुहा, स्थापत्य के भीतर, नीचे, ऊपर और चतुर्दिक भी स्थापत्य रचते गए। यह तीसरा उज्जैन हुआ जो मुक्तिबोध ने अपनी फैन्टेसी ले जरिए अपनी कविता में बताया। फैंन्टेसी जो अनुभव की कन्या हुई जिसकी गति ‌और चेतना भौतिक जगत के ठोस मूर्त घटना -व्यापार पर टिकी और जिसके ही कारण मुक्तिबोध की कविता की परम्परा में पृथक स्थान बना पाई।
शहर के नीचे भी भूमिगत शहर होता है- जहाँ ऊपर की व्यवस्था -मर्यादा, सांस्कृतिक गरिमा को हम बेनकाब-हिंसक पाते हैं। मुक्तिबोध ने यहाँ सामन्तवाद के शिकंजो, पूंजीवाद के बढ़ते नाखूनों को भी देखा। किसानों- मजदूरों, गरीबों, वैश्याओं के कष्टों को पहचाना। शोषण ‌और अत्याचार के विरुद्ध साम्य -न्याय और संघर्ष तथा दायित्व की भावना उनके मनोजगत का स्थायी भाव बन गई। उज्जैन के लोक विश्वास, प्रतीक, सांस्कृतिक बिम्ब भी इसमे जुड़ते गए। कह सकते हैं ऐसा रिश्ता प्रत्येक रचनाकार का अपनी जगह या जगहों से होता है या हो सकता है, अवश्य होता होगा। पर मुक्तिबोध जिस आत्म संघर्ष ‌और जैसी मानवीय करुणा के भावुक नहीं, विचारवान कवि थे वैसी सामर्थ्य इस तरह के रिश्तों को जैसी गहराई और विस्तार दे सकी वह सबके लिए सहज संभव नहीं हो सकता। " जीवन कवि को सभी पापों के लिएमाफ कर सकता है सिवा युग चेतना को धोखा देने के" रूसी कवि अलेक्सान्द्र की यह हिदायत मुक्तिबोध जैसे जन्म घूटी से ही लेकर आए थे। उज्जैन में मुक्तिबोध के Creative tool Box में वे समस्त औजार इकट्ठे हो गए थे जिनने उन्हें मानव जीवन की ओर संस्कारित करुणा भाव और सम्मान से देखने वाला बड़ा कवि बनाया।
वस्तुतः किसी शहर की दो चार जगहों का नाम कविता में आ जाना भिन्न बात है। कालिदास, भृर्तृहरि के अतिरिक्त मुक्तिबोध की कविता में लगभग सत्तर व्यक्तिवाचक नाम हैं। उज्जैन शहर के अलावा लगभग सत्तर व्यक्तिवाचक नाम हैं। उज्जैन शहर के अलावा दुनिया के बीस शहर उनकी कविता में आएँ है। शिप्रा के साथ दुनिया की अन्य इक्कीस नदियों का समावेश है। नामों की मौजूदगी मात्र से किसी सार्थक या दिलचस्प नतीजे तक कभी नहीं पहुँचा जा सकता। असल चीज कुछ और ही है जिसके कारण मुक्तिबोध की कविताओं की जड़ें और उत्स उज्जैन से जुड़ते हैं। ‌और उसका नाम लेने के बजाए यह कहना ज्यादा आसान होगा कि मुक्तिबोध को सचमुच संगे फसाँ यहाँ मिला ‌और जिसे वो अपने साथ ले गए हम उस संगे फसां सान- पर छुरी, चाकू की तरह आज के इन गूंगे करने वाले दिनों में भी अपने को पैना कर सकते हैं।
मुक्तिबोध उन दिनों उज्जैन के प्रबुद्ध युवा थे। पं. रमाशंकर शुक्ल "हृदय" की कविताओं का उनके किशोर मन पर प्रभाव पड़ा। महादेवी - प्रसाद की तर्ज पर उन्होंने कविताओं की शुरुआत की। दादा माखनलाल चतुर्वेदी का भी उन पर प्रभाव पड़ा, पर मुक्तिबोध जैंसे प्रखर चिंतक पढ़ने में भी और कविताओं के संस्कार के प्रसंग में खराब विद्यार्थी साबित हुए क्यों कि सोच और बहस की प्रक्रिया से गुजरते हुए उन्हें अपना रास्ता खुद बनाना