पाब्लो नेरुदा


बीसवी सदी के महानतम कवि पाब्लो नेरुदा ने जीवन की बहुविध छवियों को अपनी कविता में आत्मसात किया है। नेरुदा के बारे में अधिक बात करने की अपेक्षा उन्हें बार- बार पढ़ना जरूरी है। आपका असली नाम रिकार्डों नेफताली रेय्येस ( 1904-1973) था, पाब्लों नेरुदा नाम आपने चेक लेखक यान नेरुदा के नाम पर अपना लिया और नेफताली को पाब्लों में परिवर्तित कर दिया। पाब्लो नेरुदा की अनेक कविताएँ पठनीय हैं किन्तु इस अंक में हम आपकी प्रेम कविताओं को प्रस्तुत करेंगे। इन कविताओं का अनुवाद विभा मौर्य और मीना ठाकुर ने किया है। विभा मौर्य दिल्ली विश्वविद्यालय में स्पहानी भाषा, स्पहानी अमेरिका साहित्य और अनुवाद की प्रोफेसर एवं जर्मन व रोमन भाषा की अध्यक्ष हैं। मीना ठाकुर मेक्सिको दूतावास में कार्यरत हैं। ये अनुवाद विभा मौर्य की अनुमति से तनाव पत्रिका से लिए गए हैं।


प्रश्न

प्रिये, एक प्रश्न ने
तुम्हें तबाह कर दिया है

मै लौटा हूँ पास तुम्हारे
कँटीली अनिश्चितता के साथ

तुम्हें मैं चाहता हूँ सरल या सीधा
जितना एक रास्ता या तलवार

मगर तुम हठ करती हो
बनाए रखना चाहती हो घेरा
परछाई का जो मुझे पसंद नहीं

प्रिये
समझो मुझे
तुम्हें चाहता हूँ सम्पूर्ण
आँखो से पाँव तक, अँगूठे के नाखून तक
तुम्हारा अन्तर्गत
पूर्ण प्रांजलता जो तुम ने सँजोई है भीतर

मैं हूँ प्रिये
जो दस्तक देता है तुम्हारे द्वार पर
मैं कोई प्रेतात्मा नहीं, वह नहीं हूँ
जो कभी खड़ा था तुम्हारे झरोखे के बिल्कुल नीचे
मैं दरवाजा तोड़ गिराउंगा
तुम्हारे जीवन में आ जाउँगा
मैं आ रहा हूँ तुम्हारी आत्मा में बसने
कुछ नहीं कर सकती तुम
तुम्हें खोलने होंगे द्वार पर द्वार माननी होगी मेरी बात
तुम्हें आँखे खोलनी होंगी
जिस से मैं उन में खोज सकूँ
तुम्हें देखना होगा कैसे चलता हूँ मैं
भारी कदमों से
उन सभी रास्तों पर
जो, अन्ध हो, मेरी प्रतीक्षा करते थे

मुझ से मत डरों
मैं तुम्हारा हूँ
परन्तु
मैं कोई राहगीर नहीं न ही कोई भिक्षु हूँ
मैं तुम्हारा अधिपति हूँ
वह जिसकी तुम प्रतीक्षा कर रही थी
और अब मैं प्रवेश कर रहा हूँ
तुम्हारे जीवन में
फिर कभी न लौटने के लिए
प्रिये, मेरी प्रिये, प्रिये
सर्वदा साथ रहने के लिए
( La Pregunta)


महासागर

देह ज्यादा पवित्र है, लहर से
नमक किनारों को धोता है
और चमकीला पक्षी
अपनी जड़ों के बिना उड़ रहा है

( Oceano)

सागर

एक अकेला प्राणी, परन्तु लहु नहीं है
एक अकेला प्यार, मृत्यु या एक गुलाब
सागर आ कर जोड़ देता है आपस में हमारे जीवन
और वह अकेला प्रहार करता है एवं विस्तृत हो जाता है
रात भर और दिन भर, मनुष्य व जीव
सारः अग्नि एवं शीतः गतिशीलता
 

 

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