सीमा कुमार की कविताएँ

तुम...

आज फिर
कुछ अधूरे शब्द
तुम...
मैं...
तुम्हारी याद..
सपने,
और सच्चाई...
मेरा पागल मन...
तुम...
तुम...
और तुम... ।
आज फिर
इस भीड़ से,
शोर से
दूर चले जाने की
अभिलाषा,
फिर भी
एक अकांक्षा...
तुम...
तुम्हारा साथ...
तुम और मैं...
मैं और तुम...
बस... ।

(सीमा कुमार की अन्य कविताएँ) .


मुरली मनोहर श्रीवास्तव

कविता लिखने का दिन

मैं
कमरे का ए सी आन करता हूँ
गजल लगाता हूँ
रूमानी दिनों को याद करता हूँ
और कविता लिखने की कोशिश में
जुट जाता हूँ
मेरे पॄष्टो पर
प्लास्टिक के फ़ूल की तरह
रूमानियत सज जाती है
ठंडी हवा आ रही है
टी वी पर बाजारवाद की चर्चा है।
आजकल हम वही सोचते हैं
जो सोचने के लिये हमें दिशा दी जाती है
या जिसे सोचने के लिये विवश किया जाता है।
यही व्यवहारिक कविता है।
आतंकवाद, गोधरा, धर्मनिरपेक्षता , दंगे
इसके बाद इंटरनेट, चैट, पोर्न साईट
और टेंशन फ़्री माइंड
अपने भीतर की उलझनों पर सेक्स तीव्र सेक्स की चादर
उत्तर आधुनिक युग की कविता
अर्थात
किसी अग्रेजी राईटर की कार्बन कापी
मेरे चिंतन के फ़्लो में
कोई चीज तीर की तरह चुभती है
मैं
पुलिस थाना कोर्ट कचहरी को दूर से सलाम करता हूँ
मेरे भीतर चुभती है
कल बाजार की एक शाम
जहाँ मैने
थाने के आगे गाडी खडी की
भीड देख चुपचाप निकल जाना चाहता था
कि नजर पडी
तीस- चालीस दरिंदो के बीच
एक अधेड और मैले- कुचले कपडों में लिपटी उसकी नाबालिग बेटी पर
जो किसी सभ्य मध्य वर्ग के घर काम करते- करते
चोरी के इल्जाम में
अपना एक्सरे करा सीना ताने
बाहर निकल रही थी
मुझे इनका सत्य लिखने में शर्म महसूस हुई
क्योंकि
मैं सामाजिक न्याय की वह लडाई नहीं लड सका था
जो उन्हों ने लडी थी.

( मुरली मनोहर श्रीवास्तव की अन्य कविताएँ)


सुरेश सेन निशान्त

यह दस वर्ष के बच्चे की पीठ हैs
पीठ कहाँ हरी दूब से सजा
खेल का मैदान है
जहाँ खेलते हैं दिनभर छोटे- छोटे बच्चे।

इस पीठ पर
नहीं हैं किताबों से भरे
बस्ते का बोझ
इस पीठ को
नहीं करतीं मालिश माताएँ
इस पीठ को नहीं थपथपाते हैं उनके पिता
इस दस बरस की
नाजुक सी पीठ पर है
विधवा माँ और दो भाइयों का बोझ
रात गहरी नीन्द में
इस थकी पीठ को
अपने आँसुओं से देती है टकोर एक माँ
एक छोटी बहन
अपनी नन्हीं उंगलियों से
करती है मालिश
सुबह- सुबह भरी रहती है
उत्साह से पीठ।

इस पीठ पर कभी उपड़े होते हैं
बैंत की मार के गहरे निशान ।

इस पीठ पर हाथ फेरों
तो कोई भी सुन सकता है
दबी हुई सिसकियाँ।

इतना सब कुछ होने के बावजूद
यह पीठ बड़ी हो रही है
यह पीठ चौड़ी हो रही है
यह पीठ ज्यादा बोझा उठाना सीख रही है।

उम्र के साथ- साथ
यह पीठ कमजोर भी होने लगेगी
टेढ़ी होने लगेगी जिन्दगी के बोझ से
एक दिन नहीं खेल पाएँगे इस पर बच्चे।
एक दिन ठीक से घोड़ा नहीं बन पाएगी
होगी तकलीफ बच्चों को इस पीठ पर

वे प्यार से समझाएँगे इस पीठ को
कि घर जाओ और आराम करों
अब आराम करने की उम्र है तुम्हारी
और मंगवा लेंगे
उसके दस बरस के बेटे की पीठ
वह कोमल होगी
खूब हरी होगी
जिस पर खेल सकेंगे
मजे से उनके बच्चे।

