वीणा विज की कविताएँ


वीणा विज की कविता में देश- परदेश की देहरी पर ठिठका मन है जो इधर देख रहा है, उधर महसूस रहा है, और दोनों जगहों पर मनवीय सत्यों को तलाश रहा है। वे सत्य जिन्हे ना जाने कितने युगों से तलाशे जाने की कोशिश जारी है।

कैनवस

रिक्त कैनवस पर
उभरते चेहरे
कभी बनते कभी बिगड़ते
ख्वाबों को ताबीर दे जाते हैं
तूलिका से खिंची
हर लकीर कह जाती है
ढेरों अफसाने
दिल की मर्जी है
उसे ही रखे या
रूख मोड़ दे उसका
तलाश है
उस रंग की
रूह की गहराइयों को
रंगकर
इक नए रंग की शक्ल
इख्तियार कर
तूलिका में ऐसे रंग भरे
कैनवस पर अनकहे
अफसाने बयां हो जाए
आखीर
सामने तो लानी है
दिल में अंकुरित
चाहतों की
सजी संवरी
गुलाबी लालियाँ
उनका स्वरूप
आज हुआ है
रंगों का मोहताज
कैनवस की गर्भ से
नव प्राण पा
आलोकित होने को
अपना शाश्वत सत्य
दर्शाने को.....

जिन्दगी

काली घटाओं जैसे केशों में
चमकती चाँदी सी लट
चुपके से कान में कहती है
जिन्दगी को जिया है मैंने
पल- पल को सहा है मैंने
कई पल हवा में उड़ गए
पलकें झपकने में साल भी गुजर गए
वहीं
कई पल पहाड़ से भी भारी लगे
एक पल से दूसरे पल का आना
सालों बाद...
मीलों की दूरी पर आता लगा
वो पल जिया न जा सका
कोई दर्द बाँटता नजर न आया
वही वक्त थमता गया
और...
पल का वजन बढ़ता गया
अंततः
वक्त गुजरने के साथ पल वो भी गुरा
आज..
जिन्दगी का यह मुकाम आ गया है
जीवन जीने का कोई क्षोभ नहीं रह गया है
हाँ
मिला जिया सब जिया है मैंने....।
 


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