योगिता यादव


योगिता की कविता में स्त्री मन की उलझनें है, जिन्हें सुलझाने की कोशिश में कविता जिन्दगी से जुड़ रही है। मन की उलझनों के सरल व सपाट शब्दों में बयान करना इतना आसान तो नहीं, किन्तु योगिता ने बखूबी निर्वाह किया है। " इन दिनो" कविता इसका गवाह है। आपका पता है :--द्वारा दैनिक जागरण, सिडको इंडस्ट्रियल काम्पलेक्स,बड़ी ब्राह्मणा, जम्मू एव् कश्मीर

उलझन

वास्तब में
हमारा अन्तर्मन उलझा है
हमे भाती हैं उलझनें
इसीलिए उलझ जाया करते हैं
वरना
इन उलनों का हर इक तार इकहरा है।

इन दिनों

इन दिनों शहर में एक हलचल सी मची है
कुछ आँखे पड़ोंस की बस्ती पर टिकी हैं

सुना है उस पार से आई है कोई खबर
तभी तो तलाशे जा रहे हैं इन घरों से कु शहर

कुछ टूटते किनारे, कुछ डूबते भँवर
किशन गंगा में जो बह गए
वो थोड़े से प्रेम पत्र

कुरेदों समाधियाँ, फिर से खोलो कोई कब्र
कोई तो जवां हुआ होगा,57 परतों में दबकर

मिलेगा तो ब्याहेंगे,सजाएंगे आँखों से स्याही निकालकर
ले चलेंगे उसे बुनियार के लुटे खंडहरो में
जो उसके सुहाग का बिस्तर

मौत सुदामा के सपनों की

मोक्ष की दूकानों पर जब
सामान बिकते हैं तो सोचती हूँ
कितनी खोखली हो गई है
मोक्ष की यह कामना
जिन्दगी से भी बड़ा छलावा है
इनका यूँ
दर बदर बिकना
क्यों कि सुदामा के सपनों को तो
सीधी मौत भी नसीब नहीं हती
यह मरते हैं हर बार
हैन्सी क्रोन्चे की तरह
पहले मरता है इनका नायक
फिर प्रतिभा
और एक दिन
चिंताओं के हाड़ और कामनाओं के मांस से बना
ये पुतला
कहीं अचानक दुर्घटनाग्रस्त हो जाता है।
 


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