विजयकुमार राउत


विजयकुमार राउत मराठी भाषी हिन्दी कवि, अनुवादक हैं। आपकी कविताओं में सहज शब्दों में जिन्दगी के सामान्य में दिखने वाला दर्शन स्पष्ट आकार लेता है। आप महाराष्ट्र के अहमदाबाद जिले में व्याख्याता हैं।

पत्थर

सोचता था
बून्द बून्द टपकता पानी
बड़े से बड़े
कठिन
पत्थर को
एक दिन
करेगा भेद
मगर.
क्या पता था कि
पहन लेगा
शैवालों का कवच
हँसेगा मेरी मूर्खता पे

फिर भी

मैंने
कभी
किसी के दिल में
कोई जगह नहीं माँगी
खामखाँ खामखाँ
उठाकर बिठा दिया
मुझे
कई लोगों ने
उनके सिंहासन पर
मैं उछलता रहा
उन्हीं की धड़कनों पर
पता नहीं
उनका दिल
कब टूट गया
‌और मैंने पाया
अपने आप को
उन्हीं के कदमों में

 


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