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कन्नड़ के कवि जी एस
शिवरुद्रप्पा की कविताएँ

शिवरुद्रप्पा कन्नड़ के प्रमुख कवि एवं आलोचक हैं। अब तक उनके १२
कविता संकलन, १२ आलोचना ग्रन्थ और तीन यात्रा विवरण प्रकाशित हो
चुके हैं। आपको साहित्य अकादमी पुरस्कार से लेकर अनेक महत्वपूर्ण
पुरस्कार
प्राप्त हो चुके हैं। आपकी कविता में जीवन की समान्य से सामान्य
घटना विशिष्ट हो उठती है। इन कविताओं का अनुवाद के.
जी. बालकृष्ण पिल्लै ने कृत्या के लिए
विशेष तौर से किया है।
कृपया बताएँ
देवियों! सज्जनों!!
कृपया बताएँ
वे कहते हैं कि वे मन्दिर बनाना चाहते हैं
फिर तो हमारे देवता निर्भय रहेंगे
बादल दूध बरसाएँगे
मधु के झरने बहेंगे
हमारा देश
शीघ्र ही रामराज्य बन जाएगा
किन्तु
देवियों! सज्जनों!!
कृपया बताएँ
उन मन्दिरों का हम क्या करेंगे
जो भूखे- प्यासे हैं
उन मन्दिरों का हम क्या करेंगे
जिनकी आँखों में रोशनी नहीं है
उन मन्दिरों का हम क्या करेंगे
जो नंगे हैं
उन मन्दिरों का
हम क्या करेंगे
जिन्हे बोलने का अधिकार नहीं
कृपया बताएँ
मेरा छाता

यह मेरा छाता है
हम दोनों का काफी पुराना सम्बन्ध है
धूप में वर्षा में
यह मेरा
सच्चा दोस्त है
पर छाते से बढ़ कर यह मेरे लिए
एक प्रश्न चिन्ह है
जहाँ भी जाता हूँ
इसे हाथ में लिए जाता हूँ
बिना प्रश्नों के जिन्दगी बेकार है
पूर्ण विरामों की मैं चिन्ता नहीं करता
सिकुड़े संदहों को खोल कर
उनकी छाया में चलना
मुझे अच्छा लगता है।
महिलाओं की छतरी
विस्मयादिबोधक चिन्ह है
तभी तो वह इतनी सुन्दर
और रंगीन है
दोनों छातों के बीच
जिन्दगी तनी हुई है
प्रश्न से विस्मयादिबोधक तक
नारी के लिए नर प्रश्नचिन्ह है
नर के लिए नारी विस्मय का स्रोत
दोनो बहुत अच्छे जोड़े हैं
क्या उनके निर्माता ने
ऐसा ही नियोजन किया था
या वे ऐसे ही बन पड़े हैं?
मेरी जेब
भाई साहब
मेरी जेब में हाथ ना डाले
यह मेरी है
और कोई इसमें हस्तक्षेप न करे
इसमें कई चीजें हो सकतीं हैं
यह आपकी चिन्ता का विषय नहीं।
मेरी बैंक बुक
मेरे कर्जे के खाते
मेरे प्रेम पत्र
कुछ भी हो सकता है
पर यह मेरी जेब है
मेरी तकलीफों की उलझन
आप सुलझा नहीं सकते
उन्हें रहने दें।
आप मुझे
केवल अपनी दोस्ती दें
उन की चिन्ता ना करें
आपकी जेब में जो कुछ है
उसकी मैं चिन्ता नहीं करता
मेरे और आपके बीच का आकाश
बादलों से खाली रहे
यही काफी है।

चक्र गति
बिना अंगूठे की अपनी हथेली को
निर्निमेष निरख रहा है एकलव्य
गुमसुम बैठा
क्या वह हताश था?
क्या वह त्याग था?
या खुशनसीबी का अहसास था?
यह सब कवि कल्पना मात्र!
उच्च गिरिशृंख से निकल कर
पर्वतीय सरिता
दूर सागर की ओर
अब भी बह रही है।
वसंत में
तरु अब भी फूलते हैं
और शिशिर में नंगे हो जाते हैं
यद्यपि पत्ते झड़ जाते हैं
तो भी यह निश्चित है
कि शाखाएँ पुनः हरिताभ हो उठेंगी
पर, जो अंगूठा कट गया है
वह अब कभी उगेगा नहीं।
कितने चेहरे हैं शोषण के?
मूक बैठे एकलव्यों के सामने
आचार्य द्रोणों का आगमन
बार- बार होता रहेगा
फिर क्या होगा?
इतिहास के चक्र की गति
आप तो जानते ही हैं?
मेरी बातें
जो लोग मेरे चारों ओर हैं
और जो मेरे निकट हैं
वे मेरी बातों पर
ध्यान नहीं देते।
यदि वे ध्यान दें भी
तो भी समझते नहीं
और यदि वे समझें भी
वे जो समझ लेतें हैं
जो मैंने कहा
ऐसे में
यदि मैं कुछ बताऊँ
तो दूसरे कैसे समझेंगे?
बिना बत्तियों वाली गलियाँ
बिना बत्तियों वाली गलियों से
हम कई बार गुजर चुके हैं
हम इसके अभ्यस्त हो चुकें हैं
पूछने पर कुछ लोग बताएंगे
इन गलियों में
कभी चमकीली बत्तियाँ जलतीं थीं
प्रमाण स्वरूप

आधा दर्जन खम्भे खड़े हैं
बिना बत्तियों के
हमारी आँखें
अंधकार की अभ्यस्त हो चुकीं हैं
अब हमें लगता है
कि दोस्तों से मिलती फीकी रोशनी की अपेक्षा
अंधेरा ही अच्छा है। |