था। उज्जैन में रहते मुक्तिबोध का अपना मित्र मण्डल था, किन्तु बहुत जल्दी ही अधिकांश मित्र उनके लिए अप्रासंगिक होते रहे। डा माचवे, महश शरण जौहरी ललित, क्षीरसागर, बाद में डा जोशी का सम्पर्क उन्हें मनुष्य के विकास क्रम उसकी गति और नियति के महत्वपूर्ण प्रश्नों से निरन्तर बहस की स्थिति में बनाए रहा। यहीं से उनका सम्पर्क इन्दौर के उस वक्त के प्रमुख कामरेड खाण्डेकर से हुआ। वे प्रभाग जी ‌और वीरेन्द्र कुमार जैन क अतिरिक्त नेमि जी के सम्पर्क में भी आए। यहाँ से जब वे खत लिखते थे तो कामरेड सम्बोधन का इस्तेमाल करते थे। वे पार्टी मेम्बर भी बने। त्याग पत्र दिया, दुबारा पार्टी मेम्बर बने।

उज्जैन में उन दिनों प्रगतिशील लेखकों के अतिरिक्त पुरोगामी साहित्य संस्था सक्रिय थी। वे उज्जैन को इस अंचल के साहित्यिक-वैचारिक चेतना के रूप में देखना चाहते थे। इसी प्रसंग में मध्य भारतीय लेखक परिषद के आयोजन में दादा को आमंत्रित करते हुए उन्हें खण्डवा खत लिखा था। जिसमें पंक्तियाँ थीं "उज्जैन के कुछ नौजवान और Uncompromising तरुण आपकी ओर देखते हैं।" एक और महत्वपूर्ण कोशिश मुक्तिबोध ने इन्दौर की म. भा. साहित्य समिति के उद्धार की दिशा में की थी। उनका यकीन था कि समिति पर शोषक सामन्त काबिज है। वे उसे सेठों के बजाए, सृजनशील युवाओं की संस्था के रूप में सक्रिय करने की तमन्ना रखते थे। इसमें वो और बाद में 60 तक कई दूसरे बराबर नाकामयाब रहे। सुमन जी को बार -बार उसका अध्यक्ष या कुछ ना कुछ बनते रहना पड़ा। यह उन दिनों और उस उम्र में मुक्तिबोध की जगरुकता का बहुत प्रमाण और साहित्य और जीवन के प्रति प्रामाणिकत निष्ठा का एक प्रतिमान ही कहा जाएगा। निराशा, टूटन, भटकाव पारीवारिक विच्छिन्नता का बोध और अर्थिक कष्टों की शुरुआत भी यहीं हो गई थी। वर्गापसरण के लिए सतत संघर्षरत रही मुक्तिबोध की आत्मा और कविता ने उनके विवाह के माध्यम से वर्गासरण की कोशिश का सबूत भी यहीं दिया था। इस सबके बावजूद वे उज्जन के वीरानों में अपने मस्तिष्क को आश्चर्यजनक ढंग से सांस्कृतिक, नैतिक ‌‌और समाज दर्शन के  आधारभूत सिद्धान्तों से प्रखर बनाने की अनवरत बहस-प्रक्रिया में संलग्न भी थे।
फिर भी इस सृजनात्मक और चिन्ता परक जमीन के बावजूद यह कहना मुश्किल है कि मुक्तिबोध का उज्जैन से जज्बाती रिश्ता था। वे इस गढ़्ढ़े से निकल कर मुक्ति के लिए यहीं छटपटाते रहे। यहाँ से जाने के बाद मुक्तिबोध ने बनारस, जबलपुर में बहुत कठिन दिन बिताए और माता-पिता के कहने के बावजूद उज्जैन वापस आना उन्हें कभी मंजूर नहीं हुआ। यहाँ प्रभाकर माचवे की उस कविता की याद आना स्वाभाविक है जिसकी प्रथम पंक्ति थी "मालवा ने मुक्ति बोध के लिए क्या किया"। इसका उत्तर मुक्तिबोध के अनुज मराठी के प्रख्यात कवि शरतश्चन्द्र ने दिया था यह कह कर कि " इस तरह के आक्षेप अनुचित है"। मालवा के पास ऐसा क्या है देने के लिए - तो बन्धु को बहुत दिया- खास तौर पर भाषा सामर्थ्य। अपने अन्तिम दिनों में मुक्तिबोध उज्जैन से कट गए थे। हकीकत यह भी है कि उनका महत्व मरणोपरान्त ही मान्य हुआ जब बाहर के रचनाकारों से ज्ञात हुआ कि मुक्तिबोध ग्रेट थे।