( सुरेश सेन निशान्त की अन्य कविताएँ )
 


योगिता यादव की कविता

मंगलसूत्र

क्या संभव होता है
हर अहसास को शब्दों में ढाल पाना
अगर ऐसा होता
तो मैं तुम्हारे बनाए
सूत के मंगलसूत्र पर
एक लम्बी कविता कहती

( योगिता यादव की अन्य कविताएँ )


वीणा विज की कविता

अपने- अपने हिस्से का जाल बुनते
समय के चक्रव्यूह में फँसते जाते
अपने- अपने हिस्से का अरमान संजोते
सपनों के अथाह सागर में बहते जाते
अपने- अपने हिस्से के अहसास महसूसते
मुस्कुराहटों के दर्द के फासले कम करते जाते
अपने- अपने हिस्से का संगी साथी ढूँढते
जन मानस के साक्ष्य से आँचल भरते
राहों से गलबय्या डाल छालों को सहलाते जाते
अपने- अपने हिस्से का मुट्ठी का आसमान खोजते
सौर मंडल के असंख्य गृहों में अपना चाँद खोजते
हिस्सों की क्या कहिए, हिस्से ही जीवन बन गए
दो गज जमीन के हिस्से भी राख की ढेर में बदल गए
अपने- अपने हिस्से के प्रेम की अंजली आँचल में भर के
तुम्हारे हिस्से के प्रेम पर समर्पित करते चले गए...........।

( वीणा विज की अन्य कविताएँ )


विजय कुमार राउत की कविता

हर लहर समन्दर की

किसी चट्टान से
टकराने से पहले
पीछे हटकर
एक बार
दम मार लेती है जरा
तब कहीं
उस चट्टान के नीचे
दबी हुई मिट्टी चली आती है
लहर तले
समन्दर की..

(विजय कुमार राउत की अन्य कविताएँ )


नरेन्द्र पुण्डरिक

लड़ने का जीवट ही

ऐसे मौके मेरे पास कम होते हैं
जब मैं कुछ पल फुरसत से बैठता हूँ
जो भी वक्त मिलता है वह
छटपटा कर जीने और
जीनें के ऊन- बीन में खत्म होता है
ऐसे वक्त में मुझे गाँव के वे
बूढ़े याद आते हैं
जिनकी छायाएँ जीवन की उदास शामों में
दरख्त सी घनी और लम्बी हो जातीं थीं
जहाँ मुझे हर आदमी अपने तरीके से
लड़ता दिखाई देता है
जब कि उसे नहीं मालूम होता कि
उसका सही दुश्मन कौन है
और वह किससे लड़ रहा है
लेकिन वह लड़ता है
लड़ने का यह जीवट ही
उसे जिलाए रखता है

(
नरेन्द्र पुण्डरिक की अन्य कविताएँ )
 


सुदर्शन वशिष्ट की कविताएँ

‌औरते रोती हैं

बात बात में रोती हैं औरते
बात बात में हँसती है
हालाँकि बहुत कठिन है
एक साथ हँसना
एक साथ रोना

‌औरते रोती हैं
बच्चे होने पर भी
बच्चे खोने पर भी
बिछुड़ने पर भी रोती हैं
तो मिलने पर भी
गाने की रस्म है इनके जिम्मे
तो रोने की भी
कोई भी जिए या मरे
ये गाएंगी ही
ये रोएंगी ही
औरते रोती हैं
अपनों पर
सपनों पर
जिन से नहीं कोई नाता
ऐसे बैगानों पर

कभी अपने में ही
हँस देती हैं
अपने में ही रो देती हैं
बहुत कठिन है जानना
अब क्यों रोई
अब क्यों हँसी
अम्बर से गहरा है
औरत का मन
बीज से बड़ा है
औरत सब के लिए ढाल है
अंधेरे में मशाल है।

( सुदर्शन वशिष्ट की अन्य कविताएँ )


रमेश मेहता की कविताएँ

अभ्यतन्त्र

मित्रो
शहर की सड़कों पर
कब तक
शब्दों को नंगा घुमाऊँगा

मित्रो
भारत की महानता के
आख्यानों से
कब तक जी बहलाऊँगा

मित्रो
लोकतन्त्र का तमगा
छाती पर सजाए
अयोध्या और गोधरा में
कब तक मानवता को
नंगा नचाऊँगा

मित्रो
अब कठिन हो चला है
नहीं चीखों से
ध्यान हटाना
सच
को पर्दों में छुपाना

( रमेश मेहता की अन्य कविताएँ )
 


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