नरेन्द्र पुण्डरिक

नरेन्द्र पुण्डरिक नवे दशक की समकालीन कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। आप केदार शोध पीठ के कार्यकारी हैं। आप महानगरीय तेवर के विरोध में जीवन से जुड़ी ऐसी कविता को रच रहे हैं जो कविता और समाज के बीच सन्तुलन के बेहद जरूरी है। कस्बई जीवन का कसमसाहट को नरेन्द्र की कविता में बखूबी से पढ़ा जा सकता है। यह विविधता ही हिन्दी कविता को एक चेहरा दे सकती है। पता है --डी एम कालोनी, सिविल लाइन्स बाँदा, 210001 ( उत्तर प्रदेश)


निरर्थक ज्ञान के प्रति

एक कम जाड़े की चाँदनी रात को
मेरा एक साथी कवि
गा रहा है सालो पुरानी
एक फिल्म का गीत
" मस्त चाँदनी मैं ‌और तू"
वहीं उस छिटक चाँदनी में
एक लड़का जल्दी जल्दी
चिपका रहा है कुछ पोस्टर

पोस्टर शहर में आ रही
एक विदेशी कम्पनी का विज्ञापन था
जो इस शहर में पहली बार लाँच कर
बच्चों की नीन्द और
जीवन की खुशियों के बीच
तेजी से घुस रही थी

जीवन के बीच चीजों की
इस आउक को देख कर मुझे
याद आ गई सैकड़ों वर्ष पुरानी लिखी
एक सूर कवि की यह पंक्ति
"आओ घोर बड़ो व्यापारी"
जिसमें एक कवि लगातार उतरती हुई
ज्ञान की उन खेपों से चिन्तित हुआ शा
और जीवन की खुसियों से अपरिचित
ज्ञान की उन खेपों को
गोपियों ने घोष बने व्यापारी के
मुँह पर मार कर वापिस कर दिया था

यह और कुछ नहीं
यह सैंकड़ों साल पहले के
एक कवि और कुछ स्त्रियों का
अपने जीवन की खुशियों को लेकर
निरर्थक ज्ञान के प्रति किया गया विद्रोंह था
जिसे समय के इतने बड़े अन्तर के बाद
जीवन के लिए एक कवि
ज्यों का त्यों पा रहा है।

एक आदमी को पहचाने बिना

वे मेरी कालोनी में करीब
दस साल से रह रहे थे
न मैं उन्हे जानता था
न वे मुझे
न जानते हुए एक दिन वे
चले गए अचानक

लोगों ने बताया बहुत अच्छे आदमी थे
उनका दुनिया के किसी
छक्के पंजे से मतलब नहीं था
उन्हे किसी से कभी
दो बात कहते सुनते नहीं देखा गया

गली से निकल जाते थे वे
देखे अनदेखे से
अब यदि मिल भी जाएँ तो
मैं यह पहचान भी नहीं पाऊंगा
कि वे इस दुनिया के वासी नहीं हैं

मुझसे अच्छे तो मेरी पत्नी और बच्चे हैं
जिनकी पहचान देखने से ही बन जाती है
पत्नी तो एक दिन उनके घर
मातमपुर्सी में भी हो आई है

पता नहीं मैं और वे
कैसे एक मुहल्ले में
रहते रहे दस साल
एक दूसरे को न पहचानते हुए
रहते रहे, न रहने जैसे

इन दस सालों का क्या होगा
क्या करूँ मैं इन दस सालों का
जिनमें बगल में रहने वाले एक आदमी की
शक्ल भी नहीं रख पाया अपने पास
लगता है बेकार गए दस साल
एक आदमी की पहचान के बिना
 


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