यही ग्रेट मुक्तिबोध उज्जैन की सड़कों , फ्रीगंज और मंगलनाथ, भैरोंगढ़ के इलाके में देर रात तक भटकता था। आज इसे याद करने को चाहे यहाँ गजानन मुक्तिबोध मार्ग, मुक्तिबोध की प्रतिमा, मुक्तिबोध-वाचनालय, मुक्तिबोध-पीठ , विश्वविद्यालय में मुक्तिबोध सभा- भवन, मुक्तिबोध चेयर जैसा कुछ नहीं है, तो मुक्तिबोध की बात याद आती है -" फाल्स प्रेस्टिज की ऐसी की तैसी।" शहर कोतवाली में मुक्तिबोध के पिता पुलिस अधिकारी थे और मुक्तिबोध को थाने की कार्यप्रणाली के गहरे और करुण अनुभव थे। " मिस्टर गुप्ता! क्रास एक्जामिन हिम थारोली" ‌और चाबुक चमकार - कैदखाने और वहीं जहाँ वे ऊपर रहते थे उस घर के बिम्बों का मुक्तिबोध ने अनेक जगहों पर मानवीय यातना के सन्दर्भ में सटीक पयोग किया है। डायरी के तीसरा क्षण के अन्तर्गत केशव के साथ घूमने और बहस करने के प्रसंग में उज्जैन के जिस भौगोलिक परिदृश्य ‌और रहस्य संकेतों का वर्णन आया है यदि केवल उसी का विश्लेषण किया जाए तो मुक्तिबोध की कविता के कतिपय सूत्र हाथ लग सकते हैं। और इसके बाद कविता चाँद का मुँह टेड़ा है " से गुजरे जहाँ बरगद और भैरों में जिरह हो रही है तो हम समझ सकेंगे कि मुक्तिबोध में परिदृश्य को इतिहास बोध और क्रान्ति चेतना के नए आयामों में तब्दील कर सकने की कैसी अद्भुत क्षमता थी। इतना ही नहीं हरिजन बस्ती, मन्दिर, कबीठ का पेड़ और बरगद के परिपेक्ष्य में अंगिया, घाघरों पर अटकी व्यभिचारी टकटकी को मुक्तिबोध ही पकड़ सकते थे। " तान्त्रिक की आँखों में गंजी की चमक" , "तिरछा रहस्य" सभी कुछ है यहाँ जो सामंती - पूंजीवादी तंत्र के करिश्मों - कारनामों को उजागर करता है। ऐसा तन्त्र जिसने मनुष्य की आत्मा को अंधेरे में चमगादड़ सा उल्टा लटका रखा है। इसी कविता में मसान सिद्धि, मूंठ मारना , टोटके आदि के बीच एक तरफ संस्कृति के मुख पर मनुष्य अस्थियों की राख का विकट प्रश्न है तो दूसरी तरफ सराफा बाजार में सट्टे का धंधा है। " बरगद की आँखे ढीठ । भैरों की कड़ी पीठ" और इन दोनों में बहस खड़ी हुई है- सुबह होगी कब? ब्रह्म राक्षस कविता की बावड़ी , चौराहे का घण्टाघर, गलियाँ, सुनसान चौराहा, प्याऊ, मसान, गुफा, नदी, मन्दिर, ज्योतिर्लिंग, तहखाना, चक्करदार सीढ़ियाँ, थाना, कपड़ा मिल, बरगद, भैंरों आदि अनेकों स्थानों को यहाँ के परिदृश्य से मुक्तिबोध ने जब चुना है तो यह कोई यूँ ही मनमानी उन्होंने नहीं की है। इसके पीछे उनका सामाजिक चिन्तन और आत्म संघर्ष सक्रिय है। और जब इनके सहारे मुक्तिबोध फंटासी रचते या अपने अनुभव को विस्तार देते हैं तब ये मात्र स्थान बोधक शब्द भर नहीं रह जाते। इनसे जो अर्थ ध्वनियाँ फूटती हैं और इन्हीं अर्थ ध्वनियों के सहारेवे हमारी दुनिया की त्रासदी को प्रकट करते और उसकों अतिक्रमित करने की कोशिश में निरन्तर संघर्षरत दिखाई देते हैं।
