सीमा कुमार की  कविताएँ


साहित्य, हिन्दी भाषा एवँ कविता से बचपन से लगाव रहा है. स्कूल एवँ कालेज की हिन्दी पत्रिकाओं में भी योगदान रहा है तथा 'अंकुर' नामक स्कूल की हिन्दी पत्रिका की सम्पादिका भी रह चुकी हैं। लेखन, चित्रकला, फोटोग्राफी, संगीत एवँ ब्लागिंग में रूचि रखती हैं। उनके कुछ फोटोग्राफ इस पते पर देखे जा सकते हैं‍
http://www.flickr.com/photos/seemakumar

भँवर

रिश्तों का भँवर
और मैं
कागज़ की एक
छोटी सी नाव ।
 

देखना एक दिन

जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग कहते हैं
कब होगा ?
कैसे होगा ?

मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन
सागर मेरी बाँहों में होगा,
फूल मेरी राहों में,
और शिलाखंड मेरी राह के
पुष्प बन जाएँगे ।
देखना, एक दिन
मैं सूरज की लपटों को
छू लूँगी,
अंतरिक्ष की गहराइयों में
जाकर
रहस्यों को खोज लाऊँगी ।
देखना, एक दिन
मेरे सारे सपने सच होंगे,
सभी मेरे अपने होंगे ;
न कोई वेदना होगी,
न निराशा,
न पछतावा,
न संर्घष,
न पराजय ।

जब मैं कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा
तो लोग मुझे
अविश्वास से देखते हैं,
मुझे विक्षिप्त समझते हैं

चाँद को पाने के लिए
मचलने वाला बच्चा
क्या अपनी जिद से
चाँद को पा लेता है ?
परंतु
आशा, विश्वास
और उत्साह से भरी मैं
आँखों में हजारों सपने लिए
अब भी कहती हूँ
देखना, एक दिन ऐसा होगा ;
देखना, एक दिन वैसा होगा,
देखना, एक दिन ... ।

ख्वाब

लोग
ख्वाबों से हक़ीकत
बुनने की कोशिश करते हैं ।

मैं अकसर कोशिश करती हूँ
हक़ीकत में
ख्वाबों को ढूँढ सकूँ ।

साथ तुम्हारा

शाम का आँचल,
सागर का किनारा
ढलते सूरज की लाली
और याद मुझे है
साथ तुम्हारा ।

दुनिया के मेले में
चेहरों की भीड़ में
है याद बस
एक चेहरा पुराना
एक साथ तुम्हारा ।

है याद मुझे एक शाम
जब साथ तुम्हारे,
आवाज़ों का शोर भी
सागर की लहरों में
गुम होता सा लगता था ;
जब इंसानों की भीड़ में भी
सिर्फ तुम्हारे होने का
एहसास
सच्चा सा लगता था ।
है याद मुझे
वह शाम का आँचल
सागर का किनारा
ढलते सूरज की लाली
और याद मुझे है
साथ तुम्हारा ।

प्यार

प्यार
अंधेरे में
टिमटिमाती हुई
एक रोशनी है
जो इंसान को
अंधेरे से
कभी हारने नहीं देती ।

ज़िन्दगी के रंग

ज़िन्दगी कभी-कभी
कहीं खत्म सी हो जाती है,
कहीं थम सी जाती है
और फिर कहीं
शुरू हो जाती है ।

कहीं उमड़ जाती है
कहीं मचल जाती है
कहीं रेत के बवन्डरों सी
उड़ती चली जाती है ।

कहीं हरे-हरे पत्तों पर पड़ी
बरखा की बूँदों सी
झिलमिलाती जाती है ।
कहीं ठंढ़ी हवाओं सी
बस छू कर चली जाती है ।

यूँ ही बदलती रूप रंग
ज़िन्दगी चली जाती है ।
थाम ले जिस पल को
वही बस अपना है ;
बाकी की ज़िन्दगी रेत-सी
यूँ ही फिसल जाती है ।

शब्द- जाल

कविता -
शब्दों का ताना-बाना,
शब्दों का जाल ।

कल्पना के
हथकरघे पर
अक्षर - अक्षर से
शब्दों के
सूत कात,
जुलाहा बन
शब्दों के सूत से
वाक्यों का
कपड़ा बुन
और
दर्जी बन
एहसास की कैंची से
अनचाहे शब्द कतर
भावों की
सूई से सी कर
कवि
तैयार कर देता है
कविता का
मनोहारी वस्त्र;
कविता -
एक मोहक
श्ब्द जाल ।

पुरानी डायरियों के पन्ने

अतीत में झाँकने की चाह में
जब पलटे मैनें
कुछ पुरानी डायरियों के पन्ने
तो उनके पीले पन्नों के बीच
दबे हुए मिले
गुलाब के कुछ सूखे फूल,
कुछ बिखरी पंखुड़ियाँ,
कुछ सूखी कलियाँ,
रंग, खुशुबू, मोहकता लिए
जो आए थे कभी मेरे पास
बन प्रियजनों की सौगात
रही अब न खुश्बू,
न रंगत
बची केवल यादें
संजो कर रखी हुई
उन बिखरी पंखुड़ियों में
और उन पीले पन्नों पर
कभी दिल की गहराई से लिखी बातें
अब लगने लगी बेमानी,
व्यर्थ,
अर्थहीन ।
पर उन शब्दों में
अब भी जादू था,
स्मृतियों को जगा देने की
शक्ति थी,
अन्तर्मन में द्वंद छेड़ देने का
हौसला था ।

विचलित हुआ उर;
बंद किया मैंने
पुरानी डायरियों को
अतीत की स्मृतियों को
कहीं बंद करने की चाह में,
पर अड़ी रही  
स्मृतियाँ ।
अफसोस हुआ
अतीत में झाँकने की चाह में
क्यों पलटे मैनें
उन पुरानी डायरियों के पन्ने ।
 


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