उज्जैन के तान्त्रिक हलके से मुक्तिबोध जैसे प्रतिबद्ध कवि ने तान्त्रिक-रहस्यवादी पदावली को भी अपनी समकालीन कविता के लिए चुना और ऐसे प्रतीकों -पदों के कारण ही कुछ विद्वान समीक्षकों को उन्हें रहस्यवादी कवि  कहने की जहमत उठानी पड़ी। "सूखे कठोर नंगे पहाड़ "कविता में तिलस्मी मार्ग, मंत्रानुशासनों का जादुई देस, तान्त्रिक की दुष्ट साध, भुतही संध्या भाषा, शोणितारुण भैरव, अंध गुहा और अन्य स्थानों पर सुषुम्ना, इड़ा, पिंगला का जिक्र है। जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं मुक्तिबोध ने दमन- शोषण के छद्म के विरुद्ध ब्रह्म राक्षस का सजलउर शिष्य होने के लिए भी सभी तरह की हदों का अतिक्रमण किया है। इस पदावली का उपयोग भी उन्होंने मानव मुक्ति की कामना और संघर्ष के सन्दर्भ ही में सम्पूर्ण सामाजिक अन्तः करण के विवेक के साथ ही किया है। यहाँ बाबा नागार्जुन का कथन महत्वपूर्ण लगता है -" नेरुदा और चेग्वारा किस तरह अपने प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं। इससे न सीख कर ये लोग ( अपने प्रगतिशील ) अपने प्रतीकों से नफरत करने लगे हैं और बात करते हैं जातीय इतिहास की। मैंने तो दुर्गा, काली, त्रिमूर्ति, पंच मूर्ति जैसे प्रतीकों का इस्तेमाल हमेशा किया है।" वस्ततः मुक्तिबोध जिस तड़पदार जिन्दगी के हामी थे उसके लिए उन्होंने जीवन के हर क्षेत्र का सतर्कता पूर्वक दोहन किया। साज सँवार की प्रतिष्ठित भाषा और अकेले में अपनी ऐसी की तैसी करवाने में आत्ममुग्ध प्रतिभा के विरुद्ध उन्होंने हायहाय, भागमभाग में शामिल भयानक हिडिम्बा कविता के कवि होने का साहस किया। उनकी काव्य भाषा पर इस क्षेत्र के गहरे संस्कार पड़े हैं। मराठीपन और मालवीपन दोनो ही की भाषाई छाप जिसका प्रवाहपूर्ण सार्थक प्रयोग उनकी अन्तिम दिनों की कविताओं में भी दिखाई देता है। मुक्तिबोध जैसे कवि को जिनकी कविताओं में विज्ञान- सौरभमण्डल- भूगर्भ और गणित जैसे विषयों के सन्दर्भों की विस्मयकारी मौजूदगी है- किसी एक जगह के प्रभावों के सन्दर्भ में आंकना कठिन नहीं जोखिम भरा काम भी है। फिर उज्जैन की खिड़की पृथक से खोलकर कविताओं में झाँकना एक अकादेमिक हरकत से अधिक कुछ नहीं लगता। पर इसके बावजूद यह भी सुनिश्चित है कि मुक्तिबोध ने इस शहर और अंचल की सम्पदा और विपदा से अपने को गहरे से जोड़ा था। यह करिश्मा उज्जैन का नहीं मुक्तिबोध का है। उज्जैन या कोई भी शहर क्या कर लेगा यदि वहाँ का सर्जक- रचनाकार प्रवाह में बहने की बात तो छोड़ें तट पर आने से भी कतराएगा। प्रवाह , भंभड़, अंधड़, धूल, धक्कड़, भागमभाग, दलिद्दर में लालटेन या कंदील थामे शामिल होने का निर्णय मुक्तिबोध का था। आज भी यह याद करना -सोचना उत्तेजित कर सकता है कि मुक्तिबोध का इस शहर से घनिष्ट सम्बन्ध रहा।


एक संवाद पेरी के नाम... रति सक्सेना


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